सम्पादकीय

गरिमा बहाली की दिशा में : महिला अस्मिता के लिए कुप्रथाओं पर रोक के पुरजोर प्रयास करने ही होंगे

Rounak Dey
5 Nov 2022 8:23 AM IST
गरिमा बहाली की दिशा में : महिला अस्मिता के लिए कुप्रथाओं पर रोक के पुरजोर प्रयास करने ही होंगे
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दिशा में उठाया गया एक सही कदम है।
लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक विकास के मामले में भारत हमेशा पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में आगे रहा है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कुछ जरूरी कदम भारत से पहले ही इन दो देशों में उठा लिए गए। जैसे कि तीन तलाक की कुप्रथा। अफगानिस्तान, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, मलयेशिया, जॉर्डन, मिस्र, ईरान, इराक, इंडोनेशिया, लीबिया, सूडान, सऊदी अरब, मोरक्को और कुवैत जैसे देशों में भारत से पहले ही तीन तलाक की कुप्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
इसी तरह कौमार्य परीक्षण पर भी अनेक देशों में प्रतिबंध है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इस पर रोक है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में इस पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। देर से यह कदम उठाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय धन्यवाद का हकदार है। उसने ठीक ही यह कहा है कि यौन उत्पीड़न के मामले में पीड़िता का 'टू फिंगर टेस्ट' कराने वाला भी कदाचार का दोषी माना जाएगा। अदालत ने माना है कि यह टेस्ट एक गलत धारणा पर आधारित है कि यौन रूप से सक्रिय महिला का बलात्कार नहीं हो सकता।
सच्चाई इससे कुछ अलग भी हो सकती है, और किसी महिला का यौन इतिहास जानना महत्वहीन है। कौमार्य परीक्षण एक अर्थ में यौन हिंसा ही है। प्राचीन काल से ही पुरुषवर्चस्ववादी समाज में कौमार्य परीक्षण की परंपरा रही है। इसके तहत नवविवाहिता वधू के कौमार्य परीक्षण की व्यवस्था हमारे समाज में रही है। चूंकि डॉक्टर दो उंगलियों से इसका परीक्षण करते हैं, इसलिए इसका नाम 'टू फिंगर टेस्ट' है। किसी के साथ बलात्कार हुआ है या नहीं, इसकी जांच के लिए भी 'टू फिंगर टेस्ट' किया जाता है।
इसमें डॉक्टर इसका पता लगाते हैं कि पीड़िता की योनि की झिल्ली अक्षत है या नहीं। अगर वह अक्षत है, तो बलात्कार नहीं हुआ, अगर अक्षत नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि बलात्कार हुआ है। इस परीक्षण में डॉक्टर योनि का परीक्षण भी करते हैं। जांच के ये तमाम तरीके वस्तुतः पुरुषवर्चस्ववादी सोच के बारे में ही बताते हैं। मसलन, अगर 'टू फिंगर टेस्ट' में डॉक्टर पाते हैं कि शिकायत दर्ज करने वाली महिला शारीरिक संपर्क की अभ्यस्त है, तो फिर उसकी शिकायत को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता।
इसी तरह 'टू फिंगर टेस्ट' में अगर बलात्कार की पुष्टि होती है, तो ऐसे मामलों में कई बार लड़कियों के चरित्र की तहकीकात की जाती है। इन्हें पुरुषवर्चस्ववादी सोच के सिवा भला और क्या कहें! गौर करने वाली बात यह है कि बलात्कार की परिभाषा अब बदल गई है। इसकी परिभाषा अब ज्यादा व्यापक है। उदाहरण के लिए, ताकत के बल पर किसी को नग्न करना और उसे अपने या किसी दूसरे का जननांग स्पर्श करने के लिए बाध्य करना भी बलात्कार के दायरे में आता है। अक्षतयोनि लड़कियां भी बलात्कार की शिकार हो सकती हैं।
