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दिल के करीब हैं बोलियां और स्वाद!

Gulabi
4 July 2021 1:40 PM GMT
दिल के करीब हैं बोलियां और स्वाद!
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भारत में अमेरिका के नए राजदूत (अमेरिकी दूतावास के चार्ज डी अफ़ेयर्स) अतुल केशप कहते हैं कि

भारत में अमेरिका के नए राजदूत (अमेरिकी दूतावास के चार्ज डी अफ़ेयर्स) अतुल केशप कहते हैं कि उन्हें दाल मखनी- नान तो पसंद है ही किंतु उन्हें पानीपत में अपनी दादी के हाथ से बना पूरी-हलवा का टेस्ट कभी नहीं भूलता. अतुल भारतीय मूल के अमेरिकी हैं और एक जुलाई को वे नई दिल्ली आए तथा अमेरिकी दूतावास का चार्ज संभाला। अतुल के पिता केशप चंदर सेन लाहौर से 1947 में शरणार्थी के रूप में आए थे तथा पानीपत में उनके परिवार ने बसेरा बनाया. बाद में केशप चंदर सेन ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की तथा पंजाब की सिविल सेवा में उनका चयन हो गया. शिमला में सात वर्ष तक रहने के बाद वे पीएचडी के लिए लंदन चले गए और वहीं उनकी मुलाक़ात अतुल की माँ ज़ो कलवर्ट से हुईं. वे ख़ुद भी अमेरिकी विदेश सेवा से थीं. उनकी शादी हुई और 1971 में अतुल का जन्म हुआ. राजदूत महोदय बचपन में भारत आते तो अपनी दादी से मिलने पानीपत जाते. वहां उनकी दादी उन्हें हलवा पूरी खिलातीं. उसका स्वाद वे आज तक नहीं भूले हैं.


मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जिसकी कमजोरी उसके मूल समाज का भोजन और बोली बनी ही रहती है. वर्ष 2000 से 2002 के दौरान मैं कोलकाता में एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक का सम्पादक था. मेरी रुचि कोलकाता के साहित्य, संस्कृति और रंगकर्म में खूब थी. कोलकाता में बांग्ला देश के डिप्टी हाई कमिश्नर हामिद साहब को भद्र लोक से मिलने में आनन्द आता. वे स्वयं भी बांग्ला में कविताएं लिखते थे और उनकी बेगम भी. वे हर शनिवार को बंगबंधु शेख मुजीब सरणी स्थित अपने आवास पर बांग्ला भद्रलोक को बुलाकर दावत देते. बांग्ला के शीर्षस्थ लेखक/कवि सुनील गंगोपाध्याय से लेकर कई नामचीन लेखक/कवि जैसी हस्तियां वहां आतीं, रंगकर्मी और टालीवुड के बांग्ला फिल्मकार भी. हिंदी के लोगों में से मुझे भी बुलाया जाता. कुछ और गैरबंगाली भी वहां जाते. इनमें मशहूर रंगकर्मी बसंत रूंगटा, बेलारूस के महा वाणिज्यिक दूत और मारवाड़ी सभा के अध्यक्ष सीताराम शर्मा तथा नेपाल के कांसूलेट जनरल जंगबहादुर थापा. अब रूंगटा की तो वहां पर कई पीढ़ियां गुजर चुकी थीं, इसलिए वे बोली-बानी में बांग्ला ही थे. सीताराम शर्मा के बाबा कोलकाता आकर बस गए थे इसलिए उनकी भी शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में ही हुई. अतः उन्हें भी बांग्ला समझने और बोलने में कोई दिक्कत नहीं होती थी. थापा बांग्ला समझ लेते थे पर बोल नहीं पाते थे. अब बचा अकेला मैं, जो इस ग्रुप में ऐसा था जिसे न बांग्ला बोलनी आती थी न समझ सकता था.


मैं इस ग्रुप अलग-थलग न पड़ जाऊं इसलिए उच्चायुक्त महोदय की बेगम, जो कि लखनऊ से थीं, ने एक मशहूर बांग्ला अभिनेत्री को हिदायत दी कि वह ग्रुप में होने वाली बातचीत को शुक्ला जी को ब्रीफ करतीं चलें। यहां यह बता दूं, कि बांग्ला भद्र लोक अपनी भाषा और संस्कृति को बहुत प्यार करता है. विश्व में कहीं भी दो बांग्ला भाषी मिलेंगे तो वे बंगाली में ही बात करेंगे. भले वे भारत स्थित पश्चिम बंगाल के बंगाली हों अथवा बांग्ला देश के. वार्तालाप के बीच एक शब्द आया 'तड़ातड़ी'तो मेरे कान में वे बांग्ला अभिनेत्री शताब्दी राय फुसफुसाईं- तड़ातड़ी मीन्स हरी. मैंने कहा- आई नो, वी आल्सो यूज इट, वी काल इट हड़बड़ी. थोड़ी देर बाद फिर एक शब्द बोला गया और शताब्दी ने फिर उसका अंग्रेजी अनुवाद किया. मैंने फिर कहा- आई नो. यह सुनकर शताब्दी राय ने उच्चायुक्त महोदय की बेगम से कहा- मैडम मिस्टर शुक्ला नो बांग्ला वेल. बेगम साहिबा उर्दू समझ लेती थीं इसलिए मैंने उन्हें हिंदी-उर्दू में बताया कि मैडम मैं बांग्ला तो नहीं जानता पर मेरी अपनी बोली अवधी में ये शब्द हैं. फिर मैंने उन्हें समझाया कि मैडम बोलियां दो भाषाओं के बीच पुल का काम करती हैं. क्योंकि बोलियां भाव को समझती हैं, और भाव दिल को जोड़ते हैं. फिर मैंने उन बांग्लादेशी बेगम को बताया कि मेरे परबाबा मनीराम सुकुल अपने गांव के जमींदार के गुमाश्ता थे. इसलिए उनकी जमींदारनी जब भी तीरथ को जातीं तब हमारे परबाबा को भी उनके साथ जाना पड़ता. साथ में दो नौकर और जाते. एक लठैत और एक टहल करने वाला घरेलू नौकर.

