सम्पादकीय

ट्रम्प हारे नहीं बल्कि पर्यावरण की जीत हुई है

Gulabi
9 Nov 2020 4:08 PM GMT
ट्रम्प हारे नहीं बल्कि पर्यावरण की जीत हुई है
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बिडेन ने शुरू से ही स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे को अपने आर्थिक सुधार-नौकरियों के कार्यक्रम के मूल स्तंभ बनाया

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। तीन साल पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने जब पैरिस समझौते से हाथ पीछे खींचे थे तब उन्होंने महज एक प्रशासनिक फैसला ही नहीं लिया था बल्कि पूरी दुनिया को जलवायु संकट में झोंका था। उसका असर कुछ ऐसा हुआ कि दुनिया भर में जलवायु नीति पर काम करने वालों में हताशा, और मायूसी ने घर कर लिया। लेकिन तीन साल बाद, डोनाल्ड ट्रम्प की हार के साथ ही आज उन सभी में जीत की खुशी है। और ये खुशी जो बिडेन की जीत से ज्यादा इस बात पर है कि अब बिडेन के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक जंग में जीत की संभावना बढ़ गई है। ट्रम्प के जाते ही आखिर अब परिवर्तन की हवा जो चल पड़ी है। बिडेन-हैरिस जीत ने अमेरिका में संघीय जलवायु नीति के एक नए युग का संकेत दिया है।

दरअसल बिडेन ने शुरू से ही स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे को अपने आर्थिक सुधार और नौकरियों के कार्यक्रम के मूल स्तंभ बनाया और इस क्षेत्र में 2 ट्रिलियन डॉलर के निवेश पर अपना कैंपेन चलाया। बिडेन ने चुनावी नतीजों के साफ होते ही अमेरिका के लैंडमार्क पेरिस समझौते से वापस जुड़ने के अपने वादे की प्रतिबद्धता फिर से जाहिर भी की। वैसे पेरिस समझौते से अगर एक बार बिडेन न भी जुड़ें तो भी उनके पास तमाम ऐसे विकल्प हैं जिनकी मदद से वो पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सकते हैं। बिडेन अगर चाहें तो न सिर्फ ओबामा-युग की पर्यावरण अनुकूल नीतियां बहाल कर सकते हैं, वो चाहें तो उन्हें मजबूत भी कर सकते हैं। उन नीतियों में जीवाश्म ईंधन के उत्पादन पर लगाम लगाना और इंधन उपयोग और उपभोग के सख्त नियम शामिल हैं।

सदन में डेमोक्रेटस और सीनेट में उदारवादी रिपब्लिकन के साथ काम करते हुए, नए प्रशासन से स्वच्छ ऊर्जा टैक्स क्रेडिट, रिन्यूएबल जेनेरशन, ऊर्जा भंडारण और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों का विस्तार करने की अपेक्षा है। इमारतों, परिवहन और उद्योग में ऊर्जा दक्षता के उपायों पर भी विचार किए जाने की संभावना है। जो बिडेन और कमला की जीत इस बात का सबूत है कि लोगों ने अपनी आवाज उठाई है, और उन्होंने तय किया है कि हम ट्रम्पवाद से उबर चुके हैं, जलवायु परिवर्तन की अनदेखी के दौर से बाहर निकल आये हैं अब जीवाश्म ईंधन निमार्ताओं के चंगुल से राजनीतिक व्यवस्था को बाहर निकालने के लिए तैयार हैं। अब हम सब को एक बेहतर भविष्य का इंतजार है।

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