सम्पादकीय

दशानन की दस बातें

Gulabi
8 Oct 2021 4:46 AM GMT
दशानन की दस बातें
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रामलीला देखकर देर रात घर लौट रहा था। सामने सड़क पर देखा तो एक विशालकाय आदमी मेरी ओर चला आ रहा था

रामलीला देखकर देर रात घर लौट रहा था। सामने सड़क पर देखा तो एक विशालकाय आदमी मेरी ओर चला आ रहा था। ज्योंही मेरे पास आया तो एक पल को मैं डर गया, लेकिन अगले ही क्षण में संभल गया। मैं पहचान गया कि यह और कोई नहीं दशानन रावण है। मुझे देखकर ठहाका लगाया और बोला -''पहचाना, मैं कौन हूं?'' मैं बोला -''आप रावण हैं। कैसे, आज रोड पर आवाराओं की तरह घूम रहे हो?'' रावण बोला -''सर्वत्र मेरा राज है। मैं राज्य के हाल-चाल जानने पैदल ही निकला हूं।'' ''लेकिन आपके प्रहरी?'' मैंने पूछा। ''रावण को किसी प्रकार के प्रहरियों की आवश्यकता नहीं होती। मैं हर मुसीबत से अकेला लड़ सकता हूं।'' रावण ने जवाब दिया। मैंने कहा -''सर, सब जगह अराजकता है, अमन चैन है नहीं। महंगाई सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। इसलिए आपका राज्य आपके मनोनुकूल चल रहा है।'' रावण मेरे मुंह से यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने फिर हंसकर ठहाका लगाया और बोला -''लेकिन बरखुरदार, इतनी रात गए तुम कहां घूम रहे हो? यह तो नींद का वक्त है।'' ''सर मैं रामलीला देखकर आ रहा हूं। आज वहां रावण वध का दृश्यांकन था। किस तरह भगवान राम ने तुम्हारा वध किया था।'' मेरी इस बात पर वह फिर हंसा और बोला -''लेकिन मैं तो तुम्हारे सामने जिंदा खड़ा हूं। रावण राज्य में रामलीला देखने से फायदा क्या है?'' ''सर, मैं एक सदाचारी आध्यात्मिक पुरुष हूं। रामलीला मैं हर वर्ष देखता हूं। दुराचारी का अंत देखकर मुझे लगता है कि अच्छाई अभी जिंदा है।'' रावण दहाड़ा -''बच्चू, यह भाषा मत बोलो और यह भी मत भूलो कि तुम रावण के सामने निहत्थे खडे़ हो। जाओ अपने दड़बे में और सो जाओ।


ज्यादा बकवास की तो मेरा फरसा तुम्हारा धड़ अलग कर देगा।'' मैं बोला -''उसकी मुझे चिंता नहीं है। मेरी तो आपको लेकर एक ही जिज्ञासा है और वह यह कि आपको दस सिरों की आवश्यकता क्यों है? एक मुंह ही बहुत होता है सर।'' ''तो सुनो सदाचारी बालक! मेरे दस सिर दस काम आते हैं। यह जमाना झूठों और मक्कारों का है। अकेले एक मुंह से मैं इस दुनिया पर राज नहीं कर सकता।'' रावण बोला तो मैंने कहा -''सर, मैं समझा नहीं आपकी बात।'' ''अब तुम अल्पज्ञानी हो तो इसका तो मैं भी क्या करूं? लो आओ कहीं बैठते है, मैं तुम्हे दस सिरों की आवश्यकता समझाता हूं।'' यह कहकर उसने चारों और नजर फैलाई। एक जगह प्रकाश देखकर बोला -''आओ हम उस रेस्तरां में चाय पीते हुऐ बात करते हैं।'' रेस्तरां क्या था, थड़ी थी। मैं और रावण अलग-अलग मुड्डियों पर टिक गए। दो कड़क चाय का ऑर्डर देकर रावण बोला -''सुनो मेरा चरित्र आज के नेताओं जैसा है। वे कभी एक बात पर टिकते हैं? कभी नहीं। वे मेरे ही प्रतिरूप हैं। झूठ, फरेब, गबन-घोटाले, धोखा, छल-कपट, हत्या, बलात्कार, ठगी, आश्वासन, गरीबी हटाओ और ऐशोआराम, ये दसों बातें इन्हीं हाथों और सिरों से करता हूं। अब सब समझ जाओ। मेरे पास ज्यादा वक्त भी नहीं है। मुझे आगे जाना है। हां, एक बात और, सदाचारिता का रूप अविलंब त्याग दो, सुख पाओगे। वरना रोते रहोगे जीवन भर।'' यह कहकर वह अंतर्ध्यान हो गया। मैं दशानन की दस विरोधाभासी बातों पर बहुत देर तक सोचता रहा। चाय वाले ने पैसे मांगे, तो मैंने चुपचाप पैसे दिए और खिसका, क्योंकि रावण चाय के पैसे भी नहीं देकर गया था।


पूरन सरमा
स्वतंत्र लेखक
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