सम्पादकीय

लेना ज्यादा देना कम

Subhi
29 May 2022 5:07 AM GMT
लेना ज्यादा देना कम
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पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि केंद्र-राज्य संबंध पहले कभी इतने खराब नहीं रहे। पिछले कुछ दिनों में एक और मामला सामने आया है कि करों में कटौती के लिए कौन ज्यादा काम कर रहा है?

पी. चिदंबरम: पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि केंद्र-राज्य संबंध पहले कभी इतने खराब नहीं रहे। पिछले कुछ दिनों में एक और मामला सामने आया है कि करों में कटौती के लिए कौन ज्यादा काम कर रहा है? वित्तमंत्री ने 21 मई को एलान किया था कि सरकार ने पेट्रोल पर आठ रुपए प्रति लीटर और डीजल पर छह रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्कों में कटौती का फैसला किया था।

स्पष्ट रूप से इसकी अधिसूचना दिन में काफी देर से जारी की गई। उस दिन सारे चैनलों और अगले दिन सुबह सारे अखबारों ने जैसा कि बताया कि उत्पाद शुल्कों में कटौती की गई है (जिसमें राज्यों की भागीदारी भी है)। यह गलत था। 22 मई को वित्तमंत्री ने राज्यों को नीचा दिखाने की कोशिश की- मैंने कर घटा दिए हैं, अब आप वैट घटाएं। यह दूसरों पर हावी होने की कोशिश थी। जैसे ही आंकड़े आए, यह साफ हो गया कि पेट्रोल और डीजल पर वैट कम करने के लिए राज्यों को कहने का तो कोई मामला ही नहीं था।

सबसे पहले कटौती का विश्लेषण किया जाए। अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (जो रोड एंड इन्फ्रास्क्टचर सेस यानी आरआइसी के रूप में भी जाना जाता है), विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) और एग्रीकल्चर एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस (एआइडीसी) के रूप में केंद्र को तोहफा मिलता है, जिसे राज्यों के साथ नहीं बांटा जाता। मई 2014 में सारे उत्पाद शुल्क मिला कर पेट्रोल पर नौ रुपए अड़तालीस पैसे प्रति लीटर और डीजल पर तीन रुपए छप्पन पैसे प्रति लीटर थे। 21 मई, 2022 तक केंद्र ने इन शुल्कों को बढ़ाते हुए पेट्रोल पर सत्ताईस रुपए नब्बे पैसे प्रति लीटर और डीजल पर इक्कीस रुपए अस्सी पैसे तक कर दिया था। इससे इनके दाम अठारह रुपए प्रति लीटर से ज्यादा तक बढ़ गए!

अब, बांटे जाने वाले उत्पाद शुल्क और नहीं बांटे जाने वाले आरआइसी जो घटाया गया, पर नजर डालते हैं। राज्यों के साथ बांटे जाने वाले कर राजस्वों में से उनसठ फीसद केंद्र अपने पास रखता है और बाकी इकतालीस फीसद में से वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक राज्यों को दे देता है। सारे राज्यों को मिल कर पेट्रोल पर सत्तावन रुपए चालीस पैसे प्रति लीटर और डीजल पर तिहत्तर रुपए अस्सी पैसे हाथ लगते हैं! इस मूल उत्पाद शुल्क से न तो कोई मुनाफा होता है, न नुकसान।

राजस्व का असल स्रोत बंटवारे वाले उत्पाद शुल्क हैं। 21 मई, 2022 को इन्हें अठारह रुपए से ज्यादा बढ़ाते हुए वित्तमंत्री ने इसमें क्रमश: आठ रुपए और छह रुपए की कटौती कर दी। यह वही है, जिसे मैं जेब से और पैसा निकालना और कम से कम लौटाना कहता हूं।

यह जाहिर है कि पेट्रोल और डीजल पर केंद्र जो राजस्व जुटाता है, उसमें से व्यावहारिक तौर पर राज्यों को कुछ नहीं मिलता। उनके राजस्व का मुख्य स्रोत पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला मूल्य वर्धित कर (वैट) है (दूसरा स्रोत शराब पर लगने वाले कर भी होते जा रहे हैं)।

यह भी उल्लेखनीय है कि कुल राजस्व के अनुपात में राज्यों के अपने स्रोत भी घटते जा रहे हैं। पेट्रोल और डीजल पर वैट कम करने के लिए राज्यों को उपदेश देना वैसा ही है जैसे राज्यों को अपने से ही भीख मांगने को कहना। इससे तो वे तबाह हो जाएंगे और बाहर से और उधारी लेने (केंद्र सरकार की इजाजत से) को मजबूर होंगे या फिर और अनुदान के लिए केंद्र के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़े होंगे। इससे राज्यों की बची-खुची वित्तीय स्वतंत्रता भी हवा हो जाएगी। ऐसे में भी तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान ने वैट घटाया है।

निष्पक्ष पर्यवेक्षकों का मानना है कि केंद्र-राज्यों के वित्तीय अधिकारों और संबंधों की संपूर्ण रूप से व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए। खासतौर से जीएसटी नियमों से संबंधित अनुच्छेद 246 ए, 269 ए और 279 ए की समीक्षा होनी चाहिए। राज्यों को और वित्तीय अधिकार दिए जाने की जरूरत है, ताकि वे अपने संसाधन बढ़ा सकें।

यह तथ्य है कि संसाधनों की कमी से जूझ रहे राज्यों के पास ग्रामीण और स्थानीय निकायों को देने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है और इसका नतीजा यह है कि संविधान में तिहत्तरवां और चौहत्तरवां संशोधन ठंडे बस्ते में दबा पड़ा है। नगर निगमों और पंचायत निकायों के पास न पैसा है, न काम और न ही काम करने वाले।

केंद्र सरकार के हाथ में वित्तीय शक्तियों के अधिकार सिमट जाने से दूसरी शक्तियों पर भी वह हावी होता जा रही है। राज्यों के विधायी क्षेत्र पर केंद्र अतिक्रमण करने लगा है (जैसे कि कृषि कानून)। केंद्र ने अपनी कर संबंधी शक्तियों को भी लांघ गया है (जैसे कि समुद्री भाड़े पर आइजीएसटी, जिसका सुप्रीम कोर्ट ने जिक्र किया है)। राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का भी केंद्र अक्सर अतिक्रमण करता रहा है (अधिकारी को सजा देने और राज्य सरकार को आतंकित करने के मकसद से सेवानिवृत्ति के दिन ही पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव का तबादला और तैनाती)। देश भर में समानता थोपने की केंद्र की नीतियां (जैसे नीट, नैप, सीयूईटी)।

संघीय सिद्धांतों का गंभीर रूप से क्षरण किया जा रहा है। खतरा यह है कि संघवाद नष्ट हो जाएगा और भारत एकल राष्ट्र बन जाएगा, इस प्रस्ताव को सुस्पष्ट ढंग से संविधान सभा ने खारिज कर दिया था।

फैसला आपको करना है कि आप क्या चाहते हैं? एक व्यक्ति के एकाधिकार वाला असभ्य और चापलूसों और गुलामों वाले राज्यों का भारत या फिर जीवंत, सहयोगी और प्रतिस्पर्धी राज्यों वाला संघीय भारत?


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