सम्पादकीय

देश को चुनावों के मकड़जाल से निकाल कर बनाना होगा सहभागी लोकतंत्र

Gulabi
8 Dec 2020 5:14 AM GMT
देश को चुनावों के मकड़जाल से निकाल कर बनाना होगा सहभागी लोकतंत्र
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कभी आरक्षण, कभी नागरिकता, कभी कृषि-कानून तो कभी किसी अन्य मुद्दे पर केंद्र सरकार को चुनौती देना दर्शाता है कि

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। संसद द्वारा किसानों के हित में बनाए गए तीन कानूनों के खिलाफ कुछ किसान संगठनों द्वारा दिल्ली में प्रदर्शन से लगभग एक वर्ष पूर्व नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शन की यादें ताजा हो गईं। कभी आरक्षण, कभी नागरिकता, कभी कृषि-कानून तो कभी किसी अन्य मुद्दे पर केंद्र सरकार को चुनौती देना दर्शाता है कि देश में कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं जो अपने मन की न होने पर संसद को खुली चुनौती देने से भी पीछे नहीं हटतीं। संसद को कानून बनाने की शक्ति संविधान और जनता से मिली है। अत: कानूनों के विरुद्ध सड़क पर प्रदर्शन संविधान, संसद और जनता को चुनौती देने जैसा है, जबकि ये शक्तियां इनकी दुहाई भी देती हैं। क्या वास्तव में उनकी निष्ठा तभी तक लोकतंत्र में है जब तक उनके समर्थक दल की सरकार हो। जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है तबसे किसी न किसी मुद्दे पर विपक्षी दल बराबर ऐसे ही प्रयास कर रहे हैं। यदि सर्वोच्च न्यायालय उनके अनुकूल निर्णय नहीं देता तो वे उस पर भी अंगुली उठा देते हैं। फिर आम नागरिक का क्या होगा? यदि उसकी आस्थाएं लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं से उठ गई तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही ग्रहण लग जाएगा।


दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, जनता वोट द्वारा अपना बहुमत व्यक्त करती है

अपने लोकतंत्र पर हम गर्व करते हैं कि यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र बहुमत के आधार पर चलने वाला शासन है और इसमें जनता वोट द्वारा अपना बहुमत व्यक्त करती है, लेकिन जब ईसा से 300 वर्ष पूर्व यूनान में आधुनिक लोकतंत्र ने जड़ें जमाईं तब उसकी खासियत थी कि उसमें नागरिक वाद-विवाद और विमर्श के आधार पर निर्णय लिए जाते और उनको लागू कराने में पूरी निष्ठा से सहभागिता होती। जैसे-जैसे लोकतंत्र का विकास हुआ और बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र का जन्म हुआ तो फोकस चुनावों पर केंद्रित हो गया तथा वाद-विवाद, विमर्श और निर्णयों को लागू कराने में जन-सहभागिता कमजोर पड़ गई। वे कार्य जनप्रतिनिधियों द्वारा संसद में किए जाने लगे, जिसकी कोई सूचना जनता को मिल नहीं पाती थी। धीरे-धीरे जनता उनसे उदासीन होती गई।

जब निर्णय हो जाते हैं तब जनता के पास सड़क पर विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता

यही भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी है कि आज जनता संसद और सरकारों द्वारा किए जाने वाले किसी महत्वपूर्ण विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाती और जब निर्णय हो जाते हैं तो उसके पास सड़क पर विरोध करने के अलावा कोई विकल्प बचता नहीं। न तो सत्ता पक्ष, न ही विपक्ष जनता को कुछ समझा पाते हैं, उलटे राजनीतिक कारणों से विपक्षी दल जनता को बरगलाने और उकसाने का काम करते हैं जैसा कि नागरिकता और कृषि कानूनों पर दिखा। कभी ऐसा भी होता कि विपक्ष सरकार का कुछ मुद्दों पर मनोबल बढ़ाता जैसे दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था का अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन या कृषि और अन्य क्षेत्रों में हो रहे सुधार और जीएसटी में रिकॉर्ड आय से घरेलू मांग में बेहतरी आदि। कांग्रेस नेता आनंद शर्मा द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैक्सीन दौरे की तारीफ इस दिशा में आशा की एक किरण है।


