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अभी तक किसान इस जिद पर हैं कि सरकार पहले तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर और फिर नये सिरे से इन्हें उनकी सलाह से बनाये
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। अभी तक किसान इस जिद पर हैं कि सरकार पहले तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर और फिर नये सिरे से इन्हें उनकी सलाह से बनाये, अभी तक किसान इस जिद पर हैं कि सरकार पहले तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर और फिर नये सिरे से इन्हें उनकी सलाह से बनायेअभी तक किसान इस जिद पर हैं कि सरकार पहले तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर और फिर नये सिरे से इन्हें उनकी सलाह से बनायेसर्वोच्च न्यायालय ने सरकार और आंदोलनकारी किसानों की समिति बनाकर किसान मामलों को सुलझाने का जो परामर्श दिया है उसे देखते हुए यह साफ है कि सरकार और किसानों को खुले मन से आगे बढ़ना होगा और किसानों के मसले का समाधान निकालना होगा। सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह कृषि पर से संरक्षण नहीं हटाएगी बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडियां भी जारी रहेंगी।
किसानों के देशव्यापी आन्दोलन के सन्दर्भ में हमें एक बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए कि 2001 में कृषि जन्य उत्पादों के आयात पर से पारिमाणिक प्रतिबन्ध समाप्त हो जाने के बाद से विश्व व्यापार संगठन का लगातार दबाव रहा है कि भारत अपने कृषि क्षेत्र को बाजार मूलक अर्थव्यवस्था से जोड़े जिससे यूरोपीय व अमेरिकी देशों के कृषि बाजारों के साथ उसकी बराबरी का माहौल बन सके। भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया 1991 से शुरू होने के बाद इसकी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को बाजार की शक्तियों पर छोड़ने की नीति अपनाई गई केवल पेट्रोलियम व कृषि क्षेत्र ही ऐसे थे जिन्हें संरक्षणवादी तौर-तरीकों के भीतर संचालित किया जा रहा था। मगर 1996 में जब इन्द्र कुमार गुजराल सरकार के अतर्गत वित्तमन्त्री श्री पी. चिदम्बरम थे तो उन्होंने पेट्रोलियम क्षेत्र को आजाद करना शुरू किया और प्रारम्भ में पेट्रोल की कीमतों को सीधे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के मूल्यों से बांधना शुरू किया। इसके बाद धीरे-धीरे बाद की आयी सरकारों ने डीजल के घरेलू बाजार पर सब्सिडी कम करनी शुरू की और बाद में मोदी सरकार के आने तक इसके भाव भी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के भावों से सीधे जोड़ दिये गये परन्तु कृषि क्षेत्र को सीधे बाजार से जोड़ने की हिम्मत कोई सरकार नहीं कर सकी क्योंकि ऐसा करते ही कृषि क्षेत्र के सिर से सरकारी संरक्षण का साया उठ जाने पर व्यापक विरोध का डर था, परन्तु आर्थिक उदारीकरण के चलते कृषि क्षेत्र में लगातार सार्वजनिक निवेश कम करने की नीतियां सभी सरकारों ने जारी रखीं।
सरकारों की नीति यह थी कि किसानों को श्रम देने की मात्रा बढ़ा कर धीरे-धीरे बाजारीकरण की तरफ चला जाये परन्तु इस नीति के परिणाम अपेक्षानुरूप बेहतर नहीं निकले और बैंक ऋणों की वजह से किसानों की आत्महत्याओं में राष्ट्र स्तर पर वृद्धि होने लगी। यहां तक कि पंजाब जैसे विकसित राज्य में भी किसान आत्महत्या के शिकार हुए। यही वजह रही कि जब 2006 में यूपीए सरकार में वाणिज्य मन्त्री कमलनाथ थे तो उन्होंने विश्व व्यापार संगठन की बैठक में विकसित व यूरोपीय देशों द्वारा भारत पर कृषि क्षेत्र को खोलने के लिए दबाव बनाया तो