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- भगवान कृष्ण और अर्जुन...

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घटनाएँ आती हैं और चली जाती हैं। लेकिन कभी-कभी ये घटनाएँ हमेशा के लिए एक ऐसी सीख छोड़ जाती हैं जो कभी नहीं बदलती। हमें इसी पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
अर्जुन और भगवान कृष्ण के बीच युद्ध के मैदान के ठीक बीच में एक संवाद हुआ था।
उन्होंने चाहे जितना भी समय लिया हो, या जिस भी तरीके से यह ज्ञान दिया गया हो, भगवद गीता का महत्व उससे कहीं अधिक है। उस संवाद से जो ज्ञान मिला, उसके सामने उसमें लगा समय बहुत मामूली है। यह ज्ञान इतना अनमोल है कि पूरी दुनिया भी इसके सामने कम पड़ जाए। इसमें शाश्वत ज्ञान भरा हुआ है।
लेकिन अक्सर हम इसे भूल जाते हैं और बाहरी चीज़ों में उलझ जाते हैं। हमें इस बात में ज़्यादा दिलचस्पी होती है कि कृष्ण ने क्या पहना था या उन्होंने क्या खाया था। अगर उन्होंने मक्खन खाया, तो हम सोचते हैं, "अरे, मैं भी मक्खन खाता हूँ!" हम छोटी-छोटी बातों में उलझ जाते हैं—कृष्ण कहाँ रुके, कहाँ सोए, कहाँ नहाए, या कहाँ टहले।
असली सार यह है कि हम इन बाहरी चीज़ों से ऊपर उठें और उस ज्ञान को सुनें। अर्जुन और कृष्ण की मुलाकात का असल मकसद यही था।
हर घटना के पीछे ज्ञान छिपा होता है। हर इंसान के पीछे प्रेम होता है। हर वस्तु के पीछे अनंतता होती है। इन तीन बातों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
पानी से भरा एक घड़ा लीजिए। अगर हम इस वस्तु को गहराई से देखें, तो हमें इसके परमाणु (atoms) दिखाई देंगे। अगर हम परमाणुओं के भी पार जाएँ, तो यह एक 'वेव फंक्शन' (wave function) है। असल में घड़ा जैसी कोई चीज़ नहीं होती; जो है, वह अनंतता है। इस प्रकट ब्रह्मांड के पीछे एक अव्यक्त स्थान या कंपन का क्षेत्र (field of vibration) है।
ज्ञान किसी घटना के अंदर नहीं होता; वह घटना से परे होता है। अगर हम किसी एक घटना से कोई निष्कर्ष निकालते हैं, तो वह गलत ज्ञान हो सकता है। मान लीजिए, कोई व्यक्ति गुस्सा हो जाता है और किसी पर चिल्लाता है। हम सोचते हैं कि यह गुस्सा उसी व्यक्ति का है, लेकिन असल में यह किसी और से उस तक पहुँचा था। और उस व्यक्ति को यह किसी और से मिला होगा, और इसी तरह यह सिलसिला चलता रहता है।
जब हम किसी घटना से ऊपर उठते हैं, तभी सत्य का बोध होता है। कोई एक घटना हमें गलत धारणा दे सकती है। इसलिए, हमें सभी घटनाओं को समग्र रूप में देखना चाहिए। सत्य, अलग-अलग घटनाओं के रंगों से परे होता है। इसी तरह हम अपनी सोच में बदलाव ला सकते हैं।
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