सम्पादकीय

विपक्ष की चुनौती: दक्षिण से बंगाल तक जमीन खोती पार्टियां

nidhi
10 May 2026 3:11 PM IST
विपक्ष की चुनौती: दक्षिण से बंगाल तक जमीन खोती पार्टियां
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विपक्ष की जमीन क्यों खिसक रही है?
चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में हाल में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों से तीन राज्यों- केरलम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में नाटकीय बदलाव हुए हैं। जबकि असम और पुदुचेरी में मतदाताओं ने यथास्थिति बरकरार रखने के पक्ष में मतदान किया।
इन चुनावों पर एक ही दृष्टिकोण से बात करना संभव नहीं है। हर राज्य में एक अलग विमर्श उभरकर सामने आया है। केरलम का परिदृश्य सीधा एवं स्पष्ट है। यहां कई दशकों से संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा यानी एलडीएफ बारी-बारी से राज्य की सत्ता में रहे हैं। यह सिलसिला वर्ष 2021 में तब टूटा, जब पिनरई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ दूसरी बार सत्ता में आई। कांग्रेस ने नया नेतृत्व (पीसीसी और सीएलपी) स्थापित किया और पिछले पांच वर्षों में पार्टी ने नए जोश के साथ सच्चे विपक्ष के रूप में काम किया है। इसका परिणाम स्पष्ट नजर आ रहा है। अब यूडीएफ की जिम्मेदारी है कि वह अपने शासन से ऐसे परिणाम दें, जो गठबंधन सहयोगियों को एकजुट रखे तथा धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक प्रगति, समृद्धि और संघवाद को आगे बढ़ाए।
अप्रत्याशित परिणाम
तमिलनाडु की कहानी जटिल है। यहां कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के समर्थन से द्रमुक वर्ष 2021 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। उसने निस्संदेह दो मोर्चों पर बेहतरीन प्रदर्शन किया- आर्थिक विकास और कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना। मगर जाहिर तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करने वाले अन्य कारक भी थे। इनमें से एक अज्ञात कारक था अभिनेता जोसेफ विजय का चुनाव में उतरना, जिनके प्रशंसकों की संख्या, खासकर युवाओं और महिलाओं की बहुत अधिक है। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही एक नई राजनीतिक हवा चलनी शुरू हो गई, मतदान की तारीख से ठीक पहले आखिरी दस दिनों में यह हवा तेज होकर तूफान में बदल गई, इसने 108 निर्वाचन क्षेत्रों को प्रभावित किया, लेकिन इससे आगे नहीं बढ़ पाई।
दो साल पुरानी राजनीतिक पार्टी (टीवीके) के लिए यह एक शानदार शुरुआत थी। इसके अधिकांश उम्मीदवार अनजान चेहरे थे और कुछ ही लोगों ने प्रचार किया। हर जगह उम्मीदवार ‘विजय’ ही थे। विजय के कुछ छोटे भाषण, वीडियो संदेश और कई फिल्मी गाने ही ‘चुनाव प्रचार’ का आधार बने। इस चुनाव में टीवीके साधारण बहुमत से 11 सीट पीछे रह गई, लेकिन राष्ट्रपति शासन और दोबारा चुनाव से बचने के लिए, कांग्रेस (5), सीपीआइ (2), माकपा (2) और वीसीके (2) ने टीवीके को समर्थन देने का फैसला किया है।
पश्चिम बंगाल की कहानी सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें देश की राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता है। यहां धर्मनिरपेक्ष दल- कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और माकपा ने पिछले दस वर्षों में मजबूत हुई भाजपा के खिलाफ अलग-अलग चुनाव लड़े। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में एसआइआर ने बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदान से वंचित कर दिया और लोकतंत्र पर गहरा आघात हुआ। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां बेटा या बेटी मतदाता थे, लेकिन पिता या माता नहीं थे। परिवार मतदाता और गैर-मतदाता में बंट गए थे। न्यायपालिका और अस्थायी न्यायिक उपायों ने लाखों मतदाताओं को निराश किया तथा हजारों लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। एसआइआर के अलावा तीन कार्यकाल का बोझ भी तृणमूल कांग्रेस के लिए भारी साबित हुआ।
