सम्पादकीय

जब भारतीय जांबाजों के सामने पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे

Rani Sahu
4 Dec 2021 7:05 AM GMT
जब भारतीय जांबाजों के सामने पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे
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2 दिसंबर 1971 की शाम खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) ने मुझे अपने मुंबई वाले घर पर बुलाया

बिक्रम वोहरा 2 दिसंबर 1971 की शाम खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) ने मुझे अपने मुंबई वाले घर पर बुलाया. उन्होंने कहा कि विमान से जल्द दिल्ली निकलो. देश जंग की तरफ बढ़ रहा है, इसलिए तुरंत साउथ ब्लॉक कार्यालय में सेना के पीआरओ को रिपोर्ट करो, मैंने उनसे पहले ही बात कर ली है. उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई सूचना आई थी. मैंने दिल्ली के लिए आईए कारावेले की फ्लाइट पकड़ी और अपनी मां से मिलने के लिए धौलाकुआं स्थित घर पहुंच गया. वे इस बात को लेकर परेशान थीं कि मैं एक जंग की रिपोर्टिंग करने जा रहा हूं. दरअसल, इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने कुछ देर पहले ही इसकी घोषणा कर दी थी. दोपहर तक मैं वर्दी और आईडी के साथ (जो अब भी मेरे पास है) जम्मू जाने वाली सेना की ट्रेन में सवार हो गया.