ऐसे ही किसी पुरुष के शारीरिक संपर्क के बगैर भी कोई लड़की कौमार्य परीक्षण में फेल हो सकती है। इस तरह देखें, तो आधुनिक समाज में 'टू फिंगर टेस्ट' का अनौचित्य, इसकी अनैतिकता और अवैज्ञानिकता बार-बार प्रमाणित हुई है। कभी किसी समाज में पुरुषों के कौमार्य परीक्षण की परंपरा नहीं रही है। इस मामले में लड़कियां और महिलाएं ही प्राचीन काल से अब तक बार-बार अपमानित-असम्मानित होती रही हैं। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक बार पुरुष का शिकार होने के बाद 'टू फिंगर टेस्ट' में उसे फिर डॉक्टर का शिकार होना पड़ता है।
सवाल यह है कि ऐसी लड़कियों के प्रति हमारे समाज में घृणा और हिकारत की भावना ही क्यों पनपती है। ऐसा क्यों मान लिया जाता है कि इनकी जिंदगी अब खत्म और व्यर्थ हो गई है? लड़कियों और महिलाओं को यौन अत्याचार के क्रूर अनुभवों से गुजरना पड़ता है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? हमारा समाज, हमारी पुलिस व्यवस्था और हमारी पुरुषवर्चस्ववादी सोच। वस्तुत: ऐसी लड़कियां घृणा की नहीं, संवेदना की हकदार हैं।
बलात्कार से लड़कियों और स्त्रियों का जीवन खत्म नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि समाज की तरफ से ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि वे सिर उठाकर जीने और जीवन में कुछ सार्थक कर पाने का आत्मविश्वास हासिल कर पाएं। लेकिन एक यंत्रणा के बाद उन्हें कौमार्य परीक्षण की दूसरी यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक में जब लोगों ने लोकतंत्र के लिए आंदोलन शुरू किया था, तब सेना के जवानों ने कुछ आंदोलनकारी लड़कियों को जबरन उठवाकर उनका कौमार्य परीक्षण करवाया था।
इससे यह पता चलता है कि कौमार्य परीक्षण स्त्रियों को प्रताड़ित करने का भी औजार है। मुझे हैरानी होती है कि इस 21वीं सदी में भी कौमार्य परीक्षण की यह परंपरा दुनिया के अनेक देशों में कायम है। मध्यकाल में यूरोप के योद्धा जब लड़ाई लड़ने दूर जाते थे, तब अपनी स्त्रियों की कमर में वे लोहे की एक बेड़ी लगाकर जाते थे, जिससे कि उनका किसी दूसरे पुरुष से शारीरिक संपर्क न हो पाए। सिर्फ पति के आदेश से नहीं, बल्कि समाज के निर्देश पर भी अक्सर महिलाओं की कमर में वे बेड़ियां लगाई जाती थीं।
लेकिन बाहर जाते पुरुषों को ये बेड़ियां नहीं लगाई जाती थीं। उनके स्वच्छंद आचरण में किसी तरह की कोई बाधा नहीं थी। इटली के अलावा चीन में महिलाओं की कमर में बेड़ी लगाने के मध्यकालीन उदाहरण मिलते हैं। यह जानकर हैरानी होगी कि बीती सदी के 70 के दशक में इंग्लैंड में कौमार्य परीक्षण की वापसी हुई थी। दरअसल तब दूसरे देशों की जो भी कुंवारी लड़कियां इंग्लैंड में बसने के लिए आती थीं, उन लड़कियों का कौमार्य परीक्षण (वर्जिनिटी टेस्ट) किया जाता था। अमेरिका में भी बीच बीच में कौमार्य परीक्षण की बर्बरता से लड़कियों को गुजरना पड़ता है।
