सम्पादकीय

विध्वंस से उठे गुबार : ट्विन टावरों का चंद सेकेंड में ध्वस्त होना याद रहेगा, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के मायने

Neha Dani
31 Aug 2022 1:40 AM GMT
विध्वंस से उठे गुबार : ट्विन टावरों का चंद सेकेंड में ध्वस्त होना याद रहेगा, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के मायने
x
उसी घर के लिए भुगतान करें, जो रहने के लिए तैयार है और संबंधित अधिकारियों से जिसे सभी आवश्यक मंजूरी मिल गई है।

अगस्त का आखिरी रविवार एक खास कारण से यादगार रहेगा, क्योंकि उसी दिन सुपरटेक द्वारा बनाए गए ट्विन टावरों को कुछ ही सेकेंडों में ध्वस्त कर दिया गया। इन टावरों के निर्माण में कानूनों के घोर उल्लंघन के बारे में वर्षों से काफी कुछ लिखा गया है। वर्ष 2005 में, नोएडा प्राधिकरण ने एमराल्ड कोर्ट के निर्माण के लिए भवन योजना को मंजूरी दी, जिसमें 14 टावर शामिल हैं, प्रत्येक में भूतल और नौ मंजिल (जी + 9) हैं। जून 2006 में नियमों में संशोधन किया गया और नए नियमों के तहत, 2006 के बाद नए आवंटियों के लिए फ्लोर एरिया रेश्यो (एफआरए) 1.5 से बढ़ाकर 2 कर दिया गया था।




दिसंबर 2006 में प्राधिकरण ने एमराल्ड कोर्ट के लिए पहली संशोधित योजना को मंजूरी दी, जिसके परिणामस्वरूप इमारतों में नौ से 11 मंजिल को मंजूरी मिल गई। सुपरटेक को भी दो अतिरिक्त इमारतों (टावर 15 एवं 16) और एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के लिए मंजूरी मिली। छह साल बाद, 2012 में नोएडा प्राधिकरण ने नई योजना की समीक्षा की, जिसमें जुड़वां टावरों की ऊंचाई 40 मंजिल तय की गई थी। दो साल बाद, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पहली बार भवन नियमों के उल्लंघन के लिए 2014 में इन टावरों के विध्वंस का आदेश दिया।


पिछले आठ वर्षों में इसके बिल्डर पुनर्विचार की उम्मीद में इन्हें गिराए जाने में देरी करने में कामयाब रहे। अंततः 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इन टावरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया, क्योंकि इनके निर्माण में न्यूनतम दूरी का ख्याल नहीं रखा गया था। अदालत के अनुसार, उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम के तहत व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों की जरूरी सहमति के बिना इमारतों को अवैध रूप से बनाया गया था। मुख्य मुद्दा दो टावरों के बीच की दूरी भी थी, जो दो टावरों के बीच आवश्यक न्यूनतम 16 मीटर की दूरी से कम थी।

नियमों के उल्लंघन के लिए बिल्डर को दोष देना आसान है। हालांकि सभी रियल एस्टेट से संबंधित मामलों की तरह एमराल्ड कोर्ट की कहानी आज जो दिख रहा है, उससे कहीं अधिक व्यापक है। शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों में आवास की बढ़ती आवश्यकता के नाम पर बिल्डरों के हितों के अनुरूप बिल्डिंग बायलॉज और निर्माण नियमों को बदला, जोड़ा और संशोधित किया गया है। पूरा दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र ऐसे मामलों से भरा पड़ा है, जहां भोले-भाले और यहां तक कि कई पढ़े-लिखे लोगों ने बिल्डरों और दलालों द्वारा बेचे गए फ्लैट लालच में खरीद लिए।

भारतीय रियल एस्टेट उद्योग में सड़ांध गहरी है। हालांकि सुपरटेक ने दो ध्वस्त इमारतों के तहत अनुमानतः कम से कम 1,000 करोड़ रुपये गंवाए हैं, लेकिन यह ऐसा कुछ नहीं है, जिससे कुछ भी बदलाव आएगा। कई अन्य बिल्डरों के विपरीत, जो प्रोजेक्ट की घोषणा के बाद गायब हो गए और यहां तक कि अधूरे भवन निर्माण के बाद खरीदारों को अधर में छोड़ दिया या कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिम्मेदार लोग अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं। चालीस मंजिला इमारत रातोंरात नहीं बन गई, इन जुड़वां टावरों को बनाने में सुपरटेक को पांच वर्ष लगे।

