सम्पादकीय

जातिगत गणना करवाने में राजनीतिक चुनौतियां तो हैं, मंडल-2 जैसी स्थिति न बना दे ये गणना!

Rani Sahu
21 Aug 2021 10:40 AM GMT
जातिगत गणना करवाने में राजनीतिक चुनौतियां तो हैं, मंडल-2 जैसी स्थिति न बना दे ये गणना!
x
लोक नीति-सीएसडीएस के विभिन्न अध्ययनों में प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि 2014 और 2019 में भाजपा की शानदार जीत के पीछे अन्य कारकों के साथ ही

संजय कुमार का कॉलम। लोक नीति-सीएसडीएस के विभिन्न अध्ययनों में प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि 2014 और 2019 में भाजपा की शानदार जीत के पीछे अन्य कारकों के साथ ही, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का भाजपा की ओर जाना रहा। ऐसा नहीं है कि भाजपा को अन्य जातियों का समर्थन नहीं मिला, वह अपने परंपरागत ऊंची जातियों-उच्च वर्ग के वोटरों के साथ ही बड़ी संख्या में दलित व आदिवासियों को भी अपने पक्ष में करने में सफल रही। लेकिन, जो बात लोगों को चौंका रही है, वह है भाजपा का जातीय जनगणना से कतराना, जबकि वह पहले ही ओबीसी वोटरों को अपने पक्ष में कर चुकी है।

भाजपा जातीय गणना से कतरा रही है और विपक्ष एक लय में इसकी मांग कर रहा है। मंडल के बाद की राजनीति में बड़ी संख्या में बहुत ही मजबूत क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ, खासकर बिहार और यूपी में। आरजेडी व जेडीयू ने बिहार में और सपा ने उत्तर प्रदेश में ओबीसी के मसले को उठाया और ओबीसी वोटरों का जबरदस्त समर्थन पाने में सफल रहे।
हकीकत में ओबीसी वोटर ही बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों के प्रमुख समर्थक बन गए। भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिित बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया है। 1998 और 1999 के चुनावों को जीतकर एनडीए के बैनर तले सहयोगियों के साथ सरकार बनाई। लेकिन क्षेत्रीय दल बहुत मजबूत बने रहे। 1998 और 1999 में उन्हें क्रमश: 35.5 व 33.9% वोट मिले।
जब 2004 और 2009 में यूपीए ने सरकार बनाई तो भी क्षेत्रीय दलों को 39.3 व 37.3% वोट मिले। यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि 2014 के लोकसभा (लोस) चुनाव में 31% वोट लेकर भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में सफल रही, हालांकि सभी क्षेत्रीय दलों को कुल 39% वोट मिले थे। केवल 2019 के लोस चुनाव में भाजपा ने ओबीसी वोटरों तक जबदस्त पहुंच बनाई और क्षेत्रीय दलों के प्रमुख समर्थकों में सेंध लगाई।
2009 के चुनावों में भाजपा को 22% और क्षेत्रीय दलों को 42% ओबीसी वोट मिले थे। लेकिन, एक दशक के भीतर ओबीसी का भाजपा को समर्थन नाटकीय तौर पर बढ़ गया और 2019 के चुनाव में 42% ओबीसी वोटरों ने भाजपा को और केवल 27% ने क्षेत्रीय दलों को वोट दिया। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि ओबीसी वोटरों में भाजपा की लोकप्रियता बढ़ी है।
लेकिन यहां पर एक पेंच है, भाजपा उत्तर भारत के अनेक राज्यों में प्रभावी ओबीसी की तुलना में निचले ओबीसी को लुभाने में अधिक सफल रही। इसलिए भाजपा ने भले ही ओबीसी पर अपनी पहुंच बनाकर चुनावी लाभ ले लिया हो, लेकिन इनके बीच उसका समर्थन उतना मजबूत नहीं है, जितना कि उच्च वर्ग और उच्च जातियों के बीच है।
उच्च ओबीसी के बीच क्षेत्रीय दल अधिक लोकप्रिय बने हैं। यूपी-बिहार में उच्च ओबीसी यादव हावी हैं और सपा और राजद को वोट देते हैं, जबकि इन राज्यों में भाजपा लोअर ओबीसी के वोट हासिल करने में कामयाब रही है। साथ ही भाजपा लोस चुनाव में ओबीसी के बीच लोकप्रिय है, लेकिन जब राज्य सरकार चुनने की बात आती है तो इन्हीं ओबीसी के बीच भाजपा लोकप्रिय पसंद नहीं होती है।
मुझे लगता है कि भाजपा का जातिगत गणना से कतराने का मुख्य कारण वह डर है कि अगर जातिगत गणना हो जाती है, तो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को केंद्र सरकार की नौकरियां और शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा, बहुत हद तक संभव है कि ओबीसी की संख्या उन्हें केंद्र की नौकरियों मिल रहे मौजूदा आरक्षण से कहीं अधिक हो सकती है। यह मंडल-2 जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती है और भाजपा को चुनौती देने का एजेंडा तलाश रहीं क्षेत्रीय पार्टियों को नया जीवन भी। यह डर भी है कि ओबीसी की संख्या भानुमती का पिटारा खोल सकती है, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।


Next Story