उन्होंने संगठन के कृषि प्रधान देशों का एक समूह बना कर उल्टा दबाव व्यापार संगठन पर बनाया कि जब तक भारत जैसे देशाें के किसानों की आर्थिक स्थिति यूरोपीय किसानों के समकक्ष नहीं हो जाती तब तक एेसे देशों की सरकारें अपने कृषि क्षेत्र के सिर से संरक्षणवादी हाथ नहीं उठा सकती। व्यापार संगठन में भारत की विजय हुई। उस समय के प्रधानमंत्री इस नीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे और इसी वजह से उनकी सरकार के दौरान खाद्य सुरक्षा विधेयक वर्षों तक लटकता रहा और अंत में राजनीतिक मजबूरी के चलते वह संसद में पारित हुआ।
इसके बाद भारत में परोक्ष रूप से कृषि को बाजार से सीधे जोड़ने की कोशिशें किश्तों में होती रहीं, मसलन कई राज्य कृषि मंडी तन्त्र से बाहर कामकाज करते रहे और खाद्य उत्पादों के सट्टा बाजार को वैधता प्रदान की गई। इससे आंशिक रूप से कृषि क्षेत्र बाजारमूलक शक्तियों के प्रभाव में आया लेकिन इस राह में आवश्यक वस्तु अधिनियम एक अवरोध का काम भी करता था। नये कृषि कानूनों में बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के अनुरूप सभी प्रकार के अवरोधों को समाप्त करने का प्रयास किया गया है जिससे किसान की उपज का भाव सीधे बाजार की शक्तियां तय कर सकें। इसका पुरजोर विरोध कृषि क्षेत्र कर रहा है। इसके दो आयाम हैं। एक तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को असंगत बना देना और दूसरा किसानों की उपज का मूल्य पेट्रोल व डीजल की भांति उत्पादक व व्यापारी के बीच छोड़ देना। मगर दिक्कत यह है कि कृषि क्षेत्र को बाजार की ताकतों पर छोड़ देने से सरकार की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है जिससे किसान की खेती का लागत मूल्य बढ़ सकता है मगर खुला बाजार इसी के अनुरूप उसकी उपज का मूल्य तय करके भाव तय कर सकता है। इसमें पूंजी की ताकत की अहम भूमिका होगी और खुदरा बाजार भाव तय करने में भी वही अहम भूमिका निभायेगी। इसी वजह से सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली खत्म न करने की बात कह रही है। आन्दोलनकारी किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार इस बारे में कानून बनाये क्योंकि भारत सरकार का कृषि मूल्य आयोग किसान की उपज का मूल्य उसकी लागत राशि का आंकलन करके न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करता है। बाजार मूलक शक्तियां बेशक इस फार्मूले को छोड़ कर मांग व सप्लाई के सिद्धान्त पर काम कर सकती हैं, चुंकि कृषि व्यापार फसल आने पर सप्लायर का बाजर नहीं होता बल्कि खरीदार का बाजार होता है। किसान अपनी फसल बाजार में लेकर उसकी एवज में नकद रोकड़ा जल्दी से जल्दी पाना चाहता है। उसके खेत में कोई ऐसी मशीन नहीं लगी होती कि वह बाजार के चालू भावों को देख कर अपनी सप्लाई नियन्त्रित कर दे। यही वह समस्या है जिसका हल अभी तक ढूंढे नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से आज सर्वोच्च न्यायालय ने राय जाहिर की है कि वह किसानों से बातचीत करने के लिए सरकार की एक वार्ता समिति गठित कर सकती है। अभी तक किसान इस जिद पर हैं कि सरकार पहले तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर और फिर नये सिरे से इन्हें उनकी सलाह से बनाये। लोकतन्त्र में संवाद से ही समस्याओं का निपटारा होता है। यह संवाद की प्रक्रिया कभी बन्द नहीं होनी चाहिए। अतः सर्वोच्च न्यायालय की मंशा समस्या को समाप्त करने की ही है। सरकार और किसान दोनों को इस पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए।
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