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मतदाताओं को लुभाने की घातक रणनीति समाज में तनाव ही बढ़ाएगी
अवधेश कुमार। उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान के साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की शुरुआत हो रही है। वैसे तो ये सभी चुनाव महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सबसे अधिक नजर उत्तर प्रदेश और पंजाब पर लगी हुई है। पंजाब सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर के बाद दूसरा सबसे संवेदनशील प्रांत है। पिछले करीब एक साल से पंजाब कांग्रेस में मची हलचल और कैप्टन अमरिंदर सिंह की विदाई के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण लोगों की उत्सुकता यह जानने में है कि वहां किसकी सरकार बनेगी? जिस तरह पिछले कुछ महीनों में वहां फिर से उग्रवाद को बढ़ावा देने के प्रमाण मिले हैं, उससे भी यह चुनाव महत्वपूर्ण हो गया है। वहीं भारत का शायद ही कोई कोना हो जहां राजनीति में रुचि रखने वाले व्यक्ति की निगाहें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर न लगी हों। उत्तर प्रदेश के चुनाव को सत्तारूढ़ भाजपा का विरोध करने वालों ने जिस वैचारिक स्तर पर ले लिया है, उससे यह किसी राज्य का विधानसभा चुनाव न होकर राष्ट्रीय चुनाव जैसा हो गया है। पंजाब को लेकर भी भारत के बाहर अभिरुचि है, लेकिन उसका चरित्र उत्तर प्रदेश से अलग है।
हाल में उत्तर प्रदेश मेंं असदुद्दीन ओवैसी पर हमला देश और विदेश में व्यापक चर्चा का विषय बना है। यद्यपि हमलावर गिरफ्तार हो चुके हैं। उनका पिछला कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। उनके इंटरनेट मीडिया अकाउंट से पता चलता है कि उनके अंदर बढ़ती इस्लामिक कट्टरता को लेकर काफी गुस्सा था। कानून अपने अनुसार उन्हें सजा देगा, लेकिन ऐसा बताया जा रहा है जैसे सुनियोजित तरीके से उन पर हमला कराया गया हो। इसके बाद भी ओवैसी सुरक्षा लेने को तैयार नहीं। सच कहें तो उत्तर प्रदेश चुनाव में जिस तरह का माहौल बनाया गया है, प्रतिक्रियाएं भी उसी के अनुरूप आ रही हैं। सच यह है कि पूरे चुनाव के दौरान गैर भाजपा दलों ने किसी न किसी रूप में मुसलमानों के अंदर डर पैदा करने की कोशिश की है। यद्यपि गैर भाजपा दलों के शीर्ष नेता सार्वजनिक वक्तव्य में ऐसी कोई बात कहने से बचते हैं जिससे लगे कि वे किसी स्तर पर मुसलमानों को आकर्षित करने में लगे हैं। कारण साफ है। उन्हें भय है कि अगर यह संदेश चला गया कि वे मुसलमानों के वोट के लिए लालायित हैं तो मौजूदा माहौल में हिंदुओं का बड़ा समूह इसके विरुद्ध मतदान कर सकता है। इसलिए वे सार्वजनिक स्तर पर नहीं बोलते, लेकिन उस क्षेत्र के लोग जानते हैं कि किस तरह माहौल बनाया गया है। मुसलमानों के अंदर भाजपा का भय पैदा कर वोट लेने की रणनीति समाज में घातक तनाव और सांप्रदायिकता का माहौल पैदा करने का काम कर सकती है। इसके परिणाम क्या हो सकते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं।
असदुद्दीन ओवैसी का सोच लंबे समय से देश के सामने है। हैदराबाद से बाहर निकलकर उन्होंने देश भर में स्वयं को मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करने के लिए जिस आक्रामकता से अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है, उससे परिवेश विषाक्त हो रहा है। वह इस समय उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की बात ऐसे कर रहे हैं, मानो वर्तमान शासन में उन्र्हें हिंदुओं के बड़े समूह के दबाव और आतंक के साये में जीना पड़ रहा है। ओवैसी बंधुओं के बयानों ने पूरे भारत में गैर मुस्लिम समुदाय खासकर हिंदुओं के बड़े समूह के अंदर गुस्सा और्र ंचता पैदा की है। विवेकशील व्यक्ति कभी नकारात्मक या हिंसक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करतेर्, किंतु हमारा संपूर्ण समाज हर समय विवेक और संतुलन से ही विचार करे, यह आवश्यक नहीं। असदुद्दीन ओवैसी और अन्य दलों के उनके जैसे नेता यह समझने को तैयार नहीं कि मुस्लिम वोट पाने या मुसलमानों को भाजपा के विरुद्ध उकसाने के उनके रवैये के विरुद्ध भी प्रतिक्रिया हो रही है। ऐसे में इन दलों को थोड़ा ठहर कर अपनी पूरी राजनीति पर विचार नहीं करना चाहिए?
अगर बार-बार जाट-मुस्लिम एकता की बात की जाएगी तो उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी होगी। इसी तरह कोई बार-बार मुसलमानों को पीड़ित तथा शासन के अंदर उन्हें दबा-कुचला बताएगा तो उससे गुस्सा पैदा होगा। वैसे उत्तर प्रदेश में जिस जाट-मुस्लिम एकता की बात की जा रही है, वैसा धरातल पर नहीं है। जाट ऐसे नहीं हैं कि अपनी जाति के किसी एक व्यक्ति के कारण एक पार्टी के पूरी तौर पर खिलाफ हो जाएं। विरोधी दल के लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कैराना से लेकर अन्य जगहों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को सांप्रदायिकता का प्रतीक बता रहे हैं। इस पर हमारी-आपकी जो भी राय हो, लेकिन क्या कैराना से हिंदुओं का पलायन नहीं हुआ था? क्या वे हिंदू फिर से वर्तमान शासन में वापस नहीं आए? भाजपा स्वाभाविक ही इसे उठा रही है। भाजपा विरोधी दलों के लिए मुसलमानों के विरुद्ध कोई घटना मुद्दा है तो हिंदुओं के साथ ऐसी घटनाएं मुद्दा क्यों नहीं बनतीं? विरोधी दल अगर अपने वक्तव्यों और रणनीति में जिम्मेदार रहेंगे तो भाजपा को इसका अवसर नहीं मिलेगा। विरोधी दलों को लगता है कि मथुरा का मुद्दा उठा देंगे तो मुसलमान वोट कट जाएगा, लेकिन भाजपा सोचती है कि यह मुद्दा हिंदुओं के दिलों में है। इसे उठाना चाहिए तो उठा रही है। ओवैसी इसके विरुद्ध अगर कुछ कहेंगे तो हिंदुओं के अंदर प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि करोड़ों की आस्था वहां है। आप कहेंगे कि मुजफ्फरनगर दंगे को भुला दीजिए तो उसे भुलाने के लिए आपने क्या किया, यह भी तो सवाल उठता है? पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जानने वाले जानते हैं कि जमीनी स्तर पर ये सारे सवाल उठ रहे हैं। निश्चित रूप से विवेकशील मतदाता इन सारी स्थितियों को देख रहे होंगे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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