सम्पादकीय

UP Assembly Elections: क्या स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और 'रावण' जैसे कथित क्षत्रपों का गढ़ बचेगा?

Rani Sahu
15 Jan 2022 1:17 PM GMT
UP Assembly Elections: क्या स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और रावण जैसे कथित क्षत्रपों का गढ़ बचेगा?
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बरेली के मशहूर शायर प्रोफ़ेसर वसीम बरेलवी (Wasim Barelvi) का ये शेर अर्ज़ करता है

पंकज त्रिपाठी बरेली के मशहूर शायर प्रोफ़ेसर वसीम बरेलवी (Wasim Barelvi) का ये शेर अर्ज़ करता है कि यूपी की चुनावी (UP Assembly Elections) सियासत में इस बार जिन पिछड़े, वंचितों, शोषित, ग़रीबों और किसानों की बात हर दिशा से गूंज रही है, वो उस वर्ग के लिए नहीं बल्कि ख़ुद के राजनीतिक वजूद के लिए है. यानि जो लोग दलितों और पिछड़ों के नाम पर अपने हितों की क़ुर्बानी देने का दावा कर रहे हैं, वो कहीं ना कहीं अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए दलितों का सहारा लेकर नए-नए दलों में जाकर हुंकार भर रहे हैं.

उन नेताओं के कहे गए एक-एक शब्द चुनाव नतीजों में आईने का काम करेंगे. उस सियासी आईने में नज़र आ रही चुनावी तस्वीर कुछ ख़ास बातों से साफ होती है. समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के खेमे से लगातार दलितों-पिछड़ों के हित की बातें वो लोग उछाल रहे हैं, जो अपनी-अपनी जगह छोड़कर दूसरे दल में 'सुरक्षित' एंट्री कर रहे हैं. 14 जनवरी को स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं- 'BJP में पिछड़ों का कोई सम्मान नहीं है, इसलिए पार्टी छोड़कर अब अखिलेश के साथ आ गया हूं.' शाम तक बरेली से समाजवादी पार्टी के MLC घनश्याम लोधी ने ये कहकर पार्टी छोड़ दी कि समाजवादी पार्टी में पिछड़ों, दलितों और वंचितों के लिए कोई जगह नहीं है.
15 जनवरी को भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर रावण ने अखिलेश से हाथ छुड़ा लिया. वो भी यही कहकर अलग हो गए कि समाजवादी पार्टी में पिछड़ों के नाम पर सिर्फ़ एक ख़ास बिरादरी के लोगों को सम्मान मिलता है. वहीं, मायावती ने भी अपने जन्मदिन पर केक काटा और साफ कर दिया कि दलितों, वंचितों, शोषितों और ग़रीबों की पार्टी BSP ही है. अब इन सभी सियासी क्षत्रपों के उस वर्चस्व को समझिए, जो पहली बार निर्णायक तौर पर वंचितों की कसौटी पर हैं.
स्वामी प्रसाद के लिए सियासी वजूद की लड़ाई
कुशीनगर की पडरौना सीट से पांच बार के विधायक स्वामी प्रसाद मौर्य का दावा है कि वो 2022 के चुनाव में BJP के खाते से OBC वोटबैंक को पूरी तरह ख़त्म करके दम लेंगे. लेकिन, यहां सवाल ये है कि 22.23 फीसदी वोटबैंक के साथ मायावती की BSP दूसरे नंबर की पार्टी बनी. 2017 के चुनाव में मायावती को 3.68 फीसदी वोट प्रतिशत का नुक़सान हुआ था. स्वामी प्रसाद मौर्य 2016 में पार्टी छोड़ चुके थे. BSP से उनके अलग होने के एक साल बाद विधानसभा चुनाव हुआ और उसमें भी मायावती की BSP दूसरे नंबर की पार्टी बनकर अपना वोटबैंक और दलितों-पिछड़ों पर अपना असर बरक़रार रखने में कामयाब रही. तब भी स्वामी प्रसाद मौर्य ने यही कहा था कि BSP में दलितों-पिछड़ों की सुनवाई नहीं है. स्वामी प्रसाद मौर्य एक बार फिर वही दावा कर रहे हैं कि वो जिसके साथ होते हैं, जीत उसी की होती है.
