सम्पादकीय

फिरोजपुर में जो हुआ, उसकी जड़ें अराजकता से भरे शाहीन बाग के धरने में भी हैं और किसान आंदोलन में भी

Gulabi
12 Jan 2022 5:49 AM GMT
फिरोजपुर में जो हुआ, उसकी जड़ें अराजकता से भरे शाहीन बाग के धरने में भी हैं और किसान आंदोलन में भी
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पंजाब के फिरोजपुर में प्रधानमंत्री के काफिले को रोकने वाले प्रदर्शनकारी महज कुछ ही घंटे फ्लाईओवर पर रहे होंगे
राजीव सचान। पंजाब के फिरोजपुर में प्रधानमंत्री के काफिले को रोकने वाले प्रदर्शनकारी महज कुछ ही घंटे फ्लाईओवर पर रहे होंगे, लेकिन उनकी हरकत ने देश को स्तब्ध कर दिया। इसलिए कर दिया, क्योंकि इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में प्रदर्शनकारियों की ओर से रास्ता रोक लेने के कारण प्रधानमंत्री के काफिले को वापस लौटना पड़ा हो और वह भी करीब 20 मिनट तक ठहरे रहने के बाद। यह सहज स्वाभाविक है कि इसे प्रधानमंत्री की सुरक्षा में गंभीर चूक के तौर पर देखा जा रहा है।
इन सवालों के जवाब के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित जांच समिति की रपट की प्रतीक्षा करनी होगी कि प्रधानमंत्री का काफिला किन कारणों से रुका? क्या इसके पीछे कोई साजिश थी या फिर सियासी शरारत? इन सवालों का चाहे जो जवाब हो, फिरोजपुर में जो हुआ, उसकी जड़ें शाहीन बाग के उस अराजक धरने में भी हैं, जिसने दिल्ली के एक प्रमुख रास्ते को करीब सौ दिन तक बाधित रखा और कृषि कानून विरोधी उस आंदोलन में भी, जिसने करीब एक साल तक दिल्ली के ही सीमांत इलाकों की सड़कों को अवरुद्ध रखा। ये रास्ते क्यों अवरुद्ध रहे? एक तो इस कारण कि सरकार अराजकता का परिचय दे रहे शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को रास्ते से नहीं हटा सकी और दूसरे, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस अराजकता की अनदेखी की।
शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी करीब तीन माह तक लाखों लोगों का रास्ता रोके रहे। लोग अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए अपना कीमती वक्त जाया करते रहे। इन लाखों लोगों की पीड़ा किसी ने नहीं समझी। सबसे खराब बात यह हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से वार्ता के लिए एक समिति का गठन कर उनकी अराजकता का वैधता प्रदान कर दी। इससे प्रदर्शनकारियों का दुस्साहस और बढ़ा। लाखों लोगों की नाक में दम करने वाले इन प्रदर्शनकारियों को उकसाने वालों में कई विपक्षी दलों के नेता शामिल थे। इनमें कांग्रेसी सबसे आगे थे। शाहीन बाग के इसी अराजक आंदोलन के कारण दिल्ली में तब भीषण दंगा हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्र पर थे। इन दंगों में 50 से अधिक लोग मारे गए। जब कोरोना के प्रकोप के कारण शाहीन बाग खाली हो गया, तब उसके कुछ दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया कि धरना-प्रदर्शन के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता। इस आदेश का कोई खास महत्व नहीं था, क्योंकि जब वह आया, तब शाहीन बाग खाली हो चुका था।
यह बात और है कि तब तक पंजाब में किसान संगठन कृषि कानूनों के विरोध में रेल पटरियों पर बैठ चुके थे। इससे यात्री और मालगाड़ियों का पंजाब जाना थम गया। लाखों लोग परेशान हुए और पंजाब के उद्योगों के सामने भी संकट खड़ा हो गया। उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री थे अमरिंदर सिंह। उन्होंने रेल पटरियों पर बैठे किसानों को हटाने के लिए कुछ नहीं किया। उलटे जिन किसानों पर रेल यातायात बाधित करने के आरोप में मुकदमे दर्ज हुए, उन्हें वापस लेने की घोषणा की। चूंकि उन्हें किसान संगठनों की अराजकता से कोई समस्या न थी, इसलिए पंजाब में इस अफवाह की आड़ में मोबाइल टावरों पर हमले शुरू हो गए कि कृषि कानूनों का असली लाभ तो अंबानी-अदाणी को मिलेगा। इन हमलों को रोकने के लिए भी अमरिंदर सरकार ने कुछ नहीं किया। ऐसे माहौल में ही किसानों को गुमराह करने वाले तत्व सक्रिय हो गए और उनकी ओर से ऐसे आरोप उछाले जाने लगे कि कृषि कानूनों के बहाने मोदी सरकार किसानों की जमीन छीनना चाहती है। कुछ समय बाद किसान संगठन दिल्ली की सीमाओं पर आ धमके। वे दिल्ली-हरियाणा और दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर सड़कों को घेर कर बैठ गए। इन रास्तों से गुजरने वाले लाखों लोगों का आना-जाना दूभर हो गया। इन लाखों लोगों का समय और संसाधन ठीक उसी तरह जाया होने लगा, जैसा शाहीन बाग का रास्ता बंद होने के दौरान जाया हो रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाकर इस अराजक आंदोलन को भी एक तरह की वैधता प्रदान की।
सरकार ने इसके लिए जतन किए कि किसान संगठन दिल्ली में न घुसने पाएं, फिर भी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाने की फर्जी आड़ लेकर उन्होंने लालकिले पर चढ़ाई कर दी और जमकर नंगा नाच किया। देश को शर्मसार होना पड़ा, लेकिन किसान संगठनों का रास्तों पर कब्जा जारी रहा। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट तरह-तरह की टिप्पणियां करता रहा, लेकिन ऐसा कोई आदेश नहीं दे सका कि इस तरह रास्ते रोकना खुली अराजकता भी है और नागरिक अधिकारों का हनन भी। विपक्षी दलों के साथ मीडिया के एक हिस्से ने भी इस अराजक आंदोलन का समर्थन किया और यह देखने से इन्कार किया कि अवरुद्ध रास्तों से किस तरह लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। यह पता नहीं कि कृषि कानून वापस होने के बाद भी पंजाब में कथित किसानों ने प्रधानमंत्री का काफिला क्यों रोका, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि जब अराजकता को सहन किया जाएगा और खुद सुप्रीम कोर्ट की ओर से उसकी अनदेखी की जाएगी तो फिर जैसा फिरोजपुर में हुआ, वैसा आगे भी होगा। पहले शाहीन बाग, फिर दिल्ली के सीमांत इलाकों और अब फिरोजपुर में जो कुछ हुआ, उससे उन सभी तत्वों का दुस्साहस बढ़ा ही होगा, जिन्होंने आंदोलन की आड़ में अराजकता को अपना औजार बना लिया है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
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