महिलाओं की कमर में बेड़ी लगाने के उदाहरण अब भले न हों, लेकिन महिलाओं के प्रति उस पुरुषवर्चस्ववादी सोच में कोई फर्क नहीं आया है। जबकि स्त्री के शरीर में बेड़ी लगाने का समाज को कोई अधिकार नहीं है। स्त्री के लिए आर्थिक आजादी जितनी जरूरी है, उतनी ही शारीरिक आजादी भी। यह आजादी न मिले, तो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी मिलने का कोई व्यापक और वास्तविक अर्थ नहीं है। भारत में 'टू फिंगर टेस्ट' से मुक्ति यहां की महिलाओं की गरिमा की बहाली की दिशा में उठाया गया एक सही कदम है।लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक विकास के मामले में भारत हमेशा पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में आगे रहा है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कुछ जरूरी कदम भारत से पहले ही इन दो देशों में उठा लिए गए। जैसे कि तीन तलाक की कुप्रथा। अफगानिस्तान, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, मलयेशिया, जॉर्डन, मिस्र, ईरान, इराक, इंडोनेशिया, लीबिया, सूडान, सऊदी अरब, मोरक्को और कुवैत जैसे देशों में भारत से पहले ही तीन तलाक की कुप्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
इसी तरह कौमार्य परीक्षण पर भी अनेक देशों में प्रतिबंध है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इस पर रोक है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में इस पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। देर से यह कदम उठाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय धन्यवाद का हकदार है। उसने ठीक ही यह कहा है कि यौन उत्पीड़न के मामले में पीड़िता का 'टू फिंगर टेस्ट' कराने वाला भी कदाचार का दोषी माना जाएगा। अदालत ने माना है कि यह टेस्ट एक गलत धारणा पर आधारित है कि यौन रूप से सक्रिय महिला का बलात्कार नहीं हो सकता।
सच्चाई इससे कुछ अलग भी हो सकती है, और किसी महिला का यौन इतिहास जानना महत्वहीन है। कौमार्य परीक्षण एक अर्थ में यौन हिंसा ही है। प्राचीन काल से ही पुरुषवर्चस्ववादी समाज में कौमार्य परीक्षण की परंपरा रही है। इसके तहत नवविवाहिता वधू के कौमार्य परीक्षण की व्यवस्था हमारे समाज में रही है। चूंकि डॉक्टर दो उंगलियों से इसका परीक्षण करते हैं, इसलिए इसका नाम 'टू फिंगर टेस्ट' है। किसी के साथ बलात्कार हुआ है या नहीं, इसकी जांच के लिए भी 'टू फिंगर टेस्ट' किया जाता है।
इसमें डॉक्टर इसका पता लगाते हैं कि पीड़िता की योनि की झिल्ली अक्षत है या नहीं। अगर वह अक्षत है, तो बलात्कार नहीं हुआ, अगर अक्षत नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि बलात्कार हुआ है। इस परीक्षण में डॉक्टर योनि का परीक्षण भी करते हैं। जांच के ये तमाम तरीके वस्तुतः पुरुषवर्चस्ववादी सोच के बारे में ही बताते हैं। मसलन, अगर 'टू फिंगर टेस्ट' में डॉक्टर पाते हैं कि शिकायत दर्ज करने वाली महिला शारीरिक संपर्क की अभ्यस्त है, तो फिर उसकी शिकायत को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता।
इसी तरह 'टू फिंगर टेस्ट' में अगर बलात्कार की पुष्टि होती है, तो ऐसे मामलों में कई बार लड़कियों के चरित्र की तहकीकात की जाती है। इन्हें पुरुषवर्चस्ववादी सोच के सिवा भला और क्या कहें! गौर करने वाली बात यह है कि बलात्कार की परिभाषा अब बदल गई है। इसकी परिभाषा अब ज्यादा व्यापक है। उदाहरण के लिए, ताकत के बल पर किसी को नग्न करना और उसे अपने या किसी दूसरे का जननांग स्पर्श करने के लिए बाध्य करना भी बलात्कार के दायरे में आता है। अक्षतयोनि लड़कियां भी बलात्कार की शिकार हो सकती हैं।
