सम्पादकीय

बचाव का टीका

Subhi
24 Nov 2021 1:21 AM GMT
बचाव का टीका
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देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार कमी आना राहत की बात है। संक्रमण से मौतों के मामले भी अब न्यून हैं। अगर कुछेक राज्यों को छोड़ दें, तो शेष भारत में जनजीवन सामान्य हो चला है।

देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार कमी आना राहत की बात है। संक्रमण से मौतों के मामले भी अब न्यून हैं। अगर कुछेक राज्यों को छोड़ दें, तो शेष भारत में जनजीवन सामान्य हो चला है। ऐसा बचाव संबंधी उपायों और प्रतिबंधों के कारण संभव हो पाया। इसमें ज्यादा बड़ी भूमिका टीकाकरण की रही है। पिछले ग्यारह महीनों में सतहत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों को टीके पहली खुराक दे दी गई। दोनों खुराक लेने वालों का आंकड़ा भी चालीस करोड़ के पार है। जाहिर है, अगर टीकाकरण अभियान गति न पकड़ता तो महामारी पर काबू पाना आसान नहीं था।

हालांकि खतरा अभी टला नहीं है। पर तसल्ली की बात यह है कि जिस तीसरी लहर की आशंका जताई जाती रही थी, उससे फिलहाल बचाव हो गया। इसलिए अब भी बचाव संबंधी उपायों का पूरी तरह से पालन करते हुए सतर्कता के साथ रहने और टीकाकरण की जरूरत बनी हुई है। टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाना इसलिए भी जरूरी है कि जल्द से जल्द लोगों को संक्रमण से बचाव का सुरक्षा कवच मुहैया कराया जा सके।
इसमें संदेह नहीं कि टीका महामारी से बचाव का बड़ा हथियार साबित हुआ है। टीका लगवा चुके लोगों को अगर संक्रमण हो भी रहा है तो वे गंभीर स्थिति में जाने से बच जाते हैं। लेकिन जिन लोगों ने टीका नहीं लगवाया है, उनके संक्रमित होने का जोखिम कहीं ज्यादा है। अब देश के ज्यादातर हिस्सों में जनजीवन पहले की तरह सामान्य हो चुका है और हर जगह भीड़ बढ़ने लगी है। इसलिए खतरा बना हुआ है। सात राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में करीब साढ़े पांच करोड़ लोगों ने पहली खुराक भी नहीं लगवाई। जयपुर, भोपाल, पटना, जलंधर, करनाल, रांची और रायपुर जैसे शहरों में तैंतीस लाख लोगों ने अभी तक टीका नहीं लगवाया।
अकेले पटना में ऐसे लोगों का आंकड़ा ग्यारह लाख है। लोग अब भी टीका लगवाने से कतरा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि महामारी चली गई है और अब टीके की जरूरत नहीं। पर ऐसा सोचना खतरे को न्योता देना है। इतना ही नहीं, जिन लोगों ने पहली खुराक ले ली, वे दूसरी खुराक लगवाने से बच रहे हैं। सत्रह राज्यों में दस करोड़ चौंतीस लाख लोगों ने दूसरी खुराक नहीं लगवाई। जबकि विशेषज्ञ चेताते रहे हैं कि नियत समय पर दूसरी खुराक लगवाना जरूरी है, तभी दोनों खुराक मिल कर पूरी तरह से प्रतिरोधक क्षमता बनाती हैं।
अभी तक टीकाकरण में बड़ी दिक्कत टीकों की उपलब्धता को लेकर बनी हुई थी। हालांकि टीकों की कमी अब थोड़ी तो दूर हुई है। लेकिन समस्याएं स्थानीय स्तर पर ज्यादा हैं। राज्यों में टीकाकरण केंद्र अब भी लोगों की पहुंच से बाहर हैं। इसीलिए अब केंद्र सरकार ने राज्यों से छोटी-छोटी योजनाएं बना कर टीकाकरण तेज करने को कहा है। ओड़ीशा में तिरपन स्कूली छात्राओं और चिकित्सा विज्ञान के बाईस छात्र संक्रमित मिले हैं। इसी तरह के मामले राजस्थान में आए हैं। यानी खतरा बना हुआ है। इसलिए राज्यों को अब अपने हिसाब से स्थानीय स्तर पर रणनीति बनाने की जरूरत है। घर-घर टीकाकरण का काम इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है। कार्यालयों में टीकाकरण का इंतजाम करवा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसके दायरे में लाया जा सकता है। अगर टीकाकरण में हम पिछड़ गए, तो फिर से महामारी का हमला होते देर नहीं लगने वाली।


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