सम्पादकीय

राजनीति में कोई एक जाति नहीं, जातियों का गठजोड़ सफल होता है

Rani Sahu
13 Sep 2021 8:14 AM GMT
राजनीति में कोई एक जाति नहीं, जातियों का गठजोड़ सफल होता है
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“तिलक, तराज़ू और तलवार, इनको मारो जूते चार!” जैसे नारे अब हवा हुए

शंभूनाथ शुक्ल। "तिलक, तराज़ू और तलवार, इनको मारो जूते चार!" जैसे नारे अब हवा हुए. मंडल आरक्षण को मंज़ूरी मिलने के तीन दशक बाद इस तरह का नारा लगाने वालों को भी महसूस होने लगा, कि देश की राजनीति विभिन्न समुदायों की एकता से चलती है, नारों से नहीं. शायद इसीलिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल द्वारा लखनऊ में गत दिनों "ब्राह्मणों का बहिष्कार करने और उन्हें वोल्गा भेजने" जैसी बातों को किसी ने तवज्जो नहीं दी. उत्तर प्रदेश चुनाव में आज हर राजनीतिक दल को ब्राह्मण चाहिए, मुसलमान चाहिए, दलित चाहिए. क्योंकि कोई अपनी आबादी का कितना भी ढिंढोरा पीटे, बग़ैर दो-एक और जातियों के गठबंधन के सरकार में आना असंभव है.