जबकि 2012 में वो मायावती के साथ थे, लेकिन सत्ता समाजवादी पार्टी की आई थी. बहरहाल, स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए 2022 का चुनाव दलितों, पिछड़ों और वंचितों के बजाय उनके अपने राजनीतिक वजूद की लड़ाई बन चुका है. क्योंकि, वो BSP और BJP से नाता तोड़ चुके हैं. अब समाजवादी पार्टी के साथ आ गए हैं. BSP छोड़ने के बाद एक साल तक वो BJP के लिए कथित तौर पर पिछड़ों के वोटबैंक को साधते रहे थे, लेकिन इस बार तो उनके पास अपना कथित करिश्मा दोहराने का वक़्त बहुत कम है. दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य जिस OBC वोटबैंक की धारा को समाजवादी पार्टी की ओर मोड़ने का दावा कर रहे हैं, वो नामुमकिन से कम नहीं है. क्योंकि, OBC के जिस वर्ग की नाराज़गी अखिलेश की पार्टी से है, वो लोग सिर्फ़ स्वामी प्रसाद मौर्य का चेहरा देखकर साइकिल पर सवार हो जाएंगे, इसके आसार बिल्कुल भी आसान नहीं लग रहे. इसलिए, इस चुनाव में अगर स्वामी प्रसाद मौर्य वो कर पाए, जो कह रहे हैं, तो उनका सियासी क़द अर्श पर होगा, वर्ना नतीजों के बाद उनके लिए राजनीतिक फ़र्श तलाशना भी बहुत मुश्क़िल हो जाएगा.
दारा सिंह चौहान का सियासी भविष्य क्या होगा?
पूर्वांचल में BJP के लिए पिछड़े वर्ग का चेहरा बनकर मायावती से अलग हुए दारा सिंह चौहान अब BJP से भी हाथ छुड़ा चुके हैं. आज़मगढ़ के रहने वाले दारा सिंह मऊ ज़िले में जिस वोटबैंक की सियासत करते हैं, वो नोनिया चौहान बिरादरी है. दारा सिंह चौहान OBC वर्ग में आने वाली अति पिछड़ी जाति नोनिया चौहान का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं. BJP ने उन्हें पिछड़ा कल्याण मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था. कांशीराम के साथ जुड़कर अति पिछड़ों के लिए काम करने वाले दारा को 1996 में पहली बार BSP ने राज्यसभा भेजा. साल 2000 में दूसरी बार BSP से राज्यसभा पहुंचे. लेकिन, 2004 में समाजवादी पार्टी में आ गए. SP के टिकट पर घोसी लोकसभा से चुनाव लड़े और हार गए. फिर BSP में वापसी कर ली.
अबकी बार 2009 में BSP के टिकट पर घोसी लोकसभा से लड़े और संसद पहुंचे. 2014 के लोकसभा चुनाव में BSP ने फिर उन्हें घोसी से टिकट दिया, लेकिन मोदी लहर में हार गए. लिहाज़ा राजनीतिक वजूद की लड़ाई लड़ रहे दारा 2015 में BSP का साथ छोड़कर BJP में आ गए. BJP ने मऊ की मधुबन सीट से विधानसभा लड़ाया और जीतकर वो कैबिनेट मंत्री बने. मूल रूप से वो बिहार के राज्यपाल फागू चौहान के क्षेत्र से हैं और कहा जाता है कि वही उन्हें सक्रिय राजनीति में लेकर आए. दारा सिंह चौहान की पहली वफ़ादारी BSP के साथ दिखी. फिर समाजवादी पार्टी में चले गए, फिर BSP, BJP और अब दूसरी बार समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं.
दारा सिंह चौहान को समाजवादी पार्टी में अपना राजनीतिक क़द साबित करने के लिए एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरना होगा. क्योंकि, तभी वो साबित कर पाएंगे कि जिस अति पिछड़ी बिरादरी की वो रहनुमाई करते हैं, वो किसी पार्टी के साथ नहीं बल्कि उनके ख़ुद के नाम पर जुड़ी है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव नतीजों के बाद दारा के लिए आगे की राजनीतिक लड़ाई मुश्क़िल हो जाएगी. क्योंकि, नोनिया चौहानों को तो नया नेता मिल जाएगा, लेकिन दारा सिंह चौहान अपने ही राजनीतिक अखाड़े में कमज़ोर हो सकते हैं. लिहाज़ा उन्हें ये साबित करना ही होगा कि जिन दलितों-पिछड़ों की अनदेखी के नाम पर वो BJP से अलग हुए हैं, उन लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता पहले जैसी है. हालांकि, ये सब इतना आसान नहीं होगा.
चंद्रशेखर रावण के पलटने की असली वजह क्या है?
