सम्पादकीय

कोयले का इस्तेमाल जारी रखने के लिए भारत ही क्यों जिम्मेदार बने?

Gulabi
15 Nov 2021 12:39 PM GMT
कोयले का इस्तेमाल जारी रखने के लिए भारत ही क्यों जिम्मेदार बने?
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चीन समेत दुनिया के कई देश अभी कोयले पर आश्रित
संयम श्रीवास्तव।
ग्लासगो में यूएनएफसीसी ( UNFCCC) यानि यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज या सीओपी 26 में आखिरकार सहमति बन गई है. एग्रीमेंट के अनुसार दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के लिए जीवाश्म ईंधन को दोषी मानते हुए ऐसी नीतियां बनानी हैं कि कोयले के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सके. हालांकि कोशिश यह थी कि चरणबद्ध तरीके से कम किए जाने की जगह खत्म किया जा सके पर सहमति बने. पर भारत के प्रयासों से शब्दावली में परिवर्तन किया जा सका. कई रिपोर्ट ये बताते हैं कि सहमति बनने में देरी का कारण भारत भी रहा क्योंकि भारत को कोयले के यूज को लेकर प्रस्ताव में शामिल की गई भाषा को लेकर आपत्ति थी.
भारत को इसके लिए दुनिया भर में बुरा कहा जा सकता है पर ये समझौता उन बड़े देशों को जरूर खलनायक बना रहा है जो कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए 100 बिलियन डालर मदद करने का दम भरते रहे हैं. बड़े और अमीर देशों का दोमुंहापन एक बार फिर उजागर हुआ जो बिना खर्च किए दुनिया को ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन मुक्त करने का सपना देख रहे हैं. समझौते में विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन को रोकने के मिलने वाली मदद के लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं तय हो सका. विकसित बड़े पैमाने पर ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित करके भारी पैमाने पर संपत्ति तो अर्जित कर लिए पर अब उस संपत्ति का कुछ अंश विकासशील देशों को जीएचजी गैसों को रोकने के लिए खर्च करने को तैयार नहीं हैं.
चीन समेत दुनिया के कई देश अभी कोयले पर आश्रित
भारत को अभी करीब एक दशक तक कोयले की सख्त जरूरत रहेगी. हमारा पावर सेक्टर पूरी तरह कोयले पर आधारित बिजली पर आश्रित है. यही हाल दुनिया में सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में शुमार चीन का भी है. चीन समेत दुनिया के कई देशों को भी अभी कई सालों तक जीवाश्म ईंधन के भरोसे ही रहना है पर आश्चर्यजनक ये है कि भारत का नाम ग्लासगो में सहमति तोड़ने वालों में सबसे ऊपर आ गया है. समझ में नहीं आता कि हमारे देश के शीर्ष वार्ताकारों ने भारत का नाम सहमति तोड़ने वालों के रूप में क्यों प्रस्तुत होने दिया. ये तो वैसे ही हो गया कि कोयले को लेकर अगर कोई रिलेक्शेसन मिलता है तो मजा तो दुनिया भर के लोग लेंगे पर संदेश ये गया है कि भारत के चलते कोयले के इस्तेमाल को खत्म करने का प्रस्ताव नहीं पास हो सका.
भारत के बयान को स्वीकारने के अलावा विकल्प नहीं : अमेरिका
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत कोयले की शक्ति को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के बजाय, चरणबद्ध तरीके से कम करने के संबंध में किए गए परिवर्तन के लिए भारत की दुनिया के कई छोटे देशों द्वारा आलोचना की गई है. दरअसल छोटे द्वीपीय देशों को उनके डूबने का खतरा बढ़ता जा रहा है. कई देशों ने कहा है कि वे भारत के इस संशोधन से बेहद निराश हैं क्योंकि कोयला आधारित बिजली उत्पादन घर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार हैं.
