सम्पादकीय

महामारी के रूप में उभरता बुजुर्गो का एकाकीपन, एक पहल हो परिवार को बचाने की

Gulabi
15 Feb 2022 6:06 AM GMT
महामारी के रूप में उभरता बुजुर्गो का एकाकीपन, एक पहल हो परिवार को बचाने की
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बुजुर्गो की ऐसी उपेक्षा अथवा उनसे बुरा बर्ताव आज पूरी दुनिया के लिए एक समस्या है
क्षमा शर्मा। हाल में एक बुजुर्ग ने वरिष्ठ नागरिकों को भरण पोषण और संरक्षण देने के लिए लाए गए कानून के तहत साथ रह रही अपनी बहू पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए उसे अपने घर से बाहर निकालने की मांग की। स्थानीय प्रशासन ने अर्जी पर संज्ञान लेते हुए बहू को घर खाली करने का आदेश दिया, जिसके खिलाफ बहू पहले हाईकोर्ट गई और फिर सुप्रीम कोर्ट, लेकिन दोनों ही अदालतों ने उक्त कानून के तहत बहू को घर खाली करने का आदेश दिया।
बुजुर्गो की ऐसी उपेक्षा अथवा उनसे बुरा बर्ताव आज पूरी दुनिया के लिए एक समस्या है। हाल में इटली के लोमबाडरे शहर में एक दिल दहलाने वाली घटना सामने आई। यहां एक बुजुर्ग महिला ब्रेटा घर में अकेली रहती थी। पड़ोसियों ने शिकायत की कि उसके घर में झाड़-झंखाड़ उग आए हैं और वे परेशानी पैदा कर रहे हैं। पुलिस और अन्य अधिकारी जब वहां झाड़-झंखाड़ हटाने आए तो देखा कि वहां 70 साल की वृद्ध महिला कंकाल के रूप में एक कुर्सी पर बैठी है।
जांच से पता चला कि वह काफी पहले ही मर चुकी थी। यह खबर आने के बाद भी वहां उसका कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया, जो उस महिला का अंतिम संस्कार भी कर सके। आखिरकार यह काम प्रशासन ने किया। इटली की परिवार मंत्री एलेना बोनेटी ने ब्रेटा की मौत पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि कम्युनिटी के रूप में उसे याद करना हमारी जिम्मेदारी है। एक-दूसरे की देखभाल करना, एक-दूसरे का ध्यान रखना ही हमें एक परिवार की तरह बनाता है। परिवार जैसी संस्था को जीवित रखने के लिए जरूरी है कि हम एक-दूसरे का ख्याल रखें। कोई भी पीछे न छूट जाए। कोई भी अपने अंतिम समय में अकेला न हो। इस घटना से इटली समेत अन्य देशों में यह बहस छिड़ गई है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ कि एक बूढ़ी स्त्री के बारे में किसी को पता ही नहीं चला?
हालांकि यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों का समाज जिस तरह से आत्मकेंद्रित है, उसमें ऐसा होना कोई अजूबा भी नहीं। अफसोस की बात यह है कि भारत में भी कुछ लोग अकेलेपन को बहुत आदर्श की तरह देखने लगे हैं। वे जीवन के हर क्षेत्र में इसी की नकल करने की कोशिश भी करते हैं। तभी तो कुछ साल पहले मुंबई की एक घटना सुर्खियों में आई थी। एक आदमी डेढ़ साल बाद जब अमेरिका से लौटा तो घर में उसे अपनी मां का कंकाल मिला। जब बेटे को मालूम था कि मां घर में अकेली है, तो इस डेढ़ साल में उसने मां की कभी खोज-खबर क्यों नहीं ली? आ नहीं सकता था, तो फोन क्यों नहीं कर सका? किसी अड़ोसी-पड़ोसी से क्यों नहीं पूछ सका या कि यह डर था कि कहीं मां की जिम्मेदारी न उठानी पड़ जाए? कहीं उसे साथ न ले जाना पड़े और अपनी जिंदगी में खलल पड़े। कोई रिश्तेदार भी ऐसा न निकला, जिसने उस स्त्री के बारे में जानने की कोशिश की।
दुनिया भर में लोग अपने बुढ़ापे में अकेलेपन समेत अन्य कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। जिन बाल-बच्चों के लिए उन्होंने अपनी उम्र, तमाम संसाधन लगा दिए, उन्हें रोजमर्रा की देखभाल तो छोड़िए, इस बात को पता करने की फुर्सत नहीं कि माता-पिता किस हाल में हैं? ठीक हैं कि बीमार हैं? उन्हें उनके भरोसे ही छोड़ दिया गया है। अक्सर वे बयान तो आप सुनते ही होंगे, जिनके तहत कहा जाता है कि बूढ़े अर्थव्यवस्था पर बोझ होते हैं। ऐसे में यदि इन दिनों बहुत से युवक-युवतियों को यह लगता है कि वे घर-परिवार क्यों बसाएं, जब अंतत: बुढ़ापे में अकेले ही रहना है, तो गलत क्या है? जिन बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करेंगे, वे तो अपनी-अपनी दुनिया में निकल लेंगे। माता-पिता को भी उनकी जरूरत है, इस बात की याद शायद ही किसी को रहेगी। इसलिए कम से कम जब तक शरीर में ताकत है, साधन हैं, संसाधन हैं, हाथ में पैसा है, तब तक वे बिना किसी जिम्मेदारी के अपना जीवन जिएं। बुढ़ापे में जो होगा सो देखा जाएगा, क्योंकि आने वाले वर्षो में तो अकेलापन और भी बढ़ना है। परिवारों की टूटन ने मनुष्य को जितना अकेला किया था, तकनीक ने उस अकेलेपन को हजारों गुना बढ़ा दिया है। इसके अलावा इस विचार कि परिवार हमारी सारी मुश्किलों की जड़ होता है, को कुछ निहित स्वार्थो ने बहुत सावधानी से तमाम विमर्शो के नाम पर पाला-पोसा है, क्योंकि अकेला मनुष्य बिना किसी सहारे के तमाम तरह के चंगुलों में फंसने के लिए मजबूर होता है। वह व्यापार की बड़े काम की चीज होता है। उसकी जेब में तरह-तरह के मुनाफाखोरों को सेंध लगाना भी बड़ा आसान होता है।
महसूस होता है कि आने वाले दिन भारत में बुजुर्गो के लिए बहुत सी मुश्किलें लाने वाले हैं। उनकी औसत आयु बढ़ गई है। आज ही बुजुर्गो की जनसंख्या दस करोड़ के आसपास बताई जाती है। जो अगले वर्षो में और भी बढ़ने वाली है। इतनी बड़ी जनसंख्या और उनके लिए सरकारी योजनाओं का घोर अभाव। जिन परिवारों का उन्हें सहारा था, वे टूट गए हैं या टूट रहे हैं। अगर हैं भी तो जिम्मेदारी कौन उठाए? जो बुजुर्ग आर्थिक रूप से ठीक भी हैं, कई बार वे भी भारी विपत्ति में फंसते हैं, क्योंकि पैसा आपका अस्पताल में इलाज करा सकता है, अस्पताल पहुंचा नहीं सकता। अस्पताल पहुंचाने और देखभाल के लिए तो कोई मनुष्य ही चाहिए।
(लेखिका साहित्यकार हैं)
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