सम्पादकीय

पानी का स्रोत

Subhi
19 May 2022 5:47 AM GMT
पानी का स्रोत
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देश में हर ओर तेजी से बढ़ते तापमान ने सभी को गरमी से परेशान होने पर मजबूर कर दिया है। दिन-प्रतिदिन पारे में उछाल अनेक परेशानियां पैदा कर रहा है। देश के अलग-अलग स्थानों से जल संकट की खबरें सुर्खियां बन रही हैं।

Written by जनसत्ता; देश में हर ओर तेजी से बढ़ते तापमान ने सभी को गरमी से परेशान होने पर मजबूर कर दिया है। दिन-प्रतिदिन पारे में उछाल अनेक परेशानियां पैदा कर रहा है। देश के अलग-अलग स्थानों से जल संकट की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। पानी की किल्लत के चलते ही आपस मे मारपीट और हाथापाई की नौबत तक सामने आ रही हैं। बढ़ती गरमी के साथ दैनंदिनी के प्रत्येक कार्य मे जल की आवश्यकता अधिक होती जा रही है। गरमी की तपन से बचने के लिए एसी, कूलर के उपयोग बढ़ गए हैं।

इन हालात में पानी की सहज उपलब्धता की समस्या तेजी से बढ़ रही है। नदियों-कुओं के पानी के प्रदूषित होने के साथ जल संचयन तंत्रों के उचित रूप से रखरखाव न होने से भी पीने के लिए साफ पानी मिलना दूभर होता जा रहा है। बढ़ती हुई आबादी के अनुपात में जल आपूर्ति बराबर बनी रहे, इसके लिए जल प्रबंधन के साथ आमजन को पानी बचाने वाली सोच पर अधिक ध्यान देने की जरूरत आज ज्यादा हैं।

पिछले आठ वर्षों से बढ़ रही महंगाई कम होने या रुकने का नाम नहीं ले रही, बल्कि दिनोंदिन तेजी ही आने से इस समय चरम पर है। 'महंगाई की मार' (संपादकीय, 18 मई) में भी वर्णित है कि एलपीजी, सीएनजी, डीजल, पेट्रोल, बिजली और कोयला आदि र्इंधन मंहगा होने से हर वस्तु महंगी हो रही है, जिसका खमियाजा मध्यम और गरीब वर्ग को उठाना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि इस समय महंगाई शीर्षक से अधिकतर अखबार और चैनलों में समाचार और चर्चा हो रही है। लेकिन सरकार कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

आम लोगों को अधिक खर्च के कारण लिया गया कर्ज चुकाना कठिन होने से दोहरी मार झेलना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक और सरकारी प्रयास महंगाई के सामने बौने साबित हो रहे हैं और यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध थमता नहीं दिखता। इधर रसोई गैस इतनी महंगी हो गई है कि उपभोक्ता की मानसिकता बनने लगी है कि क्यों नहीं फिर से लकड़ी जला कर खाना बनाना शुरू कर दिया जाए। अच्छा हो सरकारें वैट और सेस आदि मदों में कमी कर राहत दें, अन्यथा महंगाई को न रोकना सरकार को भारी पड़ेगा।

धर्म मानव जीवन मे शांति के साथ साथ क्रांति का भी प्रादुर्भाव करता है। फिर भी व्यक्ति में न जागृति आ रही है और न समाज मे ही जागृति का शंखनाद हो पा रहा है। जब तक रूढ़ियों के बंधन से मुक्तहोने की चेष्टा नहीं करेंगे, तब तक जीवन में परिवर्तन होना असंभव है। आज परंपराओं के नाम पर अनेक संघ और भवन बन जाते हैं।

परंपराओं को नए परिवेश में ढालने पर ही समाज में प्रकाश और चमक उत्पन्न की जा सकती है। उस प्रकाश से अभिभूत होकर ही जनमानस उस ओर खिंचा चला आता है। अज्ञान के दलदल में निकल कर ज्ञान के धरातल पर कदम रखने का प्रयास करना चाहिए। अपने विवेक को जगाने की जरूरत है।


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