एक तरह से उनकी टिकट लाने से लेकर उनके ठहरने का इंतजाम मेरे परबाबा करते और लठैत रखवाली. टहल करने वाला कुली का काम करता. यानी पूरा राज उनके साथ चलता. वे जमींदारनी पूरा हिन्दुस्तान घूमीं. रामेश्वरम से लेकर बद्री-केदार तक और जगन्नाथ पुरी से लेकर द्वारिका तक. वह भी आज से सवा सौ साल पहले. जहाँ तक ट्रेन जाती वहां तक ट्रेन से और बाकी जगह पालकी से ट्रेन में तो खैर, सब बैठ लेते लेकिन जब पालकी चलती तो परबाबा और बाकी के दोनों नौकर पालकी के पीछे भागते. इस तरह वे सब पूरा हिंदुस्तान घूम आए. जबकि तीनों को अपनी बोली कन्नौजी-बुन्देली मिश्रित अवधी के और कोई भाषा नहीं आती थी.

बेगम भौंचक्की-सी मेरा मुंह ताकती रहीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि चार लोग, जिनमें एक महिला थी और जो न अंग्रेजी जानते थे न खड़ी बोली हिंदी-उर्दू कैसे हिन्दुस्तान घूम आए! मैंने उन्हें समझाया कि मैडम हिंदुस्तान में अनगिनत भाषाएं और बोलियां हैं तथा घाट-घाट पर अलग-अलग स्वाद का पानी है. इसी तरह यहां के स्वाद हैं? मैंने पूछा, मैडम क्या आप लखनऊ के कबाब और अरहर की दाल का स्वाद भूल गई हैं? उन्होंने कहा, नहीं. बल्कि मैं तो कुक को कहती हूँ कि हफ़्ते में तीन दिन अरहर की दाल भी बनाए. मैंने कहा ठीक इसी तरह बोलियां और स्वाद लोगों को क़रीब लाते हैं. ठीक जैसे धरती के अंदर का पानी आपस में हिला-मिला रहता है वैसे ही बोलियां भी दिल के भाव समझती हैं और हर व्यक्ति दूसरे के मन के भाव ही नहीं समझता बल्कि बोली भी समझता है. बोलियां प्रकृति के करीब हैं इसलिए उनमें कई शब्द एक जैसे हैं. बेगम ने पूछा कि आपने अपने परबाबा को देखा है? मैंने जवाब दिया नहीं. पर हमारे परिवार में उनके इतने किस्से प्रचलित थे कि मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैंने अपने परबाबा को नहीं देखा. बेगम को बोलियों में दिलचस्पी हुई तो मैंने उन्हें बताया कि बांग्ला का ओरिजिन संस्कृत है लेकिन फारसी के शब्द उसमें ऐसे घुले-मिले हैं, मानों वह ईरान के पड़ोस की भाषा हो. जैसे बांग्ला में पानी को तो जल बोलते हैं पर गैरकानूनी को बेआईनी. जबकि यह विशुद्ध फ़ारसी शब्द है. मैंने कहा जैसे मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान को सफ़र करता है वैसे ही बोलियाँ भी.

भारतवर्ष में 21 या 22 भाषाएं हैं और तीन हज़ार के आसपास बोलियां. हर कोस पर बोली बदल जाती है और उसे बोलने का लहजा भी. एक ही गांव में एक ही बोली को अलग-अलग जातियां अलग-अलग लहजे में बोलती हैं. अगड़े, पिछड़े, दलित और मुसलमान एक ही शब्द को अलग-अलग लहजे में ही नहीं कई बार तो उनके अलग-अलग पर्यायवाची इस्तेमाल करते हैं पर कोसों दूर बैठा आदमी उस शब्द को फील कर लेता है. मसलन मां शब्द चाहे जैसे बोला जाए उसकी ध्वनि एक जैसे होगी. पिता, चाचा, बुआ, मामा और मौसी के लिए भी. यही बोलियों की विशेषता है कि वे दिलों के भाव को समझती हैं. उच्चायुक्त महोदय की पत्नी को मेरी बात बहुत भायी. उन्होंने कहा कि इस पर तो शोध होना चाहिए. जो दूरियां बोलियां कम करती हैं उसे भाषाएं बढ़ाती हैं.