यहां मैं बस यही कहना चाहूंगा कि अगर आप गूगल पर 'बैंड ऑफ ब्रदर्स वोहरा' सर्च करते हैं तो आप पाएंगे कि मैं दुनिया के इकलौते ऐसे परिवार से आता हूं जहां चार सगे भाई जनरल के पद पर काबिज हुए. इनमें दो लेफ्टिनेंट जनरल बने तो दो मेजर जनरल. हम सभी ने कुल मिलाकर 151 साल तक सेना की सेवा की. ऐसे में स्वाभाविक रूप से मुझे वॉर कवर करने का मौका मिला. क्योंकि मैं सेक्टर के सभी कमांडरों को जानता था और इलस्ट्रेटेड वीकली और टाइम्स ऑफ इंडिया का प्रतिनिधि होने के नाते मुझे एक जीप और ड्राइवर दिया गया था. मेरे तीन चाचाओं के इस क्षेत्र में होने का मुझे फायदा मिला. इनमें एक हॉडसन हॉर्स (4 हॉर्स) को कमांड कर रहे थे, जबकि दूसरे 3 कैवलरी में थे, तीसरे चाचा ब्रिगेडियर थे और सभी बसंतर की लड़ाई में सेना का नेतृत्व कर चुके थे, जो रोमेल के अफ्रीका कॉर्प्स के बाद सबसे बड़ा टैंक हमला था.
जैसे ही हम सुबह के वक्त सांबा से गुजरे, ट्रेन रुक गई और हमें बाहर निकलने का आदेश दिया गया, क्योंकि ट्रेन के ऊपर पाकिस्तान (Pakistan) के दो जेट (सैबर) उड़ रहे थे. ऐसे में हम धान के खेतों में छिप गए. उन्होंने ट्रेन को तो रोक दिया था, लेकिन हमें ढूंढ पाने में नाकाम रहे. इसके बाद ट्रेन पठानकोट की ओर रवाना हो गई.
'हैन्ड्स इन पॉकेट्स, थिंक ऑफ सैम'
मुझे मेरे पिता की रेजीमेंट 8 कैवलरी में शामिल किया गया. इसके बाद मेजर जनरल भैया राजवाड़े की अनुमति लेकर मैं 5 दिसंबर को सैनिकों के साथ पाकिस्तानी क्षेत्र में पहुंच गया. (पचास के दशक में जब वह हमारे पड़ोसी थे, तब वे मुझे बिकी कहते थे, जिससे मैं परेशान हो जाता था.) उस दौरान चारों तरफ से संकेत दिए जा रहे थे कि अब आप पाकिस्तान में प्रवेश कर रहे हैं. आपको पासपोर्ट की जरूरत नहीं है. किसी की परवाह किए बिना मारो. एक और संकेत था- हैन्ड्स इन पॉकेट्स, थिंक ऑफ सैम. ये संदर्भ जनरल मानेकशॉ और उनके आदेशों को लेकर था. इसके तहत कहा गया था कि यदि दुश्मन के इलाके में कोई भी सैनिक पाकिस्तानी महिला के साथ दुर्व्यवहार करता है तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा. इस दौरान मैंने एक गांव में एक वेश्या का इंटरव्यू लिया था, लेकिन वह दूसरी कहानी है.
जब कई गांवों को पार करते हुए हम पाकिस्तान में लगभग आठ मील अंदर घुस गए तो चारों तरफ मौत का तांडव नजर आ रहा था. हर तरफ लाशों की दुर्गंध थी. नागरिक और सैनिकों के शव सड़क किनारे पड़े हुए थे. इनमें से कुछ को बेहद बेरहमी से मार दिया गया था. जंग बेहद भद्दी होती है. सुंदर और रोमांटिक तो कतई नहीं होती. लाहौर से पहले आने वाले एक छोटे से स्टेशन चक अमरू के रास्ते में (उस दौरान निजामुद्दीन से नई दिल्ली की तरह) पाकिस्तानी सेना ने हमला बोल दिया था और उनका नेतृत्व करने वाले कर्नल को भारतीय सेना ने मार गिराया. भारतीयों ने शव वापस करने के लिए अस्थायी संघर्ष विराम की मांग की थी, जिसके बाद पाकिस्तानी सैनिक पूरे सैन्य सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ उनके पार्थिव शरीर को दूसरी तरफ ले गए. इसके बाद जंग दोबारा शुरू हो गई.
जैसे वक्त थम गया था
मेरी जीप एक बारूदी सुरंग की चपेट में आ गई, जिससे टायर के टुकड़े हो गए. यह शायद मुझसे जुड़ा बेहद मार्मिक किस्सा था, लेकिन अगर मुझे सही ढंग से याद है तो वहां मेरे साथ एक सहयोगी लेनी विलियम्स और टाइम पत्रिका के जहांगीर गज़दर मौजूद थे. उस वक्त माइन डिटेक्टर उपलब्ध नहीं था और कुछ सैनिकों ने 30 मीटर के दायरे में बड़े-बड़े पत्थर फेंककर हमारी मदद की थी. अंत में, हमने हिम्मत करके तेजी से दौड़ लगा दी और सुरक्षित ठिकाने पर पहुंच गए.
जिस रात हम अमरू चक में दाखिल हुए, वहां पाकिस्तान की ओर से फेंके गए बम की वजह से बना बड़ा गड्ढा मिला. पानी भरने की वजह से वह तालाबनुमा बन गया था. इसमें डुबकी लगाने के बाद सैनिकों की थकान दूर हो गई. हमारे सैनिकों के दाखिल होते ही गांव वाले भाग खड़े हुए. वहां तेज आंच पर दाल पक रही थी. वहीं, साबुन से सना एक शेविंग ब्रश पड़ा था, जो उस वक्त तक सूखा नहीं था. एक युवा लड़का नीली बोतलों से ढका हुआ था, जो हमारे सैनिकों की एंट्री से पहले हुई गोलाबारी में जान गंवा बैठा था. धुले हुए कपड़े एक कतार में सूख रहे थे. उस वक्त तो ऐसा लगा, जैसे वक्त थम गया है. मुझे याद है कि एक सिख सैनिक एक खदान में एक गाय को कंबल से ढक रहा था, जिसका एक पैर धमाके में उड़ गया था.
लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता ने इतिहास लिखा
उस दिन के बाद मैं अपने पिता के भाई के बंकर पर पहुंचा, जो बख्तरबंद रेजिमेंट की कमान संभाल रहे थे और अगली सुबह बड़ी जंग की तैयारी कर रहे थे. हमने उनके ट्रेलर में रात बिताई. उन्होंने कहा, कोई मरना नहीं चाहता. हम सिर्फ जिंदा रहना चाहते हैं और घर जाना चाहते हैं. जान गंवाना कोई वीरता नहीं है. यदि मैं तुम्हें इस जंग को कवर करने दूंगा तो तुम्हारे पिता मुझे मार डालेंगे. मैंने उनसे कहा कि मैं ड्यूटी पर हूं. मैं यूनिफॉर्म में हूं और मैं आपके साथ आ रहा हूं.
हमने उनके पैटन टैंकों को ऐसे उड़ा दिया, जैसे वे टिनसेल से बने हों. जैसे-जैसे भारत के T55s और AMX 13s शकरगढ़ की ओर बढ़े, स्टील के मृत राक्षसों का कब्रिस्तान जैसा बन गया. हमने दुश्मनों को मात दे दी थी. मेरी छोटी जीप सेना की टुकड़ी के पीछे-पीछे चल रही थी. आर्टिलरी के गोलों और टैंक की गड़गड़ाहट मेरे कानों में गूंज रहे थे. यहां हमने 17 पूना हॉर्स के लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (Arun khtrpal) की वीरता के बारे में सुना. वे अपने तीन टैंकों को माइनफील्ड में ले गए थे.
हालांकि, भारतीय सेना ने हमला जारी रखा और अरुण अपने बाकी दो टैंकों के साथ लड़े और कार्रवाई के दौरान जान गंवाने से पहले उन्होंने पाकिस्तान के 10 टैंकों को नष्ट कर दिया. उन्होंने टैंकों को जंग के मैदान में छोड़ देने के आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था और उनकी बंदूक लगातार गरज रही थी. इस युद्ध में हार के बाद पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर जवाबी हमला किया, जो काम नहीं आया. अरुण को परमवीर चक्र, मेरे पिता के भाई और दूसरे लोगों को महावीर चक्र मिला.
लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.
23 साल के खेत्रपाल के लिए प्रार्थना हुई तो जहां तक मुझे याद है, जनरल वाग पिंटो ने कहा उन्हें युद्ध के मैदान में सम्मान दिया गया था. जब पाकिस्तान बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए राजी हो गया तो मुझे POW के एक शिविर में ले जाया गया और दुश्मन सैनिकों का इंटरव्यू करने की इजाजत दी गई. आश्चर्यजनक ये था कि उस दौरान सभी सैनिक एक-दूसरे का सम्मान कर रहे थे. मैंने उन युवकों की तस्वीरें लीं. उनमें से कुछ तो किशोरावस्था में थे. 18 दिसंबर की रात हमने रम पीकर जमकर जश्न मनाया, लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि इसके बाद मैंने कभी युद्ध कवर नहीं किया. युद्ध बेहद खराब और भयावह होता है, जो आपको डराता है.
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