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सम्पादकीय

UP Panchayat Chunav Result: 2022 के विधानसभा चुनावों पर भी होगा अयोध्या-काशी-मथुरा में बीजेपी की हार का असर

Gulabi
4 May 2021 10:17 AM GMT
UP Panchayat Chunav Result: 2022 के विधानसभा चुनावों पर भी होगा अयोध्या-काशी-मथुरा में बीजेपी की हार का असर
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विधानसभा चुनाव

संयम श्रीवास्तव। स्थानीय बीजेपी इकाई का कहना है कि जिन स्थानीय नेताओं को इस बार पंचायत चुनाव का टिकट नहीं मिला उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ लिया और ऐसे बीजेपी के बागी एक दो नहीं बल्कि 13 थे. इन 13 सीटों पर बीजेपी के बागियों ने उसका खेल बिगाड़ दिया. पर अयोध्या में करीब 3 दशकों से पत्रकारिता कर रहे डॉक्टर दिनेश मिश्र का कहना है कि यह सही है कि बीजेपी का काम निर्दलीयों ने बिगाड़ा है पर निर्दलीयों ने समाजवादी पार्टी का भी काम बिगाड़ा है.


डॉक्टर दिनेश मिश्र का स्पष्ट कहना है कि जनता में कोरोना बीमारी को लेकर बरती गई लापरवाही बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है. अगर ऐसा ही रहा तो अगले विधानसभा चुनावों में बीजेपी अयोध्या क्षेत्र से साफ हो सकती है. कोरोना को लेकर स्थानीय प्रशासन की लापरवाही का उदाहरण देते हुए मिस्र कहते हैं कि यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अयोध्या में एक भी प्राइवेट अस्पताल को कोविड अस्पताल डिकलेयर नहीं किया गया. अब जाकर एक हॉस्पिटल को कोविड इलाज के लिए तैयार किया गया है वहां भी 8 हजार रुपये एक दिन का किराया है कि कौन जाएगा ऐसी हालत में दवा कराने.

मथुरा में किसान आंदोलन का असर
अयोध्या के बाद मथुरा की बात करें तो यहां भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर बहुत पुराना विवाद है. यहां भी मामला कोर्ट में तो है ही आए दिन अयोध्या की तरह यहां के आंदोलन को बड़ा बनाने का तैयारी चलती रहती है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए मथुरा का विकास टॉप प्रॉयरिटी में हैं. पर स्थानीय जनता में मन्दिर मस्जिद और मथुरा के विकास को लेकर कोई उत्साह नहीं है. यूपी में मथुरा उन जिलों में शुमार है जहां आरएलडी की पकड़ मजबूत है. इसके साथ ही किसान आंदोलन और कृषि कानून के चलते भी यहां के देहात के इलाके के किसान वोटर बीजेपी से खफा हैं. स्थानीय पत्रकार कपिल शर्मा कहते हैं कि किसान आंदोलन का यहां काफी असर है. किसान आंदोलन जब जोर पर था यहां के किसान नेता भी खूब सक्रिय थे, क्योंकि उन्हें स्थानीय जनता का सपोर्ट मिल रहा था. दूसरे स्थानीय सांसद की मथुरा से दूरी पर बीजेपी के कमजोर का होने का बड़ा कारण है.

हालांकि यहां सपा का हाल भी कुछ ठीक नहीं है. जबकि मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी ने यूपी के इस जिले में अच्छी खासी बढ़त बनाई है. बीएसपी का दावा है कि मथुरा में उसके सबसे ज्यादा 12 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है. जबकी बीजेपी को केवल 9 सीटों से ही संतोष करना पड़ रहा है. सपा की हालत यहां खस्ता है उसे केवल एक सीट पर जीत मिली है. जबकि अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी को यहां 8 सीटें मिली हैं जो बड़ी बात है. कांग्रेस तो विधानसभा चुनावों की तरह यहां भी रेस से बिल्कुल गायब है, उसके एक भी उम्मीदवार को यहां जीत नहीं मिली.

वाराणसी में बीजेपी को कोरोना ने मारा
बीजेपी की हालत सबसे खराब है पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जहां उसे 40 में से केवल 8 सीटों पर जीत मिली है. काशी पर बीजेपी की पकड़ अब कमजोर होती दिख रही है. इसीलिए पहले एमएलसी के चुनाव में भी बीजेपी पीछे रही और अब पंचायात चुनाव में भी उसका यही हाल है. वाराणसी में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने 14 सीटों पर जीत का दावा किया है. वहीं बहुजन समाज पार्टी ने यहां पांच सीटों पर जीत दर्ज की है. हालांकि निकाय चुनावों में बीजेपी की हार कोई नई बात नहीं है, 2015 में भी जब यहां चुनाव हुए थे तो बीजेपी को बड़ी हार झेलनी पड़ी थी.

बताया जा रहा है कि वाराणसी के पंचायत चुनावों में बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण जातीय समीकरण है. दरअसल बीजेपी को यह समझना होगा कि लोग पीएम मोदी को भले ही एक जुट हो कर वोट कर दें, लेकिन जब बात उनके गांव, कस्बे के प्रतिनिधि चुनने की आएगी तो यहां के लोग आज भी जातीय समीकरण देख कर ही वोट करते हैं. इसके साथ वाराणसी में कोरोना का भयावह रूप भी बीजेपी के हार एक अहम कारण बना. वाराणसी यूपी के कुछ उन जिलों में शामिल है जहां कोरोना का प्रकोप सबसे ज्यादा है. लोग यहा मेडिकल सुविधाएं ना मिलने से खासा गुस्से में थे. यही वजह है कि वाराणसी में बीजेपी को इतनी करारी हार झेलनी पड़ी.
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