सम्पादकीय

ऐसे बंद की व्यंजना

Gulabi
27 Sept 2021 10:25 PM IST
ऐसे बंद की व्यंजना
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किसान आंदोलन का लगातार बढ़ते चले जाना न तो फायदेमंद है और न अनुकरणीय

किसान आंदोलन का लगातार बढ़ते चले जाना न तो फायदेमंद है और न अनुकरणीय। दिल्ली से लेकर केरल तक 42 किसान संगठनों के आंदोलन का असर चिंता में डालने के लिए पर्याप्त संकेत मुहैया कराता है। हालांकि, यह सकारात्मक बात है कि भारत बंद शांतिपूर्ण रहा। न किसानों की ओर से उग्रता दिखी और न कहीं प्रशासन ने आपा खोया। ऐसा लगता है, दोनों तरफ से किसान आंदोलन को लंबे समय तक चलाए रखने की तैयारी है और समाधान के लिए संवाद की प्रक्रिया बंद है। दोनों ओर से समय-समय पर ऐसे तीखे प्रहार होते हैं कि संवाद की गुंजाइश बनते-बनते बिगड़ जाती है। इस आंदोलन के चलते न केवल सरकार की आलोचना हो रही है, किसान नेताओं को भी काफी कुछ सुनना पड़ रहा है। मकसद चाहे जो हो, भारत बंद का समर्थन नहीं किया जा सकता। आज देश जिस मोड़ पर है, हम किसी भी तरह की आर्थिक गतिविधि को रोक नहीं सकते। रोकना तो दूर की बात, किसी परिवहन को भी हम कुछ देर के लिए भी बाधित नहीं कर सकते, क्योंकि देश की जो विकास दर है, वह बेरोजगारी को बढ़ाती चली जा रही है। आर्थिक नुकसान का आकलन केवल सरकार को ही नहीं, बल्कि किसानों को भी जरूर करना चाहिए।

भारत बंद कोई छोटी बात नहीं, किसान संगठनों ने सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे तक के लिए भारत बंद बुलाया था, जिसके तहत सभी सरकारी व निजी दफ्तरों, संस्थानों, दुकानों, उद्योगों को बंद रखने की अपील की गई थी। किसान नेता राकेश टिकैत ने भले ही कहा हो कि सभी जरूरी सेवाएं जैसे अस्पताल, मेडिकल स्टोर आदि अपना काम जारी रख सकते हैं, लेकिन सबको पता है, यह एक औपचारिकता ही है। जो लोग परेशान हुए हैं, उनकी क्या गलती है? इसमें कोई शक नहीं कि भारत बंद की वजह से देश में जगह-जगह भयंकर ट्रैफिक जाम की स्थिति देखी गई है। सबसे ज्यादा तकलीफ में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है। हम क्या भूल गए हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में केवल केंद्र सरकार ही नहीं रहती, दो से तीन करोड़ लोग भी रहते हैं? क्या बस सेवा या ट्रेन सेवा का बाधित होना अब हमारे लिए खास महत्व नहीं रखता? भारत बंद को कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा, सपा, वाईएसआर कांग्रेस, वाम दलों सहित कई राजनीतिक दलों ने अपना समर्थन दिया है, तो इस राजनीति के दुष्परिणाम आने वाले वर्षों में जरूर दिखेंगे। भारत बंद मानो एक सिलसिला या बदला है, किसान नेता भी यही बोल रहे हैं कि हमने भाजपा से यह सीखा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने बड़ी प्रसन्नता के साथ बताया है कि पंजाब, हरियाणा, केरल, बिहार में पूरी तरह बंद रहा। क्या यह प्रसन्नता शासन-प्रशासन की संवेदना तक पहुंचेगी? क्या आगे किसानों को किसी भारत बंद की जरूरत नहीं पड़ेगी? जो युवा रोजगार के लिए तरस रहे हैं, छह-छह लाख की चप्पलें पहनकर नकल करने को तैयार हो जा रहे हैं, क्या उन्हें भारत बंद से लाभ हुआ होगा? क्या इस भारत बंद की वजह से कुछ नौकरियां कम नहीं हुई होंगी? इस भारत बंद से कितने किसानों को फायदा हुआ होगा? हम न भूलें कि इस देश में ऐसे किसान व नेता भी हैं, जो इस भारत बंद या ऐसी राजनीति के खिलाफ हैं। बहरहाल, जिस देश-समाज में रोष या प्रतिरोष ऐसे बढ़ने लगे, वहां शासन-प्रशासन को मुंह फेरकर कभी नहीं बैठना चाहिए।

क्रेडिट बाय लाइव हिंदुस्तान
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