सम्पादकीय

गांव, किसान, कृषि को प्राथमिकता चाहिए

Rani Sahu
10 Feb 2022 2:16 PM GMT
गांव, किसान, कृषि को प्राथमिकता चाहिए
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हमारे देश की कई मारूफ शख्सियतों ने वर्षों पूर्व इस बात का जिक्र किया था

हमारे देश की कई मारूफ शख्सियतों ने वर्षों पूर्व इस बात का जिक्र किया था कि भारत गांव में बसता है तथा देश की उन्नति व खुशहाली की राह गांव से होकर गुजरती है। देश की विशाल आबादी को आनाज जैसे बुनियादी खाद्य पदार्थों सहित फल-सब्जियां व दुग्ध पदार्थों की बड़े पैमाने पर पूर्ति करा कर हमारे गांव सदियों से अपनी मेहनत व ताकत का एहसास करा रहे हैं। कृषि क्षेत्र को अपने पसीने से मुनव्वर करने वाले कृषि अर्थशास्त्र के अनुभवी परोधा किसान तथा देश की अर्थव्यवस्था का सदृढ़ स्तम्भ करोड़ों पशुधन का आशियाना भी गांव में ही है। मगर गांव का आकर्षण मात्र कृषि कार्यों तक ही सीमित नहीं है। वैश्विक खेल पटल पर भारत का तिरंगा फहराने वाले देश का सबसे बड़ा सरमाया हमारे खिलाड़ी ज्यादातर गांव की धरती से ही निकल रहे हैं। युद्धभूमि में दुश्मन को नेस्तनाबूद करके देश की सरहदों को अपने खून से सींचकर संग्रामवीरता के कई सुनहरे मजमून लिखने वाले शौर्य के यशरूप हमारे बहादुर सैनिकों की पृष्ठभूमि भी गांव ही रहे हैं। दुनिया में पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते खुमार व आधुनिकता की इस आंधी के दौर में हमारी पुरातन संस्कृति, संस्कार, पारंपरिक ज्ञान, गरिमामयी लोक परंपराएं, देव संस्कृति, प्राचीन से चले आ रहे सद्भाव के प्रतीक उत्सव, धार्मिक व अध्यात्मिक मान्यताएं, पारंपरिक परिधान, वेशभूषा, त्योहारों के अवसर पर बनने वाले लज्जत भरे पारंपरिक लजीज व्यंजन, स्थानीय भाषाएं, अनमोल वास्तुकला, बेशकीमती शिल्पकलाएं, कर्मकांड, लोक संगीत, लोकनृत्य, प्राकृतिक कृषि उत्पाद, कुश्ती जैसा पारंपरिक खेल तथा कई सामाजिक व्यवस्थाओं से परिपूर्ण सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने का पूरा श्रेय हमारे गांवों को ही जाता है।

