सम्पादकीय

12 नंबर बंगले की कहानी, जहां से बड़े-बड़े दलों के युवराज अपने पतन की ओर जाते हैं!

Gulabi
12 Aug 2021 5:58 AM GMT
12 नंबर बंगले की कहानी, जहां से बड़े-बड़े दलों के युवराज अपने पतन की ओर जाते हैं!
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12 नंबर बंगले की कहानी

अजय झा। नई दिल्ली क्षेत्र का जनपथ. अंग्रेजों के ज़माने में इसे Queensway के नाम से जाना जाता था. इस सड़क पर कई सरकारी बंगले हैं जिसमें से दो बंगले 1990 में सुर्ख़ियों में थे और लगभग उसके 31 वर्षों बाद भी चर्चा में हैं. 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी (Congress Party) स्वतंत्र भारत के इतिहास में दूसरी बार चुनाव हारी थी. उस समय कांग्रेस पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) होते थे. पहले वह अपनी मां के साथ उनके सरकारी बंगले 1 सफदरजंग रोड पर रहते थे. 1984 में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार ने 1 सफदरजंग रोड बंगले को इंदिरा गांधी स्मारक बनाने का निर्णय लिया.


चूंकि राजीव गांधी और उनके परिवार की सुरक्षा बेहद जरूरी थी, लिहाजा बड़ी मशक्कत के बाद 7 रेस कोर्स का बंगला राजीव गांधी के लिए चुना गया, जिसे भारतीय प्रधानमंत्री का आधिकारिक बंगला घोषित किया गया. 1985 में राजीव गांधी अपने परिवार के साथ इस बंगले में रहने लगे. पर किसे पता था कि पांच वर्षो के बाद ही उन्हें वह बंगला खाली करना पड़ेगा? सुरक्षा की दृष्टि से फिर उनके लिए एक ऐसे बंगले की तलाश शुरू हुई जहां जनता का आना जाना नहीं हो, 10 जनपथ का बंगला राजीव गांधी के लिए सही था, बंगला एकांत में भी था और कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड के बगल में था.


राम विलास पासवान को आवंटित हुआ था 12 जनपथ का बंगला
राजीव गांधी अपने परिवार, जिसमें उनकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी थी, वहां रहने लगे. लगभग उसी समय साथ वाला बंगला 12 जनपथ विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में मंत्री राम विलास पासवान (Ram Vilas Paswan) को आवंटित हुआ और वह वहां अपने परिवार के साथ रहने लगे. फर्क सिर्फ इतना था कि जनपथ, यानि जनता का पथ नाम 12 नंबर के बंगले में सार्थक हुआ, जहां पिछले 31 वर्षों से जनता बिना रोकटोक के आ जा सकती थी. पासवान का दरबार हमेशा जनता के लिए खुला होता था. और यह भी किसे पता था कि Queensway का बंगला एक सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) नामक कांग्रेस पार्टी की रानी, जिन्होंने सुपर पीएम (Super PM) बन कर देश पर दस वर्षों तक राज किया, का बंगला बन जाएगा!

संयोग सिर्फ इतना ही नहीं था कि जनपथ के इन दो बंगलों में दो विख्यात राजनेता रहेने लगे थे, दोनों बंगलों में भविष्य के नेता भी पल-बढ़ रहे थे – 10 जनपथ में राहुल गांधी और 12 जनपथ में चिराग पासवान. आगे चल कर दोनों के जिम्मे राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी आनी थी. राहुल गांधी 2004 के सांसद बने और चिराग पासवान 2014 में. 2017 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दिया और 2019 में राम विलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष पद चिराग पासवान (Chirag Paswan) को सौंप दिया. एक और समानता है इन दोनों के बीच, राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और चिराग पासवान तोहफे में मिले राजनीतिक विरासत को संभालने में असफल रहे और कहीं ना कहीं इन दोनों नेताओं को कांग्रेस पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) की दुर्दशा का जिम्मेदार माना जाता है.

