सम्पादकीय

उनके हिस्से का सूरज

Subhi
6 April 2022 4:52 AM GMT
उनके हिस्से का सूरज
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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास वाला इलाका विकसित इलाकों से कई मायने में अलग और ऐतिहासिक है। दिल्ली के इतिहास के पन्नों पर ऐसी अनेक घटनाएं दर्ज हैं

शकुंतला देवी: नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास वाला इलाका विकसित इलाकों से कई मायने में अलग और ऐतिहासिक है। दिल्ली के इतिहास के पन्नों पर ऐसी अनेक घटनाएं दर्ज हैं, जो आम आदमी के उस दौर के हालात को बयान करती हैं। यहां रहने वाले मजबूर और मजलूम लोगों की हालत आज भी कमोबेश वैसी है, जैसी आजादी के पहले थी। पहले लोगों को मजदूरी नाममात्र की मिलती थी, तो चीजें सस्ती हुआ करती थीं।

आराम से जिंदगी बसर हो जाती थी। अब मजदूरी ज्यादा मिलती है, तो महंगाई सुरसा की तरह सबको निगल जाना चाहती है। उस दिन मैं स्टेशन की मुख्य सड़क से निकल रही थी कि मजदूरों का झुंड दिखाई पड़ा। छोटे-छोटे बच्चे, किसी की नाक बह रही थी तो कोई बिलबिला रहा था। जिन महिलाओं के बच्चे थे, वे उन्हें चुप नहीं करा रही थीं। एक महिला को कहा- 'बहनजी! बच्चे भूखे हैं, इन्हें खाना-पानी दे दो। क्या खाना-पानी नहीं है?'

मैंने पूछा- 'पांच-सात साल के तो हो गए होंगे। इन्हें स्कूल में पढ़ने भेजती हो कि नहीं?''मैडमजी! इनके भाग में पढ़ाई-लिखाई नहीं है। इनका पेट भर जाए, इतना ही बहुत है। ठेकेदार का कहना है कि बच्चों को झुग्गी पर छोड़ कर आया करो, नहीं तो मजदूरी नहीं देंगे।'

उनकी लाचारी सुन कर सोचने लगी कि मेहनत मजदूरी करने वाले कैसे वक्त के मारे हैं। ये करें तो भी क्या करें। इन्हें न तो सरकारी योजनाओं का फायदा मिल पाता है और न समाज के पैसे वालों की छाया ही। ये किसी से कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं। यों तो लोग आसमान पर सीढ़ियां लगा देने और दानदाता होने का दिखावा करते हंै।

मैं नई-नई मां बनी एक सांवली महिला से पूछ बैठी- 'बहनजी! आप सब अगर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहो, तो मैं बगल वाले पार्क में इनको एक घंटे पढ़ा सकती हूं। क्या आप सब बच्चों को भेजेंगी?' शायद ऐसा सवाल उन्होंने पहले भी सुना होगा। इसलिए मेरा सवाल सुनना भर था कि सभी ने एक स्वर में कहा- 'नहीं मैडमजी! हम लोगों का क्या ठिकाना है, आज यहां तो कल वहां। एक बार बच्चे पढ़ने लगेंगे, तो आगे अगर इन्हें पढ़ाने वाला नहीं मिलेगा तो जिद करेंगे। फिर हम लोग इन्हें कैसे समझा पाएंगे!'

मैंने पूछा- 'कुछ दुख-तकलीफ सह कर बच्चों को पढ़ाने के बारे में कभी सोचती नहीं?' वह कुछ बोलती, उसके पहले उसका पति बोल पड़ा- 'बहनजी! आप क्या बात करती हैं। करोड़ों अच्छे घर के बच्चे पढ़-लिख कर बेरोजगार हैं। कितने नौकरी न मिलने के कारण खुदकुशी कर लेते हैं। सोचो आप, हमारे बच्चे भी पढ़-लिख लेंगे, उन्हें भी नौकरी नहीं मिलेगी। वे अगर झल्ला कर आत्महत्या कर लेंगे, तो क्या होगा। हम तो मारे बिना मर जाएंगे। पढ़े-लिखे नहीं होंगे तो कम से कम मेहनत-मजूरी करके परिवार तो पाल लेंगे।'

उसकी बातें सुन कर दंग रह गई। इनको अपनी इस बदहाली से कोई शिकायत नहीं। इन्हें लगता है कि अगर पढ़-लिख कर बेरोजगार रहते हुए भूखों मरने की हालत हो जाए, तो अपढ़ रहना ही अच्छा है। कम से कम बेरोजगार बन कर अपनी दयनीय हालत के कारण खुद को खत्म करने वाले विचार तो नहीं आएंगे। क्या जिंदगी में धन-दौलत ही सब कुछ है? अगर आज की शिक्षा बेरोजगारी पैदा करती है और उससे मन में हीनता का भाव बढ़ता है, तो ऐसी शिक्षा का मतलब क्या?

उनमें से एक मजदूर ने, जो बीए तक पढ़ा था, मौजूदा दौर के हालात के लिए शासन और प्रशासन की कमजोरियां गिनाई। उसने कहा, 'दीदीजी! देश भर में मजदूरों की हालत तकरीबन एक जैसी है। केंद्र और राज्य सरकार इनकी हालत सुधारने और बंधुआ मजदूरी से मुक्ति दिलाने के लिए पुनर्वास से लेकर कई तरह की मदद देने की बात कहती हैं, लेकिन गरीबी से उबारने की तकरीबन सारी कवायदें विफल ही साबित होती हैं। यही वजह है कि हम लाखों मजलूमों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर लोगों की हालत आजादी के पचहत्तर सालों में भी कोई खास नहीं बदली है।

देश के तमाम इलाके यौन शोषण, मानसिक और शारीरिक शोषण के केंद्र बने हुए हैं। थानों में भी इनकी कोई सुनवाई नहीं होती। बहुत सारे तनहा बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे न केवल शोषण का शिकार हैं, बल्कि जलालत में जिंदगी गुजारने को अभिशप्त हैं। इनकी जिंदगी की अंधेरी रात का सबेरा कब खत्म होगा, इस बारे में कोई समाज वैज्ञानिक नहीं बता पा रहा है।' मैंने कहा, 'भाई, आप तो देश-दुनिया को खूब समझते हो, फिर भी संघर्ष से डरते हो?' उसने कहा- 'संघर्ष में हम मजदूरों की अनगिनत पीढ़ियां गुजर गर्इं, लेकिन उनके हिस्से का सूरज नहीं उगा। आप बताओ, आप इन हालात में होतीं तो क्या करतीं?'


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