सम्पादकीय

बिहार में सामाजिक सुधार

Gulabi
29 Dec 2021 7:32 AM GMT
बिहार में सामाजिक सुधार
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प्राचीन काल से ही बिहार की भूमि रचनात्मक बदलाव का वाहक रही है
प्राचीन काल से ही बिहार की भूमि रचनात्मक बदलाव का वाहक रही है. इस पुण्य भूमि को गौतम बुद्ध की ज्ञान भूमि, महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण की कर्म भूमि और दशरथ मांझी की श्रम भूमि होने का भी गौरव प्राप्त है. आज की स्थिति में बिहार अपने पुरातन और अपनी नवीनता के बीच रास्ते की तलाश कर रहा है. यह प्रदेश आजादी से पहले चल रहे सभी तरह के आंदोलनों का केंद्र भी रहा है.
इस कारण विभिन्न कुरीतियों को समाप्त करने के लिये चलाये गये सामाजिक सुधार आंदोलन (विधवा विवाह, सती प्रथा उन्मूलन, बाल विवाह और स्त्री-शिक्षा) बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक आते-आते राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गये. समाज सुधारक राजा राममोहन राय, देवेंद्रनाथ ठाकुर, केशव चंद्र सेन और ज्योतिबा फुले आदि उन आंदोलनों के अग्रिम पंक्ति के नेता थे. वर्ष 2005 के बाद राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधीवादी विकास मॉडल के सहारे बिहार में नयी क्रांति का बीजारोपण किया है. मुख्यमंत्री का 'समाज सुधार अभियान' उसी दिशा में सार्थक प्रयास है.
यह 'सामाजिक सुधार अभियान' एक प्रयोग है, जो कि संपूर्ण देश की राजनीति की धारा को बदल सकता है. इस अभियान की खास बात है कि आधी आबादी यानी महिलाओं को इस अभियान के केंद्र में रखा गया है, जहां महिला सुरक्षा, उनकी निजता और उन्हें स्वावलंबी बनाने के प्रति सरकार की जवाबदेही तय होगी. इस अभियान में महिलाओं की भागीदारी के साथ शराबबंदी को लेकर लोगों को विशेष तौर पर जागरूक करने का ध्येय रखा गया है.
महात्मा गांधी ने वर्ष 1930 में लॉर्ड इर्विन के समक्ष ग्यारह सूत्री मांग रखी थी, जिसमें शराबबंदी को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया गया था. वे भी यह मानते थे कि 'शराबबंदी के जरिये' हिंसा को बहुत हद तक काबू में किया जा सकता है. उनका विचार था कि शिक्षा के बिना महिलाओं का मुख्य धारा में शामिल हो पाना संभव नहीं है.
बिहार के इतिहास में वर्ष 2005 को महज राजनीतिक परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन और उस दिशा में उन्नयन के लिए याद किया जायेगा. यह वर्ष बिहार के इतिहास में आजादी के बाद परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है. इस संदर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि यह महात्मा गांधी, डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के सपनों का साकार होने का वर्ष बन गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के साथ ही महिलाओं को चारदीवारी से बाहर निकालकर उन्मुक्त और सुरक्षित आकाश दिया.
उन्होंने ग्राम स्वराज की अवधारणा को मूर्त आकार दिया है. इसके साथ ही उन्होंने समावेशी विकास की अवधारणा पर भी विशेष बल दिया है. उस दिशा में 12 जुलाई, 2005 को न्याय यात्रा से इसकी शुरुआत हुई थी. सरकार के प्रति जनता के विश्वास को जीवित रखने के लिए न्याय यात्रा का मुख्य स्थान रहा.
उसी क्रम में विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, विश्वास यात्रा, सेवा यात्रा, अधिकार यात्रा, संकल्प यात्रा, निश्चय यात्रा और जल-जीवन-हरियाली यात्रा का अगला पड़ाव समाज सुधार यात्रा अभियान है. इसकी शुरुआत महात्मा गांधी की कर्मभूमि चंपारण से हो रही है और इसका समापन अशोक की धरती पाटलिपुत्र में निर्धारित है.
इस अभियान से पहले की गयी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यात्राओं में सामाजिक सुधार पर जोर नहीं था, लेकिन इस बार यह यात्रा नहीं, बल्कि एक अभियान के रूप में प्रदेश की खुशहाली के लिए लिया गया एक अहम कदम जान पड़ रहा है. मुख्यमंत्री ने चरणबद्ध तरीके से बिहार के विकास को नया आयाम दिया है. परिणामस्वरूप बिहार उन राज्यों में सिरमौर बन गया है, जहां महिला केंद्रित विकास की अवधारणा को बल मिला है.
उन्होंने पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत बिहार में पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की हैं. यहीं से बिहार में विकास का पहिया घूमा क्योंकि जब तक महिलाएं सशक्त नहीं होंगी, तब तक घर या समाज सशक्त नहीं बन सकता है. महिला सशक्तीकरण से घर की नींव मजबूत होती है, जिससे सामाजिक ताने-बाने में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है.
इस अभियान में निहित संदर्भ वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में सामाजिक उन्नयन की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप है. भारत में बिहार पहला प्रदेश है, जिसने सामाजिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण विमर्श को सरकार के प्रमुख कार्यों में शामिल कर दिया है. विकास का गांधीवादी मॉडल बिहार के लिए रोल मॉडल बन गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार निराशा के घनघोर अंधेरे को चीरते हुए उम्मीद की नयी किरण लेकर लगातार विकास पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, जहां समाज और संस्कृति के प्रति सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही का निर्धारण कर दिया गया है.
बहरहाल, प्रदेश सरकार का यह सामाजिक सुधार अभियान भारतीय राजनीति में विमर्श को नया आयाम देगा. अब राजनीति में विकास की परिभाषा केवल अवसंरचनात्मक विकास तक सीमित नहीं रह गयी है, बल्कि इसमें मानवीय मूल्यों के प्रति चिंता, सामाजिक व सांस्कृतिक विरासत के प्रति जवाबदेही और वैश्विक स्तर पर सुधार भी शामिल है.
इस बदलाव से सामाजिक व राजनीतिक गतिकी में बदलाव देखने को मिलेगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समाज सुधार अभियान के तहत सामाजिक एवं सांस्कृतिक सुधार को संस्थाबद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका भविष्य में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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