- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- सम्पादकीय
- /
- US में ग्रीन कार्ड पर...

x
भारतीय IT सेक्टर की एक बार फिर परीक्षा
वॉशिंगटन ने TCS और Infosys समेत आठ कंपनियों के लिए ग्रीन-कार्ड प्रोसेसिंग रोक दी है, जिससे सही प्रक्रिया और चुनावी साल की राजनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
गुरुवार को ट्रंप प्रशासन ने आठ कंपनियों — Microsoft, Adobe, Cognizant, Infosys, TCS, Wipro, HCL और Capgemini — को 'परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम' (PERM) से रोक दिया। यह वह कदम है जिसे ग्रीन कार्ड स्पॉन्सर करने से पहले ज़्यादातर एम्प्लॉयर को पूरा करना होता है। लेबर डिपार्टमेंट न तो उनसे कोई नया आवेदन स्वीकार करेगा और न ही पहले से पेंडिंग आवेदनों पर कोई कार्रवाई करेगा। मौजूदा H-1B वीज़ा और मंज़ूर हो चुकी याचिकाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
वॉशिंगटन ने इसकी वजह धोखाधड़ी बताई है। व्हाइट हाउस की 'फ्रॉड टास्क फोर्स' के साथ मिलकर जुलाई में शुरू की गई लेबर डिपार्टमेंट के इंस्पेक्टर जनरल की जांच में H-1B और PERM सिस्टम के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है। फिर भी, घोषणा के समय उनमें से किसी के भी खिलाफ कोई आरोप नहीं बताया गया और न ही किसी खास नियम का ज़िक्र किया गया। सस्पेंशन (रोक) एक आरोप है, कोई फैसला नहीं।
इसमें राजनीति साफ़ दिखती है। यह घोषणा 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों से चार हफ़्ते से भी कम समय पहले की गई। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने Microsoft से अमेरिकी कर्मचारियों को काम पर रखने के लिए कहा और 2025 में कंपनी द्वारा 6,000 लोगों की छंटनी की ओर इशारा किया।
विदेशी लोगों को काम पर रखने के खिलाफ सख्ती दिखाने से नौकरियों को लेकर चिंतित वोटर्स खुश होते हैं, और आउटसोर्सिंग करने वाली कंपनियाँ आसानी से विलेन बन जाती हैं। कार्रवाई भले ही सही हो, लेकिन इसका समय चुनावी है, और 'अमेरिकियों को पहले काम पर रखने' का नारा चुनावी माहौल के हिसाब से सही है।
भारतीय IT सेक्टर के लिए, कॉर्पोरेट नुकसान उतना बड़ा नहीं है जितना हेडलाइंस से लगता है। TCS का कहना है कि पिछले दो सालों में उसके PERM फाइलिंग की संख्या सिंगल डिजिट (10 से कम) में थी।
नैसकॉम का कहना है कि बहुत कम H-1B कर्मचारी इस तरह से परमानेंट रेजिडेंसी (स्थायी निवास) तक पहुँच पाते हैं। शुक्रवार को IT शेयरों में तेज़ी आई, जिसमें TCS के तिमाही नतीजों का भी योगदान रहा। भारतीय बड़ी कंपनियों ने अपना मॉडल अस्थायी वीज़ा और ऑफशोर डिलीवरी पर बनाया है, न कि ग्रीन कार्ड पर। असली नुकसान व्यक्तिगत प्रोफेशनल्स का हुआ है: ऐसे इंजीनियर जो लाइन में बीच में हैं और जिनके एम्प्लॉयर अब फाइलिंग नहीं कर सकते, जबकि भारतीयों के लिए पहले से ही बैकलॉग की समस्या है। मंज़ूर हो चुके सर्टिफिकेशन का इस्तेमाल किया जा सकता है; बाकी रुके हुए हैं। कई लोग एम्प्लॉयर बदल लेंगे; कुछ घर लौट आएँगे।
कानूनी रास्ता मौजूद है। लेबर डिपार्टमेंट के नियमों का सेक्शन 656.31(b) PERM प्रोसेसिंग को रोकने की इजाज़त देता है, अगर किसी एम्प्लॉयर पर धोखाधड़ी की जांच चल रही हो। यह रोक शुरू में 180 दिनों तक के लिए हो सकती है और जांच जारी रहने पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है।
इसके लिए हर कंपनी की सही जांच होनी ज़रूरी है। अगर डिपार्टमेंट ऐसा नहीं कर पाता है, तो कंपनियाँ 'एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर एक्ट' के तहत इस रोक को मनमाना और बिना वजह बताया गया मानकर फेडरल कोर्ट में चुनौती दे सकती हैं। कुछ इमिग्रेशन वकील ऐसे ही कानूनी मामलों की उम्मीद कर रहे हैं।
आगे बढ़ने के तीन तरीके हैं। पहला, लोकल स्तर पर काम करना: TCS की योजना अगले पाँच सालों में 15,000 अमेरिकियों को नौकरी पर रखने की है, और दूसरी कंपनियों को भी ऐसा ही करना चाहिए।
दूसरा, नियमों का सख्ती से पालन करना: Cloudera का मामला दिखाता है कि PERM के तहत भर्ती भी आम भर्ती जैसी ही होनी चाहिए। तीसरा, अलग-अलग क्षेत्रों में विस्तार करना — जैसे यूरोप, खाड़ी देश और AI-आधारित सेवाएँ — ताकि वॉशिंगटन में होने वाली कोई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस 315 अरब डॉलर की इंडस्ट्री को हिला न सके। नई दिल्ली को नैसकॉम (Nasscom) की इस बात पर भी ज़ोर देना चाहिए कि इमिग्रेशन और कुशल टैलेंट की आवाजाही अलग-अलग मुद्दे हैं। भारतीय IT इंडस्ट्री ने खुद को ढालकर हर वीज़ा संकट का सामना किया है। यह आगे भी खुद को ढाल लेगी। लेकिन उसे यह मांग करनी चाहिए कि यह रोक कब खत्म होगी, इसका फैसला सबूतों के आधार पर हो, न कि चुनाव के कैलेंडर के आधार पर।
Next Story