कभी सोचा गया कि भारत में आज से ही नहीं ईसा-पूर्व तीन सौ साल पहले से ही विदेशी हमलावर आने लगे थे जैसे सिकन्दर से लेकर अंग्रेज तक. अब ये सब के सब तो वापस नहीं चले गए. कुछ यहीं बस गए और यहीं की सभ्यता-संस्कृति में रच-बस गए. उनकी अपनी बोलियां भी यहीं खप गईं. यही कारण है कि भारत में जितने मनुष्य उतनी बोलियां तक कहा जाने लगा. ज्यादा दूर की बात न करें तो अकेले मध्य प्रदेश में ही अवधी, बघेली, बुंदेली, ब्रज, मालवी आदि असंख्य बोलियां बोली जाती हैं और एकाधिक भाषाएं. मराठे यहां मराठी लाए तो भोपाल का नवाब खानदान उर्दू-फारसी. इसके अलावा गुजराती, पंजाबी और सिन्धी भाषाएं बोलने वाले यहां खूब हैं और आदिवासी समाज की अपनी बोलियां हैं. लेकिन बावजूद इसके सब एक-दूसरे के भावों और विचारों को खूब समझते हैं. यह पारस्परिक समझ ही लोगों को एक करती है. यही इस देश की खासियत है कि यहां विभिन्नता में भी एकता है. बोलियां भाषाओं के वैविध्य को ख़त्म करती हैं. और यह अकेले मध्य प्रदेश की ही बात नहीं बल्कि सारे मुल्क में कमोबेश यही हाल है. बोलियां अनेक पर समझ एक!

बोलियां ही नहीं रीति-रिवाज़, धार्मिक विश्वास और समाज में व्यवहृत तरीके भी अलग-अलग हैं. लेकिन एकता भरपूर है और रही है. भले ही कुछ समय के लिए इस एकता में व्यवधान आए मगर यह हमारा भारतीय समाज ही ऐसा है कि जल्द ही ये व्यवधान स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं. और फिर समाज अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगता है. इसे भारतीय लोकतंत्र की खूबी कहा जाता है लेकिन मेरा मानना है कि यही भारतीय समाज का मूल चरित्र या मिजाज़ है. अब कुछ समय से अचानक कुछ लोग अपनी-अपनी बोलियों को राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा यानी उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने लगे हैं. इसी तरह कुछ लोग हिंदी के विरोध पर उतर आए हैं. किन्तु वे भूल जाते हैं कि न तो आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाने से कोई बोली अपना साहित्य समृद्ध कर सकती है न ही उसकी लोकप्रियता बढ़ा सकती है. वह कागजों में एक भाषा बन जाएगी और एक दिन मर जाएगी क्योंकि उसके भाषा बनते ही उसे व्यवहृत करने वाले लोग ही उसे दफ़न कर देंगे. ठीक इसी तरह जो लोग हिंदी की जगह अपनी मातृभाषा को थोपने की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि हिंदी न तो किसी देस-प्रदेश की मातृभाषा है न ही वह बहुत प्राचीन भाषा है. वह तो मुगल काल के जाने और अंग्रेजों के आने के बाद उर्दू की तरह पूरे देश में समझी व जानी जाने लगी. उर्दू के साथ दिक्कत यह थी कि एक तो उसकी लिपि विदेशी थी दूसरे उसमें अरबी-फारसी के इतने अधिक शब्द भरे थे कि उसे मुगलों के अपने इलाके के अलावा और कोई समझता नहीं था जबकि संस्कृत के शब्द पूरे देश में समझे जाते थे. इसलिए संस्कृत शब्दों से भरी हिंदी जल्द ही पूरे देश की प्रचलन भाषा (लिंग्वा-फ़्रैंका) बन गई. इसलिए अब हिंदी हटाने की बात करना एक तरह की हठधर्मिता है.

पूरे भारत के दिल को जोड़ती हैं बोलियां! मगर देश को एक सिरे से दूसरे सिरे को जोड़ती है हिंदी. आज विज्ञापन का माध्यम हिंदी है तो बालीवुड फिल्मों के कारण मनोरंजन की भाषा भी. टीवी के एंटरटेनमेंट चैनलों ने हिंदी को घर-घर पहुंचा दिया है. आज उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को हिंदी ही एक करती है. इसकी वजह है हिंदी का अपना लचीलापन और बोधगम्यता. हिंदी को दिल्ली का आदमी अलग अंदाज़ में बोलता है तो हैदराबाद का अलग. कलकतिया हिंदी अलग है और यूपी, एमपी, बिहार, राजस्थान का आदमी अलग ढंग से बोलता है. लेकिन इतने अलगाव के बाद भी हिंदी सबकी अपनी भाषा है और कोई भी उस पर अपना दावा ठोक सकता है. बोलियां हिंदी की जनक हैं और बोलियों से ही हिंदी समृद्ध होती है. इसलिए बोली से दिल जोड़ो और हिंदी से दिमाग.


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