प्रोजेक्ट के 14 अन्य टावरों के निवासियों, अधिकारियों और यहां तक जिम्मेदार नागरिकों को भी निर्माण की जानकारी थी। मामले को अदालतों में ले जाने से पहले रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने सुपरटेक से परियोजना को बंद करवाने का प्रयास किया। शर्मनाक बात यह है कि जिस न्यूनतम दूरी के उल्लंघन के लिए टावरों को ध्वस्त किया गया, उसका पालन अब भी नहीं हो रहा है। इसका मतलब है कि अगर दो टावरों के बीच कुछ और ज्यादा दूरी होती, तो उन्हें ध्वस्त नहीं किया जाता।

कोई भी बिल्डर प्राधिकरण की मिलीभगत के बिना ऐसा नहीं कर सकता, जो परियोजना की गुणवत्ता और प्रगति की निगरानी के लिए जवाबदेह है। इसलिए यह आरोप गलत नहीं है कि नोएडा प्राधिकरण के जिन लोगों की निगरानी में यह पूरा ढांचा खड़ा हुआ था, वे भी किसी न किसी तरह इसमें शामिल थे। आम आदमी के हित में काम करने वाली संस्थाओं के कामकाज को प्रभावी बनाने के क्या उपाय हैं? अधिकारियों की निष्क्रियता और खराब कार्यप्रणाली को रोकने का एक तरीका उनके कार्यों में जवाबदेही लाना है।

बिल्डर द्वारा भवन कानूनों के किसी भी उल्लंघन के लिए उन्हें जवाबदेह होना चाहिए और ऐसा करने में कोई भी विफलता उनके काम न करने के बराबर है। प्रशासन और सरकार की भूमिका कानून को बनाए रखने और लोगों के हितों की रक्षा में विफलता का संकेत देती है। कानून के उल्लंघन के इस मामले को नोएडा प्राधिकरण ने नहीं उठाया था, बल्कि इसे शेष 14 टावरों के रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन अदालत में लेकर गया था। अदालतों में दृढ़ता से उनके खड़े रहने के कारण टावरों का विध्वंस हुआ।

यदि प्रशासन ने अपना काम किया होता, तो उन्हें विरोध प्रदर्शन करने और अदालत जाने की जरूरत नहीं पड़ती। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित इन जुड़वां इमारतों के विध्वंस ने एक सख्त संदेश दिया है, लेकिन इसमें काफी देर लगी। भारत जैसे देश में हम कचरों का जोखिम नहीं उठा सकते, लेकिन इन टावरों के विध्वंस ने कचरों में इजाफा किया है। अब सबसे बड़ी चुनौती इन 80,000 टन मलबे के निष्पादन की है, जो पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है। इन दोनों टावरों के विध्वंस से पहले कई साल मुकदमेबाजी में बीत गए, इस दौरान सरकार इन दोनों ढांचों से ज्यादा से ज्यादा सामग्री को सुरक्षित रूप से पुनर्प्राप्ति के तरीकों पर काम कर सकती थी और संभव होता, तो इसका इस्तेमाल कर सकती थी।

अब चर्चा इस बात की हो रही है कि कैसे ध्वस्त इमारतों के मलबे को कचरा प्रबंधन स्थल तक पहुंचाया जाए और उसका इस्तेमाल किया जाए। तथ्य यह है कि प्राधिकरण को मलबे को साफ करने के लिए बहुत से सफाईकर्मियों को लगाना पड़ा, जो दर्शाता है कि अब चर्चा भवन कानूनों के उल्लंघन के बारे में नहीं हो रही है, बल्कि इमारतों को ध्वस्त करने और आसपास के क्षेत्रों में सफाई की लागत के बारे में हो रही है। घर खरीदारों के लिए सबक यह है कि उसी घर के लिए भुगतान करें, जो रहने के लिए तैयार है और संबंधित अधिकारियों से जिसे सभी आवश्यक मंजूरी मिल गई है।

सोर्स: अमर उजाला

Next Story