भीम आर्मी के चीफ़ और दलितों-पिछड़ों की राजनीति से अपना सियासी सफ़र शुरू करने वाले चंद्रशेखर रावण की आज़ाद समाज पार्टी पहली बार यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी क़िस्मत आज़मा रही है. 14 अप्रैल 2020 को आसपा के गठन के बाद उसी साल बुलंदशहर से पार्टी ने उपचुनाव लड़ा. आसपा ने यहां तीसरा स्थान हासिल किया. पार्टी के प्रत्याशी हाजी यामीन को 13 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले थे. उसके बाद बिहार चुनाव में भी हाथ आज़माया. लेकिन, तीसरे नंबर से पहले नंबर पर आने के बीच का जो फ़ासला है, वो तय करना चंद्रशेखर रावण के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. वो BJP के ख़िलाफ़ आग उगलते हुए अखिलेश के साथ गलबहियां करते देखे गए. लेकिन, चुनाव से ठीक पहले अब वो अखिलेश को ही आंखें दिखाने लगे हैं.
जिस वक़्त दलित और पिछड़ा वर्ग के कई नेता साइकिल की सवारी करने लगे, उसी वक़्त चंद्रशेखर ने साइकिल का साथ छोड़ दिया. वो भी समाजवादी पार्टी से अलग होने की वही वजह बता रहे हैं, जो नेता BJP से अलग होने पर कह रहे हैं. यानि यहां सवाल ये है कि चंद्रशेखर रावण भले ही BJP के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जिस वोटबैंक की सियासत वो करते हैं, उसी वर्ग के कई नेता BJP छोड़कर अखिलेश के साथ आ गए हैं. तो क्या चंद्रशेखर रावण समाजवादी पार्टी और BJP की सीधी जंग में दलितों-पिछड़ों का वोटबैंक अखिलेश की ओर मोड़ने से रोकने के लिए 'विभीषण' की भूमिका निभाएंगे?
दरअसल, चंद्रशेखर रावण के लिए भी इस बार के चुनाव नतीजे ये तय कर देंगे कि राजनीतिक मोलभाव में उनका वज़न कितना है. क्योंकि, इस वक़्त राजनीतिक तौर पर वो जहां खड़े हैं, वहां किसी को जिताने से ज़्यादा, किसी को हराने या खेल बिगाड़ने की भूमिका में ज़्यादा फ़िट बैठते हैं. ऐसे में मायावती का गढ़ यानि सहारनपुर ये सुनिश्चित करेगा कि चंद्रशेखर रावण का दलितों-पिछड़ों के वोटबैंक पर कितना असर है? अगर वो BJP, समाजवादी पार्टी या BSP का खेल बिगाड़ पाए, तो भी सीधे तौर पर किसी भी दल से राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा. हां इतना ज़रूर है कि अगर अंदरखाने कोई डील हो जाए, तो वो BJP या BSP किसी को भी त्वरित लाभ देने में मददगार साबित हो सकते हैं. कुल मिलाकर 2022 के नतीजे यूपी की सियासत में चंद्रशेखर रावण और आज़ाद समाज पार्टी का भविष्य निर्धारित करेंगे. अगर वो दलितों-पिछड़ों की असली और दमदार आवाज़ हैं, तो उस आवाज़ को वोटबैंक और जीती हुई सीटों में तब्दील करना सबसे बड़ी चुनौती होगी.
दलितों-पिछड़ों के नाम पर 'सौदेबाज़ी' बढ़ेगी या ख़त्म होगी?
10 मार्च के जनादेश से एक बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव ये हो सकता है कि चुनाव नतीजे दलितों-पिछड़ों को लेकर एक नई दिशा देंगे. अगर दलितों-पिछड़ों को लेकर तमाम तरह के दावे करने वाले उस वर्ग के नेताओं को जनता ने दलबदल और गठबंधन के जोड़-तोड़ के बावजूद स्वीकार कर लिया, तो राजनीतिक बाज़ार में उनके नाम पर 'सौदेबाज़ी' बढ़ सकती है. अगर जनता ने ऐसे नेताओं को नकार दिया, जो भले ही किसी भी दल में रहें, लेकिन सत्ता में रहने के बाद किसी वजह से पार्टी छोड़कर पिछड़े और दलित हित के रागदरबारी बनने का खेल करते हैं, तो UP के सियासी भविष्य में एक ऐसी लाइन खींच सकती है, जहां दलितों-पिछड़ों को चुनावी खिलौना बनाकर कोई नेता नहीं बेच सकेगा.
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