सम्पादकीय

जलवायु आपदा से बचने के लिए जीवाश्म ईंधन से निजात पानी होगी

Gulabi Jagat
8 April 2022 7:01 AM GMT
जलवायु आपदा से बचने के लिए जीवाश्म ईंधन से निजात पानी होगी
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पृथ्वी के बीते दो हजार सालों के इतिहास की तुलना में अब बीते कुछ दशकों में धरती का तापमान बेहद तेजी से बढ़ रहा
आरती खोसला का कॉलम:
पृथ्वी के बीते दो हजार सालों के इतिहास की तुलना में अब बीते कुछ दशकों में धरती का तापमान बेहद तेजी से बढ़ रहा है। इसके पीछे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है। यदि तापमान वृद्धि यूं ही जारी रहती है तो दुनिया को तेजी से ऐसे बदलावों का सामना करना पड़ेगा, जिनके प्रति अनुकूलन नहीं किया जा सकता है। दक्षिण एशिया में ग्लोबल वार्मिंग का बहुत अधिक जोखिम है।
आईपीसीसी द्वारा जारी नई रिपोर्ट से साफ है कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हमें अपने उत्सर्जन को जीरो पर लाना होगा। उत्सर्जन में कटौती के बिना ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना पहुंच से बाहर है। इस काम के लिए ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव की आवश्यकता है और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में भारी कमी लानी होगी। अगर सरकारें अपने मौजूदा उत्सर्जन-कटौती के वादों को पूरा करती हैं, तो इस सदी में वैश्विक स्तर पर समुद्र का स्तर 44-76 सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा।
भारत में ग्लोबल वार्मिंग से तटीय शहरों में हीट वेव, वर्षा के कारण होने वाली बाढ़ें बहुत गंभीर हो जाएंगी। भारी बारिश, चक्रवात व सूखे के हालात भारत और बांग्लादेश में बहुत लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे। उत्सर्जन में तेजी से कटौती जलवायु परिवर्तन के परिणामों को सीमित करने का एकमात्र तरीका होगा। भारत मोटे तौर पर ग्रीन हाउस गैसों के कुल वैश्विक उत्सर्जन में 6.8% का हिस्सेदार है।
वर्ष 1990 से 2018 के बीच भारत के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 172% बढ़ो‍तरी हुई है। 2013 से 2018 के बीच देश में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भी 17% बढ़ा है। हालांकि अभी भी भारत का उत्सर्जन स्तर जी-20 देशों के औसत स्तर से बहुत नीचे है। देश में ऊर्जा क्षेत्र अब भी ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जनकारी क्षेत्र है। देश की कुल ऊर्जा आपूर्ति में जीवाश्म ईंधन आधारित प्लांट्स का योगदान 74% है, जबकि अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 11% है।
देश की वर्तमान नीतियां वैश्विक तापमान में वृद्धि को तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के अनुरूप फिलहाल नहीं हैं। भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2027 तक 275 गीगावाट तथा 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का है। अगस्त 2021 तक भारत में 100 गीगावाट स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता है। एक और 50 गीगावाट क्षमता अभी निर्माणाधीन है और 27 गीगावाट क्षमता के संयंत्र अभी निविदा के दौर में हैं।
भारतीय रेलवे वर्ष 2023 तक अपने नेटवर्क के विद्युतीकरण की योजना बना रही है और वह वर्ष 2030 तक नेट शून्य कार्बन उत्सर्जक बनने की राह पर आगे बढ़ रही है। दुनिया के सबसे अमीर 10% अकेले दुनिया के कुल उत्सर्जन के आधे के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि दुनिया के सबसे गरीब लोगों का हिस्सा सिर्फ 12% है। नीतिगत निर्णय लेने वालों को वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए हरसंभव प्रयास करने की आवश्यकता है।
2050 तक 'नेट-जीरो' तक पहुंचना दुनिया को सबसे खराब स्थिति से बचने में मदद करेगा। रिपोर्ट यह भी कहती है कि मौजूदा हालात ऐसे हैं कि 1.5 या 2 डिग्री तो दूर, हम 2.7 डिग्री तापमान वृद्धि की ओर अग्रसर हैं। एक और महत्वपूर्ण बात जो यह रिपोर्ट सामने लाती है कि नेट ज़ीरो के नाम पर अमूमन पौधरोपण या कार्बन ऑफसेटिंग की बातें की जाती हैं।
मगर असल जरूरत है कार्बन उत्सर्जन को ही कम करना। न कि हो रहे उत्सर्जन को बैलेंस करने कि गतिविधियों को बढ़ावा देना। दुनिया को जीवाश्म ईंधन के बुनियादी ढांचे को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना शुरू करना चाहिए। मौजूदा बुनियादी ढांचा 1.5 डिग्री लक्ष्य तक पहुंचना असंभव बना देगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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