राहुल गांधी अब पिछले कुछ वर्षों से 10 जनपथ पर नहीं रहते हैं और चिराग पासवान भी अब 12 जनपथ बंगले में नहीं रह पाएंगे. केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें यह बंगला खाली करने का नोटिस मिला है. जिसमें यह कहा गया है कि यह बंगला केन्द्रीय मंत्रियों के लिए है और इसे एक नए मंत्री को आवंटित किया जाने वाला है. राम विलास पासवान की मृत्यु पिछले वर्ष अक्टूबर में हो गयी थी. एक सांसद के तौर पर चिराग पासवान किसी छोटे बंगले या एमपी फ्लैट के अधिकारी हैं. अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि 12 जनपथ किस नये मंत्री के नाम आवंटित किया गया है, संभव है कि इसके नए निवासी चिराग के चाचा पशुपति पारस हों. पशुपति पारस ने पहले चिराग को लोक जनशक्ति पार्टी से बेदखल कर दिया और अब उस प्रसिद्ध बंगले से भी करने वाले हैं.

12 जनपथ अभी भी चिराग के पास हो सकता था, अगर पिछले वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने बेवजह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पंगा ना लिया होता. नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) और पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी दोनों ही एनडीए के घटक दल थे. पर चिराग ने एक अजीब फैसला लिया कि एलजेपी एनडीए में रह कर भी जेडीयू के खिलाफ चुनाव लड़ेगी. एलजेपी खुद तो डूबी ही और सिर्फ एक सीट जीतने में सफल रही, पर चिराग पासवान ने जेडीयू का भारी नुकसान किया और नीतीश कुमार की पार्टी अपेक्षाकृत कम सीटों पर ही चुनाव जीतने में सफल रही. नीतीश कुमार से विरोध का नतीजा हुआ एलजेपी में बगावत और विभाजन. माना जाता है कि पशुपति पारस ने नीतीश कुमार के इशारे पर ऐसा किया. अगर चिराग ने बिहार चुनाव में हीरो बनने की जल्दीबाजी नहीं की होती तो पशुपति पारस की जगह एलजेपी कोटे से राम विलास पासवान की जगह वह ही केन्द्रीय मंत्री बनते, और 12 जनपथ उनके नाम आवंटित हो जाता.

2014 में अजीत सिंह से 12 तुगलक रोड बंगला खाली करवाया गया
चिराग पासवान ने अभी बंगला खाली करने के आदेश पर चुप्पी साध रखी है, पर उन्हें पता है कि वह ज्यादा दिन तक इसे टाल नहीं पायेंगे. केंद्र सरकार का अब एक सख्त नियम है कि अगर नोटिस मिलने के बाद भी उचित समय के अन्दर बंगला स्वेच्छा से खाली नहीं किया गया तो बलपूर्वक उसे खाली करवाया जाता है. राष्ट्रीय लोक दल के नेता स्वर्गीय अजीत सिंह अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सरकारी बंगले में रह रहे थे और जब ना ही वह मंत्री रहे और ना सांसद और उन्होंने बंगला खाली करने के नोटिस की अनदेखी की, लिहाजा 2014 में बलपूर्वक उनसे 12 तुगलक रोड बंगला खाली करवाया गया. यह बंगला चरण सिंह को 1977 में जब देश में पहली बार कांग्रेस पार्टी की चुनावी हार हुई थी और जनता पार्टी की सरकार बनी थी, जिसमे चरण सिंह उपप्रधानमंत्री थे, आवंटित हुआ था. 37 साल के बाद आखिर अजीत सिंह को यह बंगला खाली करना ही पड़ा, जब उनका सामान बंगले के सामने की पटरी पर फेंक दिया गया. चिराग शायद यह गलती नहीं करेंगे.

12 तुगलक रोड बंगला अब राहुल गांधी का आवास है
वैसे इसे एक दिलचस्प संयोग ही माना जा सकता है कि तीन बड़े नेतओं के राजनीतिक उत्तराधिकारी बेटों को 12 नंबर का बंगला रास नहीं आया. अजीत सिंह को 12 तुगलक रोड बंगले से निकलना पड़ा, 12 तुग़लक लेन बंगले में जब राहुल गांधी रहने लगे तो कांग्रेस पार्टी का पतन शुरू हो गया. यह बंगला राहुल गांधी के नाम उनके सांसद बनने के बाद ही आवंटित हो गया था. शुरू में इस बंगले में उनका कार्यालय होता था और वह अपनी मां सोनिया गांधी के साथ 10 जनपथ पर रहते थे. बाद में राहुल गांधी इस बंगले में रहने लगे और उसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी की शर्मनाक हार हुई, वह स्वयं भी अपने परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी से चुनाव हार गए पर बंगला उनके पास ही रहा, क्योंकि वह केरल के वायनाड से चुनाव जीतने में सफल रहे थे. और अब चिराग पासवान को 12 जनपथ से बेदखल किये जाने की तैयारी की जा रही है.


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