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विगत चौदह तारीख को गोवा और उत्तराखण्ड के मतदाता वोट देने के लिए घरों से बाहर निकले
संजय कुमार का कॉलम:
विगत चौदह तारीख को गोवा और उत्तराखण्ड के मतदाता वोट देने के लिए घरों से बाहर निकले। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार गोवा में 79 तो उत्तराखण्ड में 63 प्रतिशत मतदान हुआ। इन राज्यों में वर्ष 2017 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में ये आंकड़े दो प्रतिशत कम थे। 2017 में गोवा में 81 प्रतिशत तो उत्तराखण्ड में 65 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। पश्चिमी यूपी में भी पहले दो राउंड की वोटिंग के दौरान मतदान का प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में क्रमश: एक और चार प्रतिशत कम रहा।
चुनावों में मतदाताओं की कम या ज्यादा सहभागिता पर दो विचार प्रचलित हैं। क्या मतदान का अधिक प्रतिशत हमेशा ही वोटरों के सत्ता-विरोधी (एंटी-इंकम्बेंसी) मिजाज को दर्शाता है? और क्या कम संख्या में मतदाताओं का वोट डालने आना यह बताता है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी के काम से संतुष्ट हैं और उसे एक बार फिर अवसर देना चाहते हैं? जहां मतदान के प्रतिशत को लेकर अनेक आकलन किए जाते हैं, वहीं इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसके कम या ज्यादा होने का चुनावों पर क्या असर पड़ता है।
वैसा कहने का एक कारण है। अतीत में हुए चुनावों के विश्लेषण से मिले डाटा बताते हैं कि मतदान-प्रतिशत और चुनाव परिणामों के बीच सीधा सम्बंध नहीं है। सबसे पहले लोकसभा चुनावों को देखें। अभी तक सत्रह बार आम चुनाव हो चुके हैं। इनमें से सात में मतदान-प्रतिशत बढ़ा है तो सात में घटा है। 1957 और 2009 में पिछले चुनावों की तुलना में मतदान में कोई बदलाव नहीं आया था। जिन सात लोकसभा चुनावों में मतदान पिछले चुनाव की तुलना में बढ़ा, उनमें से तीन बार सत्तारूढ़ पार्टी फिर से चुनी गई, जबकि चार बार उसने सत्ता गंवाई।
इसी तरह जिन सात लोकसभा चुनावों में मतदान घटा, उनमें भी तीन बार सत्तारूढ़ पार्टी जीती और चार बार हारी। जिन दो चुनावों में मतदान में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया, उनमें सत्तारूढ़ सरकार को पुन: शासन चलाने का अवसर दिया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि मतदान-प्रतिशत और चुनावी परिणामों के बीच कोई सीधा सम्बंध नहीं है। लेकिन क्या निर्वाचन-क्षेत्र के स्तर पर इसमें कोई पैटर्न देखा जा सकता है?
1967 से 2019 के बीच हुए लोकसभा चुनावों में 7408 निर्वाचन क्षेत्रों के मतदान-प्रतिशत का जायजा लेने पर पता चलता है कि 4418 संसदीय क्षेत्रों में यह बढ़ा तो 2990 में घटा। यानी बीते अनेक दशकों में संसदीय क्षेत्र के स्तर पर मतदान बढ़ा अधिक और घटा कम है। अलबत्ता, यह पैटर्न सभी चुनावों में समान रूप से नहीं देखा गया है। नौ चुनावों में ऐसे अनेक संसदीय क्षेत्र थे, जिनमें मतदान-प्रतिशत बढ़ा, लेकिन पांच ऐसे भी थे (1980, 1989, 1991, 1999 और 2004), जिनमें बड़ी संख्या में निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान-प्रतिशत में गिरावट पाई गई।
2014 के चुनावों में 89 प्रतिशत संसदीय क्षेत्रों में अधिक मतदान हुआ था। यह पैटर्न 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनावों के अनुरूप था। आज पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 2022 के चुनावों से पहले गोवा के लोग 12 बार अपनी सरकार चुनने के लिए मतदान कर चुके थे, जिनमें से सात में मतदान बढ़ा तो चार में घटा। जिन सात मौकों पर मतदान बढ़ा, उनमें सत्तारूढ़ पार्टी चार बार जीती और तीन बार हारी।
उत्तराखण्ड में अभी तक चार चुनाव हो चुके हैं, जिनमें दो बार मतदान बढ़ा और एक बार घटा। लेकिन अभी तक इस राज्य में कोई भी पार्टी दोबारा चुनाव नहीं जीत सकी है। यूपी में आठ बार मतदान बढ़ा और तीन सरकारें फिर से चुनी गईं, जबकि सात बार घटा और दो बार सरकारें फिर चुनी गईं।
इसी तरह के ट्रेंड्स मतदान घटने पर भी देखे जा सकते हैं। इसके बाद भी क्या कोई पूरे विश्वास से कह सकता है कि वोटरों के टर्नआउट का चुनाव परिणामों पर कोई असर पड़ता है? कम से कम मैं तो नहीं कह सकता। लेकिन अगर कोई इन आंकड़ों के आधार पर पूर्वानुमान लगाना चाहते हैं और इनमें छुपे गहरे अर्थों की तलाश करना चाहता है तो मैं उन्हें वैसा करने से रोक भी तो नहीं सकता।
टर्नआउट का गणित
क्या मतदान का अधिक प्रतिशत हमेशा ही वोटरों के सत्ता-विरोधी (एंटी-इंकम्बेंसी) मिजाज को दर्शाता है? और क्या कम संख्या में मतदाताओं का वोट डालने आना यह बताता है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी के काम से संतुष्ट हैं और उसे एक बार फिर अवसर देना चाहते हैं? इस बात के कोई सबूत तो नहीं मिलते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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