सम्पादकीय

हिन्दुओं का 'काबा' काशी ज्ञानवापी

Subhi
3 Jun 2022 3:13 AM GMT
हिन्दुओं का काबा काशी ज्ञानवापी
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जब भारत का इतिहास यह साफ तौर पर सबूत दे रहा है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने फरमान जारी करके मथुरा व काशी के हिन्दू देवस्थानों का तोड़ कर वहां मस्जिदें तामीर करने का आदेश जारी किया था

आदित्य चोपड़ा; जब भारत का इतिहास यह साफ तौर पर सबूत दे रहा है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने फरमान जारी करके मथुरा व काशी के हिन्दू देवस्थानों का तोड़ कर वहां मस्जिदें तामीर करने का आदेश जारी किया था तो काशी विश्वनाथ धाम में ज्ञानवापी क्षेत्र मन्दिर की दीवारों पर ही इस्लामी गुम्बद बनाने की हकीकत को समझा जा सकता है। यह मामला ज्यादा कानूनी उलझाव का भी नहीं है क्योंकि हिन्दू धर्म शास्त्र ज्ञानवापी क्षेत्र में स्थित आदि विश्वेश्वर शिव लिंग की महिमा का गुणगान करते हैं। औरंगजेब बहुत शातिर और शैतान नुमा हिन्दू विरोधी शासक था और जानता था कि हिन्दुओं के इस देश में वह अपना रुआब एक तरफ ज्यादा से ज्यादा हिन्दुओं को मनसबदारी बांट कर और दूसरी तरफ उन्हीं के मान मर्दन के लिए उनके देव स्थानों को अपमानित करके, काबिज कर सकता है। मगर वह बहुत झूठा और मक्कार शासक भी था। कुछ प्रमाणित इतिहासकारों के अनुसार अपना साम्राज्य विस्तारित करने की इच्छा में उसके अन्तिम 25 साल दक्षिण विजय की लालसा में लड़ाइयों में बीते जिससे उसका शाही खजाना लगभग खाली हो गया था। मगर उसने अपने दरबार से इतिहास लिखने वालों के साथ साहित्यकार, संगीतकार आदि विशेषज्ञों को हटा दिया था और उन्हें बेकार की बातें कहा था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अपने दरबार के हिसाब- किताब लिखने वाले मुंशी से वह झूठ लिखवाता रहा कि उसका खजाना भरा हुआ है जबकि उसकी मृत्यु के बाद मुगलिया खजाना खाली हो चुका था बल्कि इसके उलट उस पर कर्जा भी था। वह स्वयं वीणा बहुत सुन्दर बजाता था मगर उसने अपने दरबार से संगीतज्ञों को ही निकाल दिया था और इसकी वजह अपने धर्म सुन्नी इस्लाम की ताईद को बताया था। दुनिया जानती है कि औरंगजेब का लक्कड़ दादा हुमाऊं जब 1539 के लगभग सम्राट शेरशाह सूरी से अपनी जान बचा कर ईरान भागा था तो उसने इस्लाम के 'शिया ' फिरके को अपना लिया था। उसके बाद हुमायूं के बेटे अकबर ने अपने शासनकाल के दौरान 1582 के लगभग नया धर्म 'दीने इलाही' चलाया था और इसके अगले साल 1583 में इलाही संवत भी शुरू कर दिया था जिसे उसके पिता शाहजहां ने अपने शासनकाल में समाप्त करके हिजरी संवत शुरू किया था। शाहजहां औरंगजेब का बाप ही था और वह भी कम कट्टर मुस्लिम नहीं था। उसने भी एक फरमान जारी करके काशी के 70 से अधिक मन्दिरों को तोड़ने का हुक्म दिया था। इतिहासकारों के मत में शाहजहां को अपने दादा अकबर द्वारा स्थापित एक मजबूत शासन तन्त्र और अर्थव्यवस्था मिली थी जिससे मुगल सल्तनत की आमदनी बहुत अच्छी थी अतः शाहजहां भोग-विलास में रम गया और उसने अपने एशो-आराम के आगे सब कुछ तुच्छ समझा। भारत की जनता से वसूले गये राजस्व का उपयोग उसने अपनी निजी इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया और अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में आगरा में उसका मकबरा 'ताजमहल' बनवाया और दिल्ली में लालकिला व जामामस्जिद का निर्माण कराया परन्तु इन सब इमारतों के बनवाने में मुगलिया सल्तनत का खजाना खाली हो गया था और यही विरासत औरंगजेब को मिली थी जिसकी वजह से उसने अपनी सल्तनत का खर्चा कम करने के लिए नये-नये हिन्दू मनसबदार बनाये क्योंकि पुराने मनसबदार खुद मुख्तार हो गये थे और इस शाही इकराम को अपना खानदानी हक मानने लगे थे जबकि अकबर ने मनसबदारी की प्रथा शुरू करके शाही हुक्म से मनसबदार नियुक्त करने की प्रथा चालू की थी और मनसबदारों काे स्थानान्तित करने का हक अपने पास सुरक्षित रखा था। मगर औरंगजेब का शासन आते-आते शाहजहां की भोग-विलासिता की वजह से प्रशासनतन्त्र में घुन लग चुका था जिसकी वजह से भी औरंगजेब और ज्यादा तास्सुबी हो गया था और अपना राजस्व बढ़ाने का जरिया केवल हिन्दुओं पर जबर को ही मनाता था अथवा उनके धर्मान्तरण को सबाब का काम मानता था। जाहिर है मथुरा और काशी कोई व्यापारिक केन्द्र नहीं थे बल्कि धार्मिक केन्द्र थे मगर आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न समझे जाते थे। वैसे भी मुसलमान आक्रान्ताओं के लिए मन्दिर खजाने के ढेर समझे जाते थे। अतः बहुत संभावना इस बात की भी है कि औरंगजेब ने काशी व मथुरा से खजाना भी लूटा हो और हिन्दुओं को इस्लाम की ताबेदारी में ही रहने की तजवीज भी इजाद की हो क्योंकि उसने काशी में जो हिन्दुओं के लिए आज भी मुसलमानों के काबा से कम नहीं हैं, वहां मस्जिद का निर्माण मुख्य देव गृह के ऊपर ही कराया। अतः स्वतन्त्र भारत के मुसलमानों के सामने यक्ष प्रश्न यह होना चाहिए कि वे औरंगजेब की बदगुमानियों को ठीक करने के लिए हिन्दुओं के प्रति और उनकी धार्मिक मान्यताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाये और इस क्षेत्र को स्वतः ही हिन्दुओं को सौंप दें न कि कानूनी रास्ते तलाश करते फिरें। यह भारत की सहनशील, सहिष्णु और सर्वग्राही संस्कृति के अनुकूल होगा क्योंकि 98 प्रतिशत मुसलमान भी मूल रूप से हिन्दुओं से ही परिवर्तित हैं। आगमी 4 जुलाई को काशी की अदालत में इस मामले पर पुनः सुनवाई होगी अतः मुस्लिम भाइयों को हिन्दुओं का 'काबा' समझे जाने वाले ज्ञानवापी पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए और भारत में सौहार्द का वातावरण पैदा करना चाहिए।

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