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एक अनुमानित मासिक मूल्य तय किया
मुआवज़े के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने घर संभालने वाली महिला के काम की अनुमानित मासिक कीमत 30,000 रुपये तय की है। यह फ़ैसला इसलिए अहम नहीं है कि इसमें कितनी रकम तय की गई है, बल्कि इसलिए अहम है कि यह किस बात को मानता है। कोर्ट ने घर संभालने वाली महिलाओं को "राष्ट्र निर्माता" कहकर उस काम की आर्थिक कीमत को माना है, जिसे लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। यह फ़ैसला भारत को एक मुश्किल सवाल का सामना करने पर मजबूर करता है: हम किसी महिला के काम की कीमत तब क्यों मानते हैं जब वह इस दुनिया में नहीं रहती? इसका जवाब कुछ हद तक हालिया 'नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे' के नतीजों में मिलता है। यह फ़ैसला और सर्वे मिलकर भारत की विकास की कहानी में एक विरोधाभास को सामने लाते हैं। आज की महिलाएं पिछली पीढ़ियों की तुलना में ज़्यादा पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से जुड़ी हुई और सशक्त हैं। फिर भी, बिना पैसे वाले काम का बहुत ज़्यादा बोझ उन्हीं पर है।
सर्वे में खुशी मनाने लायक बातें भी हैं। संस्थागत प्रसव (अस्पताल में डिलीवरी) 90 प्रतिशत से ज़्यादा हो गए हैं, मां की सेहत की देखभाल बेहतर हुई है और बच्चों के विकास में रुकावट (स्टंटिंग) की समस्या कम हुई है। लेकिन इसमें चिंताजनक कमियां भी सामने आई हैं। छह से 23 महीने की उम्र के लगभग पांच में से चार बच्चों को कम से कम ज़रूरी खाना नहीं मिलता। सिर्फ़ खाना खिलाने से बच्चे का पोषण नहीं होता। किसी को स्तनपान कराना होता है, खाना बनाना होता है, बच्चे को बार-बार खिलाना होता है, बीमारी पर नज़र रखनी होती है और साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना होता है। ज़्यादातर घरों में ये ज़िम्मेदारियां मुख्य रूप से महिलाओं पर ही होती हैं। सर्वे में महिलाओं में मोटापा और हाई ब्लड शुगर बढ़ने की बात भी कही गई है। भारत ने यह पक्का करने में तरक्की की है कि महिलाएं गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान जीवित रहें। लेकिन इस बात पर बहुत कम ध्यान दिया गया है कि क्या वे इतनी सेहतमंद रहती हैं कि समाज द्वारा उन पर डाली गई देखभाल की ज़िम्मेदारियों को निभा सकें। हालिया 'टाइम यूज़ सर्वे' इस सच्चाई को दिखाता है। महिलाएं बिना पैसे वाले घरेलू कामों में दिन में लगभग पांच घंटे बिताती हैं, जबकि पुरुष दो घंटे से भी कम समय बिताते हैं। जब देखभाल के काम को भी इसमें जोड़ा जाता है, तो यह अंतर और बढ़ जाता है। यहां तक कि जो महिलाएं कमाती हैं, वे भी घर के कामों का ज़्यादातर हिस्सा करती हैं।
सालों से, सशक्तिकरण को शिक्षा, बैंक खातों और डिजिटल पहुंच के ज़रिए मापा जाता रहा है। ये उपलब्धियां अहम हैं। लेकिन सरकारी नीतियों में महिलाओं की थकान को शायद ही कभी मापा गया हो। भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चों को उनके शुरुआती सालों में कैसी देखभाल मिलती है। और वह देखभाल काफ़ी हद तक महिलाओं के बिना पैसे वाले काम पर निर्भर करती है। अगर देश ह्यूमन कैपिटल (मानव पूंजी) बनाने को लेकर गंभीर है, तो देखभाल करने वालों को ही नीतिगत प्राथमिकता देनी होगी। इसका मतलब यह नहीं है कि घर संभालने वाली हर महिला को सरकारी वेतन पर रखा जाए। इसका मतलब है अच्छी क्वालिटी वाली चाइल्डकेयर और क्रेच (बच्चों की देखभाल की जगहों) तक पहुँच बढ़ाना, स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए मदद मज़बूत करना और महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना। इसके लिए परिवारों के अंदर देखभाल की ज़िम्मेदारियों को बराबरी से बांटने की दिशा में सामाजिक बदलाव की भी ज़रूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने घर संभालने वाली महिलाओं के काम की अहमियत को माना है। अब चुनौती यह है कि महिलाओं के जीवित रहते हुए ही उनके इस योगदान को सहारा दिया जाए और उसमें निवेश किया जाए। किसी देश के भविष्य की मज़बूती देखभाल करने वालों के उस खामोश त्याग पर नहीं टिकी हो सकती, जिसमें उनकी अपनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।
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