वहीं इन सब बातों को लेकर अमेरिका के दूत जॉन केरी ने कहा कि दुनिया भर के देशों के पास कोयला के संबंध में भारत के बयान को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने बताया कि, "अगर हमने ऐसा नहीं किया होता तो हमारे बीच कोई समझौता नहीं होता. "
भारत अपनी उपलब्धियों को भुना नहीं सका
भारत को आने वाले दशकों में लगातार जीवाश्म ईंधन की जरूरत होगी ये बात सही है पर ये भी सही है कि भारत इस दिशा में सबसे तेजी से काम कर रहा है कि कैसे उत्सर्जन को घटाया जा सके. भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जैसा कहा कि "हम आज गर्व से कह सकते हैं कि भारत एकमात्र जी20 देश है, जो पेरिस समझौते के तहत उल्लिखित लक्ष्यों को प्राप्त करने की राह पर है. वहीं राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के बारे में और इसके बारे में बहुत सारी बातें हुई हैं, जलवायु वित्त पर प्रतिबद्धता की कमी परेशानी का सबब है." पर दुनिया के सामने यह बात नहीं आ सकी. दुनिया भर में संदेश ये गया है कि भारत अपने कोयले पर आधारिरत बिजली घऱ को बंद करने की इच्छा शक्ति नहीं रखता .
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को एक ब्लॉग में लिखा, "शिखर सम्मेलन भारत के दृष्टिकोण के लिहाज से सफल साबित हुआ क्योंकि हमने विकासशील दुनिया की चिंताओं और विचारों को काफी संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से व्यक्त किया और सामने रखा है. भारत ने मंच पर एक रचनात्मक बहस और न्यायसंगत एवं न्यायपूर्ण समाधान का मार्ग प्रस्तुत किया. हालांकि, सीओपी26 आम सहमति से दूर रहा. भारत ने यह सुनिश्चित किया कि वर्तमान जलवायु संकट मुख्य रूप से विकसित देशों में अस्थिर जीवन शैली और उपभोग के बेहद खराब पैटर्न के चलते उत्पन्न हुआ है. दुनिया को इस वास्तविकता को बताने की जरूरत है."
मंत्री ने ब्लॉग 'सीओपी 26 डायरी' में लिखा है कि भारत ने जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए 'वन सन, वन वर्ल्ड, वन सन ग्रिड' बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. यादव ने कहा कि जीवाश्म ईंधन और उनके उपयोग ने दुनिया के कुछ हिस्सों को उच्च स्तर की बढ़ोतरी हासिल करने में सक्षम बनाया है. उन्होंने कहा, "अब भी, विकसित देशों ने कोयले के इस्तेमाल को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया है. यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) सभी स्रोतों से जीएचजी उत्सर्जन को कम करने के लिए संदर्भित करता है. यूएनएफसीसीसी किसी विशेष स्रोत पर निर्देशित नहीं है. विकासशील देशों का वैश्विक कार्बन बजट में उचित हिस्से का अपना अधिकार है और उन्हें इस दायरे में जीवाश्म ईंधन के जिम्मेदार उपयोग का हक है."
सीओपी 27 पर दबाव
फिलहाल सीओपी 26 का सारा दबाव सीओपी 27 के लिए ट्रांसफर कर दिया गया है. सीओपी 27 अगले साल काहिरा में होने वाला है. अगर विश्व चाहता है कि अगले साल काहिरा में कुछ खास काम किया जा सके तो अभी से तैयारी शुरू करनी होगी. दुनिया के शक्तिशाली और अमीर देशों को विकासशील देशों की मदद के लिए अपनी तिजोरी खोलने के लिए स्पष्ट और कारगर नीति बनानी होगी. भारत को भी दुनिया के सामने स्पष्ट करना होगा कि कैसे वह ईंधन और जीवाश्म ईंधन की सब्सिडी से दूरी बना रहा है और कार्बन कर की ओर बढ़ रहा है. दुनिया को वित्तीय क्षमता प्रतिबद्धताओं की जगह कोयला क्षमता बंद करने की स्पष्ट व्यवस्था करनी होगी.
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