सम्पादकीय

सबसे जरूरी तो यही समझना था कि जीरो कोविड नीति व्यावहारिक नहीं; यह चीन की नाकाम कोशिश

Gulabi Jagat
6 April 2022 8:10 AM GMT
सबसे जरूरी तो यही समझना था कि जीरो कोविड नीति व्यावहारिक नहीं; यह चीन की नाकाम कोशिश
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जब पहले-पहल कोविड-19 वायरस का पता चला था, तो चीन ने पूरे वुहान शहर में सख्त लॉकडाउन लगा दिया था
गगनदीप कांग का कॉलम:
जब पहले-पहल कोविड-19 वायरस का पता चला था, तो चीन ने पूरे वुहान शहर में सख्त लॉकडाउन लगा दिया था। जब दूसरे देशों में कोरोना के केस बढ़ना शुरू हुए, तो वे भी चीन की तर्ज पर अपनी आबादी पर प्रतिबंध लगाने लगे। ये अलग-अलग प्रकार के थे। एक तरफ चीनी-मॉडल के अत्यंत कठोर प्रतिबंध थे तो दूसरी तरफ ताइवान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश थे, जिन्होंने टेस्टिंग, कॉन्टैक्ट ट्रैसिंग और आइसोलेशन पर जोर देते हुए आंशिक प्रतिबंध लगाए।
भारत सहित दुनिया के अधिकतर देशों में समय के साथ इसी दूसरे वाले मॉडल को अपनाया गया। आइसोलेशन के सिद्धांत से मनुष्य एक हजार से भी अधिक वर्षों से परिचित हैं। यह कि अगर कोई व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है तो उसे सबसे अलग कर दो, ताकि दूसरे उसके सम्पर्क में आकर बीमार न पड़ें। लेकिन कोविड-19 से पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ था कि पूरे के पूरे देशों में तालाबंदी कर दी गई हो।
वर्ष 2020 में कुछ देशों ने जीरो-कोविड की नीति अपनाई, जिसके चलते सीमारेखाएं बंद करते हुए परिवहन पर रोक लगा दी गई, नागरिकों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी और संक्रमितों को आइसोलेट कर दिया गया। इस नीति के पीछे यह सोच थी कि वायरस को फैलने से रोकने का इससे बेहतर कोई तरीका नहीं था। जब वायरस का प्रसार धीमा होगा तो प्रतिबंधों में छूट दी जा सकती है, अलबत्ता दूसरे देशों से आने वाले लोगों के लिए अत्यंत सख्त क्वारेंटाइन नीति का पालन तो तब भी किया जाता रहेगा।
विज्ञान के नजरिए से शुरुआत में ही ये संकेत मिल गए थे कि इस रणनीति को लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा। सबसे पहली चुनौती यह थी कि अधिकतर संक्रमितों में कोई लक्षण नहीं थे और इनक्यूबेशन पीरियड अनिश्चित था। टेस्टिंग उन्हीं की हो सकती थी, जिनमें लक्षण दिखते हों। अगर आप एसिम्पटोमैटिक हैं तो यात्रा वगैरह के दौरान टेस्टिंग कराने या रैंडम टेस्टिंग से ही संक्रमण का पता चल सकता था।
अब पूरी आबादी की तो रैंडम टेस्टिंग की नहीं जा सकती थी, ऐसे में कुछ संक्रमित हमेशा छूट जाते थे। 2 से 14 दिन का इन्क्यूबेशन पीरियड भी औसत पर आधारित था। कुछ व्यक्ति किसी संक्रमित के सम्पर्क में आने के दो सप्ताह बाद भी पॉजिटिव हो सकते थे। इसका यह मतलब था कि संक्रमितों के लिए आइसोलेशन पीरियड और अधिक किया जाना था और उसके बाद भी यह गारंटी नहीं थी कि एकाधिक टेस्ट्स के बावजूद हर केस को आइडेंटिफाई कर लिया जाएगा।