ऐसे ही किसी पुरुष के शारीरिक संपर्क के बगैर भी कोई लड़की कौमार्य परीक्षण में फेल हो सकती है। इस तरह देखें, तो आधुनिक समाज में 'टू फिंगर टेस्ट' का अनौचित्य, इसकी अनैतिकता और अवैज्ञानिकता बार-बार प्रमाणित हुई है। कभी किसी समाज में पुरुषों के कौमार्य परीक्षण की परंपरा नहीं रही है। इस मामले में लड़कियां और महिलाएं ही प्राचीन काल से अब तक बार-बार अपमानित-असम्मानित होती रही हैं। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक बार पुरुष का शिकार होने के बाद 'टू फिंगर टेस्ट' में उसे फिर डॉक्टर का शिकार होना पड़ता है।
सवाल यह है कि ऐसी लड़कियों के प्रति हमारे समाज में घृणा और हिकारत की भावना ही क्यों पनपती है। ऐसा क्यों मान लिया जाता है कि इनकी जिंदगी अब खत्म और व्यर्थ हो गई है? लड़कियों और महिलाओं को यौन अत्याचार के क्रूर अनुभवों से गुजरना पड़ता है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? हमारा समाज, हमारी पुलिस व्यवस्था और हमारी पुरुषवर्चस्ववादी सोच। वस्तुत: ऐसी लड़कियां घृणा की नहीं, संवेदना की हकदार हैं।
बलात्कार से लड़कियों और स्त्रियों का जीवन खत्म नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि समाज की तरफ से ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि वे सिर उठाकर जीने और जीवन में कुछ सार्थक कर पाने का आत्मविश्वास हासिल कर पाएं। लेकिन एक यंत्रणा के बाद उन्हें कौमार्य परीक्षण की दूसरी यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक में जब लोगों ने लोकतंत्र के लिए आंदोलन शुरू किया था, तब सेना के जवानों ने कुछ आंदोलनकारी लड़कियों को जबरन उठवाकर उनका कौमार्य परीक्षण करवाया था।
इससे यह पता चलता है कि कौमार्य परीक्षण स्त्रियों को प्रताड़ित करने का भी औजार है। मुझे हैरानी होती है कि इस 21वीं सदी में भी कौमार्य परीक्षण की यह परंपरा दुनिया के अनेक देशों में कायम है। मध्यकाल में यूरोप के योद्धा जब लड़ाई लड़ने दूर जाते थे, तब अपनी स्त्रियों की कमर में वे लोहे की एक बेड़ी लगाकर जाते थे, जिससे कि उनका किसी दूसरे पुरुष से शारीरिक संपर्क न हो पाए। सिर्फ पति के आदेश से नहीं, बल्कि समाज के निर्देश पर भी अक्सर महिलाओं की कमर में वे बेड़ियां लगाई जाती थीं।
लेकिन बाहर जाते पुरुषों को ये बेड़ियां नहीं लगाई जाती थीं। उनके स्वच्छंद आचरण में किसी तरह की कोई बाधा नहीं थी। इटली के अलावा चीन में महिलाओं की कमर में बेड़ी लगाने के मध्यकालीन उदाहरण मिलते हैं। यह जानकर हैरानी होगी कि बीती सदी के 70 के दशक में इंग्लैंड में कौमार्य परीक्षण की वापसी हुई थी। दरअसल तब दूसरे देशों की जो भी कुंवारी लड़कियां इंग्लैंड में बसने के लिए आती थीं, उन लड़कियों का कौमार्य परीक्षण (वर्जिनिटी टेस्ट) किया जाता था। अमेरिका में भी बीच बीच में कौमार्य परीक्षण की बर्बरता से लड़कियों को गुजरना पड़ता है।
महिलाओं की कमर में बेड़ी लगाने के उदाहरण अब भले न हों, लेकिन महिलाओं के प्रति उस पुरुषवर्चस्ववादी सोच में कोई फर्क नहीं आया है। जबकि स्त्री के शरीर में बेड़ी लगाने का समाज को कोई अधिकार नहीं है। स्त्री के लिए आर्थिक आजादी जितनी जरूरी है, उतनी ही शारीरिक आजादी भी। यह आजादी न मिले, तो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी मिलने का कोई व्यापक और वास्तविक अर्थ नहीं है। भारत में 'टू फिंगर टेस्ट' से मुक्ति यहां की महिलाओं की गरिमा की बहाली की दिशा में उठाया गया एक सही कदम है।

सोर्स: अमर उजाला

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