नेता भी बदलते रहते हैं. जो मायावती उत्तर प्रदेश में दलितों, ख़ासकर जाटवों की एक समय एकछत्र नेता हुआ करती थीं, उनकी ताक़त को चंद्रशेखर रावण ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में डेंट तो किया ही है. और आज चंद्रशेखर रावण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव समाज के बीच एक दबंग नेता के तौर पर धूमकेतु की तरह उभरे हैं. हालांकि उन्हें अभी तक किसी चुनाव में अपनी ताक़त दिखाने का अवसर नहीं मिला है. क्योंकि उनका उदय ही उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आने के बाद हुआ था. लेकिन 2017 की मई में उन्होंने यह तो बता ही दिया था, कि आज दलित एक शक्ति है उसे खारिज कर देना एक तरह से पीछे की तरफ देखना है.
पांच वर्ष पहले सहारनपुर में जो कुछ हुआ था, वह कोई अनहोनी नहीं थी बल्कि अंदेशा था कि एक न एक दिन ऐसा ही कुछ होगा. सहारनपुर में वर्चस्व की लड़ाई होकर रहेगी. और यही हुआ था. राजपूतों व दलितों के बीच संघर्ष किसी तरह की मजूदरी बढ़ाने या बटाई जोतने वाले को फसल का अधिक हिस्सा देने की मांग को लेकर हुई लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह लड़ाई थी अपनी-अपनी सत्ता को स्थापित कर देने की.
सहारनपुर की वह एक घटना, बंधुआ नहीं रहे दलित
दलित शब्द से भान चाहे जो कुछ हो मगर दलितों की ताकत को सामंती काल की तरह दबाए नहीं रखा जा सकता न ही उसकी अनदेखी की जा सकती है. मगर सहारनपुर में राजपूत की जाति के युवक उस ताकत को समझ नहीं पाए और वे पूर्ववत उनके मोहल्ले से गुजरते हुए डीजे बजाने लगे. तथा किसी कल्पित शत्रु को मारने का पोज देने की तरह हवा में तलवार लहराने लगे. दलितों को राजपूत युवकों की यह हरकत बड़बोलापन लगी और उन्होंने ऐतराज किया मगर वे नहीं माने. इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों तरफ से पत्थर व गुम्मे चलने लगे और इसी आपाधापी में राजपूत जाति का एक युवक मारा गया. यह पांच मई 2017 की घटना है. जब सहारनपुर के शिमलाना गांव में राणा प्रताप जयंती पर हुए एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद कुछ युवक अपने गांव शब्बीरपुर लौट रहे थे. चूंकि उनको अपने घर तक जाने के लिए गांव के एक किनारे स्थित दलित बस्ती से होकर ही गुजरना था. लेकिन उन्होंने वहां भी न तो अपने डीजे बंद किए न तलवारें म्यान में रखीं.
दलित बस्ती फूंक डाली
इसके कुछ दिन पहले अम्बेडकर जयंती पर बवाल हो चुका था. इसलिए दलित युवकों को लगा कि वे तलवार दिखाकर दलितों पर अपना वर्चस्व जताना चाहते हैं और डीजे बजाकर यह बताना चाहते हैं कि वे कहीं भी कुछ भी कर सकते हैं. उनको दलित युवकों ने मना किया पर वे नहीं माने. और इसी बीच गर्मागर्मी हो गई. उनकी भिड़ंत देखकर दलित स्त्रियों को लगा कि राजपूत युवक उन पर हमला करना चाहते हैं और इसी गफलत में उन महिलाओं ने छत पर चढ़कर एकाध युवकों की तरफ ईंट-पत्थर फेंक दिए, राजपूत भागे. भागता हुआ आदमी जान बचाकर हर दिशा में भागता है. भगदड़ में राजपूत जाति का एक युवक गिर गया और दब गया. उसकी मौत हो गई. ये भागते हुए युवक जब महेशपुरा गांव पहुंचे तो उन्हें पता चला कि एक युवक गायब है.
उन्हें लगा कि वहां कई लोग फंस गए हैं और शायद पुलिस भी उनकी मदद नहीं कर रही क्योंकि वहां पर बड़गांव थाने का थानेदार चूंकि दलित जाति का है इसलिए उसने उन दलितों का साथ दिया होगा. उन्होंने शिमलाना से अन्य सजातीय युवकों को बुला लिया. पुन: शब्बीपुर आकर जो उन्होंने अपनी जाति के युवक को मरा पड़ा देखा तो उनमें गुस्सा फूट निकला और उस गुस्से का प्रतिकार यह हुआ कि राजपूत युवकों ने शब्बीपुर की दलित बस्ती फूंक डाली. सारे घर स्वाहा हो गए. स्त्रियां, बच्चे और बूढ़े आश्रय छोड़कर जंगल व खेतों की तरफ भाग गए. जब तक जिला मुख्यालय से पुलिस पहुंचती तब तक शब्बीरपुर की दलित बस्ती स्वाहा हो चुकी थी.
भीम सेना की ताक़त