चीन इसी दुष्चक्र में फंस गया। उसने बार-बार पूरे शहरों में लॉकडाउन लगाने और पूरी आबादी की सैम्पलिंग करने की आक्रामक नीति अपनाई, लेकिन मल्टीपल सैम्पलिंग के बिना संक्रमण के मामले हमेशा पकड़ के बाहर छूट जाते हैं। न्यूजीलैंड में पोस्ट-आइसोलेशन ट्रांसमिशन और नए संक्रमितों के मिलने का कारण यही था।
जीरो कोविड नीति सफल नहीं हो सकती, इसका दूसरा संकेत तो बहुत पहले ही तब मिल गया था, जब यह पता लगाया गया था कि कोविड पशुओं को भी संक्रमित कर सकता है और मनुष्य पशुओं की अनेक प्रजातियों तक संक्रमण फैला सकते हैं। वर्ष 2020 में डेनमार्क में ऊदबिलावों के एक फार्म में पाया गया कि मनुष्य ऊदबिलावों को संक्रमित कर सकते हैं और वायरस पशुओं के भीतर अनेक म्यूटेशंस से गुजरकर मनुष्यों को पुन: संक्रमित कर सकता है।
दो भिन्न प्रजातियों के बीच दोहरा-संक्रमण भी यही साबित करता है कि पशु हमेशा सार्स-कोव2 के कैरियर साबित हो सकते हैं और मनुष्यों तक वायरस को ट्रांसमिट कर सकते हैं। वैरिएंट्स के उदय से जीरो कोविड नीति और दिशाहीन लगने लगी। मूल वुहान-स्ट्रेन में वायरस का रीप्रोडक्टिव नम्बर 2.5 से 3 तक था, यानी प्रत्येक संक्रमित व्यक्ति औसतन दो से तीन लोगों तक वायरस को पहुंचा सकता था।
अल्फा वैरिएंट में रीप्रोडक्टिव नम्बर बढ़ गया, वहीं डेल्टा और ओमिक्रॉन में तो यह और आगे चला गया। ओमिक्रॉन से संक्रमित व्यक्ति औसतन 8 से 10 लोगों को संक्रमित कर सकता है। एक ऐसा ट्रांसमिसेबल इंफेक्शन जो एसिम्प्टोमैटिक इंफेक्शनों का कारण बन सकता है और पशुओं को अपना वाहक बना सकता है, उसे मनुष्यों से दूर कर देना असम्भव है। जब यह साफ हो गया कि कोविड से बचा नहीं जा सकता है, तब दुनिया के पास क्या विकल्प शेष रह गया था?
सबसे जरूरी तो यही समझना था कि जीरो कोविड सम्भव नहीं है, ऐसे में गम्भीर बीमारियों से सबकी- और विशेषकर सबसे वल्नरेबल वर्ग की- सुरक्षा ज्यादा जरूरी है। सौभाग्य से यह वायरस स्वस्थ बच्चों और वयस्कों को गम्भीर रूप से बीमार नहीं करता है। हम वैक्सीन बनाने में भी सफल रहे, जो गम्भीर रोगों से हमारी रक्षा करती हैं और इन्हें व्यापक पैमाने पर लगाए जाने की जरूरत है। बूस्टर की जरूरत इस पर निर्भर करती है कि अतीत में किसको, किस प्रकार की वैक्सीन लगाई गई थी और संक्रमण से पूर्व मरीज की हिस्ट्री क्या थी।
बीते दो सालों ने हमें कोविड के बारे में बहुत कुछ सिखाया है और हमारी जानकारी आने वाले समय में बढ़ती ही रहेगी। ओमिक्रॉन की आमद से भी पहले कोविड की रोकथाम में सबसे सफल देश वे थे, जो द्वीपों पर बसे थे। उन्होंने अब अपनी आबादी को इतना वैक्सीनेटेड कर लिया है कि वे दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोल सकते हैं, उन्हें जीरो कोविड की जरूरत नहीं है।
दुनिया ने समझ लिया लेकिन चीन अड़ा है
अधिकतर देश समझ चुके हैं कि जीरो कोविड कारगर नहीं है, लेकिन चीन आक्रामक लॉकडाउन की नीति पर अड़ा हुआ है। वह बड़े पैमाने पर टेस्टिंग और ट्रैसिंग भी कर रहा है। सवाल यही है कि वह कितने समय तक जीरो कोविड की नीति पर बना रह सकता है, खासतौर पर यह देखते हए कि इससे उसके लोगों की जीवन-स्थिति, सामाजिक संबंधों और कारोबार को कितना नुकसान हो रहा है?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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