भाजपा का दबदबा
तृणमूल कांग्रेस की पराजय गंभीर घटनाक्रमों का संकेत देती है: भाजपा अब अकेले या गठबंधन सरकारों के माध्यम से पश्चिमी राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा), हिंदी पट्टी के अधिकांश हिस्सों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर), पूर्वी राज्यों और पूर्वोत्तर में शासन कर रही है। प्रतीकात्मक रूप से कहा जाए तो विंध्य पर्वतमाला भाजपा के लिए दक्षिण भारत के पांच राज्यों में प्रवेश के रास्ते में बाधा बनी हुई है। केरलम और तमिलनाडु में प्रवेश करने के उसके अथक प्रयासों को मतदाताओं ने पूरी तरह से नकार दिया (जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को क्रमश: तीन और एक सीटें मिलीं)। हालांकि, शेष भारत पर उसका नियंत्रण लगभग पूर्ण हो चुका है।
वर्ष 2024 में लोकसभा में केवल 240 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा ने संसद में कई विवादास्पद विधेयक पारित किए हैं:
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025
जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय (संशोधन) अधिनियम, 2025
कराधान कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025
राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम, 2025
अन्य विवादास्पद विधेयक भी आने वाले हैं, जिनमें लोकतंत्र विरोधी ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ विधेयक भी शामिल है। बहुमत न होने के बावजूद भाजपा ने संसद में विवादास्पद संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य सितंबर 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक को निरस्त करके पुन: लागू करना था। इस नए विधेयक का वास्तविक मकसद परिसीमन को आगे बढ़ाना और प्रत्येक राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या में परिवर्तन करना था। हालांकि विपक्षी गठबंधन ने इस विधेयक को विफल कर दिया। यदि भाजपा की जीत का सिलसिला जारी रहता है, तो सरकार संसदीय प्रणाली के आवरण में एक सत्तावादी राज्य स्थापित करने के लिए संविधान में संशोधन करने का प्रयास करेगी। भाजपा का अगला लक्ष्य एकात्मक संविधान (संघवाद का खात्मा), हिंदुत्व को प्रमुख विचारधारा बनाना (धर्मनिरपेक्षता का खात्मा), पूंजीवाद को आर्थिक माडल के रूप में स्थापित करना (कल्याणकारी राज्य का खात्मा) और अंतत: एकदलीय राष्ट्र (लोकतंत्र का खात्मा) स्थापित करना होगा।
एकजुट हों और मुकाबला करें
विपक्षी दलों की ओर से भाजपा को दृढ़ता के साथ चुनौती देनी होगी। भाजपा रूढ़िवादी ध्रुव होगी। भारत को एक लोकतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष देश बनाए रखने के लिए राजनीतिक विकल्पों को संरक्षित रखना आवश्यक है। विपक्षी गठबंधन को वर्ष 2024 में आंशिक सफलता मिली, लेकिन वह उस गति को बनाए रखने में विफल रहा। विपक्षी गठबंधन अभी संघर्ष करता और असमंजस की स्थिति में दिखता है, फिर भी भाजपा को चुनौती देने का यही एकमात्र प्रभावी माध्यम है।
चुनाव के बाद ममता बनर्जी (तृणमूल कांग्रेस) ने इंडिया गठबंधन को मजबूत करने का वादा किया है। एमके स्टालिन (द्रमुक) ने गठबंधन के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा है। उनके पूर्व बयानों (‘भाजपा मेरी वैचारिक शत्रु है’) से यह संभव लगता है कि विजय (टीवीके) को विपक्षी गठबंधन में शामिल किया जा सके। यह सच है कि गठबंधन के घटकों के बीच मूलभूत मतभेद हैं, लेकिन इन मतभेदों को राज्य स्तर तक ही सीमित रखना चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर एकता स्थापित करनी चाहिए। इसके लिए तत्परता, संवाद और दृढ़ता की आवश्यकता होगी।
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