पुलिस और प्रशासन ने दबाव बनाने के लिए रातोरात उस युवक का अंतिम संस्कार कर दिया. हालांकि ऐसा करना हिंदू धर्म के मुताबिक शास्त्रसम्मत नहीं था पर अगर ऐसा न किया जाता तो बवाल और बढ़ने का अंदेशा था इसलिए राजपूत जाति के समझदार बुजुर्ग मान गए. मगर इस शांति के पीछे भी अशांति छिपी हुई थी. राजपूत युवकों ने इसे अपना अपमान समझा और दलित युवकों को लगा कि राजपूत लोग मानेंगे नहीं और किसी न किसी दिन वे हमला जरूर करेंगे. चूंकि शब्बीरपुर के हादसे ने उन्हें दहला दिया था इसलिए वे एकजुट होने लगे. उनके बीच काम कर रही भीमसेना ने परोक्षत: इसको मदद की. भीम आर्मी या भीम सेना दलितों का एक संगठन था जो उस समय सहारनपुर और मुजफ्फर नगर में तो सक्रिय था ही साथ में पड़ोस के हरियाणा और उत्तराखंड के कुछ जिलों में भी.
हरियाणा के करनाल, यमुना नगर तथा अंबाला जिलों में इसकी गतिविधियां पता चलीं इसके अलावा पंजाब में जलंधर व होशियार पुर में भी. हालांकि तब तक इसके पीछे किसी राजनीतिक दल का हाथ नहीं बताया जा रहा था पर कभी भी किसी भी घटना को केंद्र बनाकर राजनीतिक दल कूद ही पड़ते हैं. ऐसा सहारनपुर मसले पर भी हुआ. कहा जाता है कि इसको बसपा के पूर्व विधायक रवींद्र मोल्हू ने मदद की. सोशल मीडिया के जरिये दलितों को एकजुट किया गया. तथा इस आग में घी डाला गया. भीम सेना ने तय किया कि शब्बीरपुर घटना के विरोध में वे नौ मई को सहारनपुर शहर के गांधी पार्क में एक सभा का आयोजन करेंगे.
चूंकि प्रशासन से इसकी अनुमति नहीं ली गई थी इसलिए पुलिस गांधी पार्क में थी और उसने लाठियां लहराकर दलितों को वहां जुटने से भगा दिया. मगर प्रशासन को भी यह अंदाजा नहीं था कि दलित इतनी बड़ी संख्या में एकजुट हो जाएंगे. आसपास के सारे जिलों से दलित युवक वहां आते जा रहे थे और पुलिस के भगाने के बाद वे वहां से कहीं नहीं गए बल्कि सहारनपुर शहर की सीमा से सटी दलित बस्तियों में जम गए.
वे चारों ओर से आ रहे थे. चिलकाना रोड, देहरादून रोड और शब्बीरपुर की तरफ से आते हुए दलित झुंड के झुंड आक्रामक होते चले गए. दलित बस्तियों से पथराव शुरू हो गया और रामनगर में तो उन्होंने निर्माणाधीन राणा प्रताप भवन की इमारत ही तोड़ दी. वहां पर खड़े मीडिया के कुछ लोगों ने उनकी फोटो लेनी चाहिए तो उन्होंने मीडिया वालों को खदेड़ा तो वे भाग गए पर उनकी वहां पर खड़ी बाइकें फूंक डालीं. उनके गुस्से की चपेट में रामनगर चौकी भी गई जबकि बेचारा वहां का चौकी इंचार्ज दलित ही था. उन्हें खदेड़ने आई पुलिस को दौड़ा लिया और इस अफरा-तफरी में एसपी शहर के साथ एडीएम प्रशासन भी घायल हो गए.
एसडीएम को तो भागकर अपनी जान बचानी पड़ी. इसके बाद भीड़ शहर की ओर बढ़ी तथा दिल्ली रोड व कोर्ट रोड पर ऊधम काटने लगी. तब सहारन पुर में डीएम एनपी सिंह थे और एसएसपी सुभाष दुबे. ये लोग स्वयं जाकर भीम सेना के नेता चंद्रशेखर से मिले और कहा कि अगर अराजकता बढ़ी तो उन्हें मजबूरन गोली चलानी पड़ेगी और इसके बाद जो कुछ भी होगा इसकी सारी जिम्मेदारी भीम सेना की नहीं बल्कि स्वयं चंद्रशेखर की होगी. तब चंद्रशेखर अदब में आया और उसने किसी तरह से भीड़ को शांत किया.
मायावती में वाक-चातुर्य
लेकिन इस एक घटना ने उत्तर प्रदेश में दलितों की जाटव जाति को अपनी ताक़त दिखाने का अवसर मिला तथा यह भी कि वे अब मायावती की ढुलमुल व पैसों की राजनीति से तंग आ गए हैं. चंद्रशेखर रावण का चेहरा सामने आया. किंतु राजनीति में टिके रहने के लिए जिस तरह का वाक-चातुर्य और साहस चाहिए, उसका चंद्रशेखर में अभाव है. ख़ासकर सीएए प्रदर्शन के दौरान वे अपनी शक्ति का प्रसार नहीं कर सके, इसलिए बतौर एक राजनीतिक दल उनका विस्तार नहीं हो सका. राजनीति को वे लोग ही बढ़ा सकते हैं, जिनके अंदर लचीलापन हो और समयानुकूल बात कहने की कला भी. इसमें कोई शक नहीं कि मायावती इस कला में उस्ताद हैं.


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