सम्पादकीय

दो बंटे हुए लोकतंत्र

Subhi
3 July 2022 3:49 AM GMT
दो बंटे हुए लोकतंत्र
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सात मार्च 2022 से तेरह मार्च 2022 के बीच प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में यह सामने आया कि इकसठ फीसद अमेरिकी वयस्क सभी या ज्यादातर मामलों में गर्भपात को वैध बनाने के पक्ष में थे

पी. चिदंबरम: सात मार्च 2022 से तेरह मार्च 2022 के बीच प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में यह सामने आया कि इकसठ फीसद अमेरिकी वयस्क सभी या ज्यादातर मामलों में गर्भपात को वैध बनाने के पक्ष में थे, जबकि सैंतीस फीसद इसके विरोध में। यह विभाजन राजनीतिक तौर पर भी है। डेमोक्रेट और डेमोक्रेट की ओर झुकाव रखने वाले निर्दलीयों (अस्सी फीसद) ने गर्भपात का समर्थन किया और रिपब्लिकन व इनकी ओर झुकाव रखने वाले निर्दलीय (अड़तीस फीसद) इसके विरोध में रहे। साल 2016 के बाद यह फर्क तैंतीस से बढ़ कर बयालीस अंक तक पहुंच गया है।

हालांकि इन सबका कोई महत्त्व नहीं है। मामला यह है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्याय वही होते हैं जो संविधान कहता है। सबसे लंबे समय तक काम करने वाले अमेरिका के प्रधान न्यायाधीश जान मार्शल ने कहा था कि 'सुस्पष्ट रूप से न्याय विभाग (यानी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट) का अधिकार क्षेत्र और कर्तव्य वही कहता है जो कानून कहता है' और यह वाक्य अमेरिका में पवित्रता लिए हुए है।

वर्ष 1973 में रो बनाम वेड मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि गर्भपात का अधिकार 'आजादी' का हिस्सा है, जो 'नियत' अवधि की धारा वाले चौदहवें संशोधन सहित संविधान के कई प्रावधानों से संरक्षित है। बीस साल बाद 'प्लान्ड पेरेंटहुड आफ साउथईस्टर्न पेनसिल्वेनिया बनाम केसे' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रो बनाम वेड के निष्कर्षों की कानून-सम्मत पुष्टि की। अमेरिका में महिलाओं की तीन पीढ़ियों ने गर्भपात के अधिकार के साथ जीवन गुजारा है।

24 जून 2022 को डाब्स बनाम जैकसन वुमेंस हेल्थ आर्गनाइजेशन मामले में पांच-तीन के बहुमत (ट्रंप द्वारा नियुक्त किए गए तीन जजों सहित) से सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि 'संविधान गर्भपात का अधिकार प्रदान नहीं करता है'। रो बनाम वेड मामले में दिए गए कारणों को भंयकर रूप से गलत करार देते हुए अदालत ने कहा कि 'गर्भपात को नियंत्रित करने की शक्ति लोगों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों को लौटाई जाती है'।

पहली शर्म की बात तो यही कि लगता है 'लोगों' को अधिकार लौटाना सही काम है। लेकिन यहां 'लोग' का मतलब सभी लोग नहीं हैं, या सभी वयस्क या सभी मतदाता नहीं हैं जो अमेरिका के जनमत संग्रह में वोट देते हैं। अगर ऐसा होता तो अमेरिका के लोग 'रो' और 'केसे' के पक्ष में जम कर वोट देते।

यहां 'लोगों' का मतलब है राज्यों द्वारा बांट दिए गए लोग और 'उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों' से आशय है कि विभिन्न आकारों वाले निर्वाचन क्षेत्रों, जो राजनीतिक हितों के हिसाब से बना दिए गए थे, के निर्वाचकों द्वारा चुने गए सांसद। संक्षेप में कहें तो 'गोलमाल करना'।

कम से कम गृहयुद्ध के बाद अमेरिका इतना विभाजित कभी नहीं हुआ, जितना कि आज। पचास राज्यों में से आधे राज्य ऐसे कानून बनाने या पुष्टि करने के फेर में हैं जो गर्भपात को व्यावहारिक रूप से गैरकानूनी बना देंगे, और बाकी आधे राज्य दूसरी तिमाही तक गर्भपात की अनुमति दे देंगे।