भौतिकतावादी युग में भागदौड़ भरी जिंदगी में कोलाहल से दूर पारंपरिक स्वस्थ जीवनशैली, कठोर परिश्रम, शांतिपूर्ण माहौल, सौहार्द, विनम्र व्यवहार की झलक तथा सादा जीवन व उच्च विचारों के मूल्यों को पल्लवित करने वाली मुकद्दस भूमि भी हमारे गांव हैं। प्राचीनकाल से अतिथियों के प्रति आदर, सत्कार व शिष्टाचार के भाव रखने वाली भारतीय संस्कृति 'अतिथि देवो भवः' का वास्तविक स्वरूप भी ग्रामीण परिवेश में ही मौजूद है। सरकारों ने हमारी लोक कलाओं तथा भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए मंत्रालयों का गठन करके उनके अधीन कई विभाग स्थापित किए हैं। प्रकृति, पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण के लिए कडे़ कानूनी मसौदे भी अदालतों में मौजूद हैं। केंद्र सरकार 'मेरा गांव मेरी धरोहर' नामक अभियान शुरू कर रही है। 'केंद्रीय सूचना व प्राद्यौगिकी मंत्रालय' की एंजेसी 'कॉमन सर्विस सेंटर' इस मिशन में स्थानीय लोगों के योगदान से देश के गांव व वहां की सांस्कृतिक पहचान तथा धरोहरों को दर्ज करेगी। लेकिन धरातल पर यह सब चीजें हमारे गांव की वजह से सुरक्षित व जीवित हैं। अंग्रेज सल्तनत के खिलाफ जंग-ए-आज़ादी की तहरीक में गांव के लोगों ने अग्रणी किरदार निभाए थे। आज़ादी के बाद अपने वोट की ताकत से सियासी रहनुमाओं का मुकद्दर तय करके उन्हें सत्ता पर काबिज करके लोकतांत्रिक तरीके से सरकारें कायम करने से लेकर देश को खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने तक सबसे बड़ा योगदान ग्रामीण क्षेत्रों का ही रहा है। बेशक सरकारों ने ग्रामीण विकास के लिए कई योजनाएं लागू की हैं, मगर गांव की स्थिति 'आधी हकीकत आधा फसाना' जैसी है। विडंबना यह है कि देश की आत्मा कहे जाने वाले हमारे गांव कुछ वर्षों से पलायन की जद में आ चुके हैं। गांव से पलायन के चलते 'पहाड़ का पानी व पहाड़ की जवानी' पहाड़ पर नहीं टिकते, यह कहावत सच साबित हो रही है।
कृषि क्षेत्र व धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में विशेष योगदान देने वाले युवावर्ग को बेरोजगारी की खौफनाक सुनामी ने पलायन के लिए मजबूर कर दिया है। अभिभावकों द्वारा बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अच्छे शिक्षण संस्थानों की तलाश व ग्रामीण क्षेत्रों में कई आधुनिक सुविधाओं का अभाव भी पलायन का मुख्य कारण बन चुका है। आजीविका की तलाश में युवावर्ग के पलायन के कारण गांव का पुश्तैनी व्यवसाय पशुपालन हाशिए पर जा रहा है। खेत-खलिहान वीरानगी की जद में जाने से उपजाऊ जमीनें बदहाली के आंसू बहा रही हैं, जबकि कृषि, बागवानी व पशुपालन व्यवसाय का हिमाचल की ग्रामीण आजीविका व आर्थिकी में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। राज्य की 70 प्रतिशत आबादी कृषि व्यवसाय से जुड़ी है। एक तरफ ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाएं अपने बेहतर भविष्य व रोजगार की तलाश में पलायन कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ देश में तेज रफ्तार से बढ़ रही जनसंख्या के साथ शहरीकरण ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ पैर पसार कर गांव के सौंदर्य व सुकून को छीन रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधन खनन माफिया व भू-माफिया के निशाने पर आ चुके हैं। भारत अपनी आज़ादी के 75वें वर्ष को 'आजादी का अमृत महोत्सव' के रूप में मनाने जा रहा है। देश के सभी सियासी दल विकास के दावे जरूर करते हैं, मगर आज भी कई गांव, कस्बे शासन व प्रशासन की उदासीनता का शिकार होकर सड़क, परिवहन, शिक्षा, चिकित्सा व स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं। वर्तमान में देश में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाली आबादी का एक बड़ा वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में ही निवास करता है। गांव के सशक्त व आत्मनिर्भर बनने से ही देश वैश्विक स्तर पर आर्थिक महाशक्ति बनेगा। भारत की गौरवमयी पुरातन संस्कृति व संस्कारों के वास्तविक पैरोकार देश का आत्मगौरव हमारे गांव हैं। खाद्यान्नों से जुड़ी देश की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता भी कृषि क्रांति का धरातल गांव की माटी में ही मौजूद है। आज भी पशुपालन व्यवसाय, कृषि व बागवानी क्षेत्र युवाओं को सबसे अधिक रोजगार के साधन मुहैया करवाता है। अतः हमारे नीति निर्माताओं को गांव की पैरवी करने वाले किसान व कृषि हितैषी बजट पर फोकस करके गांवों को मजबूती प्रदान करने के प्रयास करने होंगे। भारत की सांस्कृतिक धरोहर गांव का वजूद बचाने, पुश्तैनी व्यवसाय का अस्तित्व सुरक्षित रखने तथा युवावर्ग के भविष्य को संवारने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराकर युवाशक्ति का पलायन रोकना होगा।
प्रताप सिंह पटियाल
लेखक बिलासपुर से हैं
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