भारतीय लोकतंत्र का उन्नयन हो, सहभागी लोकतंत्र की और जाने का खाका खींचा जाना चाहिए

आलेख में जिस समस्या का उल्लेख आरंभ में किया गया है, उससे निपटने का एक ही तरीका है कि भारतीय लोकतंत्र का उन्नयन हो, उसे वर्तमान प्रक्रियात्मक स्वरूप से निकाल कर आगे ले जाया जाए। आज चुनाव आयोग से लेकर सरकार और राजनीतिक दल हर समय केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया अर्थात चुनावों में ही उलझे रहते हैं। किसी के पास फुर्सत नहीं कि थोड़ा ठहर कर, सभी दलों और जनता को विश्वास में लेकर लोकतंत्र के अगले पायदान अर्थात विमर्शमूलक और सहभागी लोकतंत्र की और जाने का खाका खींचा जाए।

सत्ता पक्ष के प्रत्येक सुझाव को विपक्ष शंका की दृष्टि से देखता है

प्रधानमंत्री मोदी प्राय: लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की सलाह देते हैं, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन पता नहीं क्यों विरोधी दल उसका प्रतिरोध करते हैं। वह भी तब जबकि लोकसभा और विधानसभाओं के प्रथम चार चुनाव एक साथ हुए थे। ऐसा लगता है कि राजनीतिक दलों में संवादहीनता और विमर्शहीनता के चलते सत्ता पक्ष के प्रत्येक सुझाव को विपक्ष शंका की दृष्टि से देखता है। इस स्थिति को समाप्त करना होगा। राजनीतिक दलों और जनता से संवाद तो करना ही पड़ेगा, क्योंकि यह लोकतंत्र की अपरिहार्य शर्त है।

भारतीय लोकतंत्र में कुशासन, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद जैसी प्रवृत्तियां घर कर गईं

ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र कोई अंतिम और पूर्ण आदर्श राजनीतिक व्यवस्था हो, परंतु हमारे पास अभी उससे बेहतर कोई और विकल्प नहीं है। यूनानी विचारक अरस्तू ने 'डेमोक्रेसी' को सबसे खराब शासनतंत्र बताया था, क्योंकि इसमें जनता के नाम पर जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल अपना हित साधते हैं और भीड़ को जनता की शक्ल दे देते हैं, जिससे लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाता है। यह किसी से छिपा नहीं कि हमारे लोकतंत्र में कुशासन, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद और स्वार्थ जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियां घर कर गई हैं। इसका एक और पहलू यह भी है कि लोकतंत्र के प्रतीकों और मूल्यों जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध-प्रदर्शन और आलोचना का प्रयोग करके स्वार्थी नेता और दल लोकतंत्र को और कमजोर करते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता।

विकास के पथ पर आगे हैं वे देश जहां लोकतांत्रिक अधिकारों का कोई स्थान नहीं

चीन जैसे साम्यवादी देश और इस्लामिक शासन वाले सऊदी अरब या अन्य अधिनायकवादी देशों में तो लोकतांत्रिक अधिकारों का कोई स्थान ही नहीं, लेकिन फिर भी विकास के प्रतिमानों के नाम पर उन देशों के मॉडल के तमाम प्रशंसक मिल जाते हैं। यही तबका भारत में उपलब्ध स्वतंत्रताओं का भरपूर प्रयोग करने के बावजूद यहां मानवाधिकारों, असहिष्णुता और आजादी के प्रश्न उठाता रहता है। समस्या तब और बढ़ जाती है जब इन विरोध-प्रदर्शनों का स्वरूप हिंसक हो जाता है, जिसमें जन-धन की हानि होती है। उसे प्रायोजित करने वाले संगठन उसका ठीकरा समाज विरोधी तत्वों पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और जनता व सरकार ठगी सी रह जाती है। सर्वोच्च न्यायालय तक ने कई बार इस पर अपना कड़ा रुख दिखाया है, लेकिन यह राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा प्रश्न है, जिसका कोई विधिक समाधान नहीं हो सकता। इससे निपटने के लिए हमें अपने लोकतंत्र को चुनावों के मकड़जाल से निकाल, उसका उन्नयन कर, उसे विमर्शमूलक और सहभागी लोकतंत्र बनाने की ओर ले जाना होगा।



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