अब लाखों अमेरिकी महिलाओं को अनियोजित या अनचाहे गर्भ, बलात्कारी की संतान, एक ऐसा बच्चा जो व्यभिचार से गर्भ में आया हो, या एक ऐसा बच्चा जिसकी मां उसे इसलिए नहीं पैदा करना चाहती है कि उसका पालन कैसे होगा, या ऐसा बच्चा जिसे किसी तरह का स्नेह या देखभाल नहीं मिलेगी, जैसी परिस्थितियों में गर्भपात के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला खौफनाक रूप से दोषयुक्त है क्योंकि यह फैसला जिससे न्यायविद सदमे में हैं, इस तर्क पर टिका है कि 'गर्भपात को लेकर संविधान में कोई संदर्भ नहीं है'। अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्र के इतिहास और परंपरा में गर्भपात के अधिकार की जड़ें गहरी नहीं रहीं।

अगर संवैधानिकता की यही कसौटी है तो अमेरिकियों को मिले ऐसे अधिकार जिन्हें वे सहज मान कर चलते रहे हैं, इक्कीसवीं सदी में खत्म कर दिए जाएंगे। उदाहरण के लिए, अमेरिकी संविधान में निजता के अधिकार का कोई जिक्र नहीं है। अमेरिका के इतिहास और परंपराओं में नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव की जड़ें काफी गहरी हैं।

गर्भनिरोधकों की इजाजत नहीं होगी। समान लिंग वाले दो पुरुषों या स्त्रियों के बीच यौन संबंध अपराध होगा। ऐसे और ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं।डाब्स को जैसा कि मैंने पढ़ा, मेरा मानना है कि गर्भपात को लेकर अधिकार लौटाने का मतलब यह नहीं है कि कानून के अनुरूप कोई राज्य किसी गर्भवती महिला को बच्चे के जन्म तक उसे गर्भ में रखने के लिए बाध्य कर सकता है। राज्य का कानून उन्हीं नागरिकों पर लागू होगा जो उस राज्य के दायरे में आते हैं। कानून राज्य की सीमा से बाहर काम नहीं करेगा।

गर्भवती महिला गर्भपात-समर्थक राज्य में जा सकती है और गर्भपात करवा सकती है। संघीय कार्यपालिका या कोई धर्मार्थ संस्था उस महिला को यात्रा खर्च दे सकती है जो गर्भपात करवाना चाहती है या जिसे ऐसा करवाने की जरूरत है।

डाब्स में त्रुटि यह है कि यह न केवल व्यक्ति से संबंधित आतंरिक मामलों में राज्य के अधिकारों को व्यक्ति के अधिकारों से ऊपर रखता है, बल्कि समाज या राज्य को लेकर भी उसके सरोकार बेहद सीमित हैं।

इस बात का शुक्र है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के अधिकार को निजता के अधिकार में रखा है, ठीक वैसे ही जैसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। भारत में, कानून चौबीस हफ्ते तक की अवधि के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से गिराने की इजाजत देता है।

और उसके बाद दो चिकित्सकों की सलाह पर, जिसमें यह शर्त भी शामिल है कि गर्भधारण जारी रखने से महिला को शारीरिक या मानसिक रूप से गंभीर खतरे हो सकते हैं, गर्भपात की इजाजत दी जा सकती है।

गर्भपात को कानूनी रूप देने के बाद कई सर्वेक्षणों में यह सामने आया था कि महिलाओं में पढ़ने या काम करने की क्षमता तेजी से बढ़ी थी। डाब्स ने अमेरिका को गलत रास्ते पर धकेल दिया है। अमेरिका बंट गया है।

जाति, धर्म, भाषा और लैंगिक समानता को लेकर भारत पहले ही से बंटा हुआ है और अब भाजपा का बहुसंख्यकवाद और उसकी केंद्रीयकृत नीतियां बंटवारे की खाई और चौड़ी कर रही हैं, लेकिन इस पर अलग से लिखने की जरूरत है। क्या आपने कभी कल्पना की कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब दो सबसे बड़े संघीय लोकतंत्र देशों को इस तरह बांट देंगे?


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