सम्पादकीय

Sir Ganga Ram: लाहौर में सर गंगा राम की याद

Rounak Dey
10 Dec 2022 7:48 AM IST
Sir Ganga Ram: लाहौर में सर गंगा राम की याद
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धार्मिक असहिष्णुता के इस क्रूर दौर में उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
पाकिस्तान में अगर आप नई पीढ़ी के युवाओं से आधुनिक लाहौर के निर्माता दिवंगत सर गंगा राम के बारे में पूछें, तो ज्यादा संभावना यही है कि यह नाम वे पहली बार सुन रहे होंगे। सर गंगा राम एक बहुत बड़ी शख्सियत थे, जिनका लगभग सौ साल पहले निधन हो गया। यहां तक कि पंजाब में भी, लाहौर के लोगों को छोड़ दें, तो सर गंगा राम के बारे में शायद ही लोगों को पता होगा। दिग्गज लोगों के नाम तभी याद रहते हैं, जब लोग, सरकार या मीडिया उनका जिक्र करे। या फिर वे नाम इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में हों। लाहौर में सर गंगा राम के कामकाज की निशानी हर जगह दिखती है, जिनकी आप अनदेखी कर ही नहीं सकते। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पाकिस्तान के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हाल ही में सर गंगा राम का जिक्र किया। जो लोग उन्हें नहीं जानते थे, उन्हें भी विभाजन पूर्व के इस उपमहाद्वीप में सर गंगा राम के अद्भुत व्यक्तित्व और उनके परोपकार भरे कामकाज के बारे में पता चला।
इतिहास बताता है कि विभाजन से बहुत पहले वर्ष 1927 में सर गंगा राम का निधन हो गया था। कई बार मैं सोचती हूं कि विभाजन के समय तक जीवित रहने पर क्या वह दोनों तरफ के पंजाब में हुई भीषण हिंसा और खून-खराबे को रोक सकते थे? पाकिस्तान में सर गंगा राम के बारे में चर्चा होने का कारण यह है कि उनकी परपोती कीशा राम हिंस्डेल, जो अमेरिका में सीनेटर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, अपने पति जैकब हिंस्डेल के साथ पाकिस्तान आई थीं, ताकि अपने परदादा के कामकाज से परिचित हो सकें। प्रसिद्ध लेखक एफएस एजाजुद्दीन ने कीशा राम को बताया कि लाहौर के बहुचर्चित मॉडल टाउन को सर गंगा राम ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों के बीच की दूरी को पाटने के लिए डिजाइन किया था। मॉडल टाउन के चारों कोने पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च थे। लंदन में उनकी मृत्यु होने के बाद लाहौर के लोगों ने मांग की थी कि उनके अस्थिकलश का एक हिस्सा लाहौर भेजा जाए, ताकि उसे हिंदी अपाहिज आश्रम के पास दफनाया जा सके, जैसी कि खुद सर गंगा राम की भी इच्छा थी। वह आश्रम अब वहां नहीं है, पर सर गंगा राम की समाधि है।
लाहौर जाने वाला हर आदमी गंगा राम अस्पताल देखता है। यह अस्पताल इसका जीवंत प्रमाण है कि सर गंगा राम द्वारा लोगों की बेहतरी के लिए उठाया गया कदम उनके न रहने के लगभग एक सदी बाद भी पाकिस्तान के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए उन्हें स्वस्थ कर रहा है। लाहौर के लोग सर गंगा राम की यादों को किस तरह से सहेजे हुए हैं, इसका पता तब चला, जब कीशा राम को उनके परदादा के दस्तखत दिखाए गए। जब अखबारों और सोशल मीडिया पर सर गंगा राम का दस्तखत घूमने लगा, तब लोगों को पता चला कि उनका दस्तखत भी कितना खूबसूरत था। अपने पूर्वज की यह निशानी देखकर कीशा राम ने भावविह्वल टिप्पणी की थी, 'लाहौर में अपने पूर्वजों का घर देखने आई इस महत्वपूर्ण यात्रा में मुझे जो उपहार मिले, उनमें से एक है मेरे परदादा का दस्तखत। मैं अब तक यही सोचती आई थी कि सर गंगा राम से जुड़ी तमाम स्मृतियां नष्ट हो चुकी होंगी। लेकिन यहां आकर मैंने पाया कि लाहौर के लोगों ने करीब सौ साल पुरानी उनकी चीजें सुरक्षित रखी हैं।'
सर गंगा राम की चर्चा छिड़ने पर यहां पाकिस्तान में दो तरह की बातें होने लगी हैं। एक यह है कि क्या लाहौर से जुड़ी उनकी स्मृतियों से पीछा छुड़ाया जाए? और दूसरी यह कि सर गंगा राम से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों को लाहौर म्यूजियम में सुरक्षित रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके नाम और काम से परिचित हो सकें। सर गंगा राम की दयालुता और परोपकार के इतने किस्से हैं कि हैरान रह जाना पड़ता है। दुनिया में आप ऐसे लोग कहां पाएंगे, जो जरूरतमंदों के दुख में दुखी होकर उनकी मदद करते थे? जाहिर है कि लाहौर और पाकिस्तान की मिट्टी में कुछ खास बात तो जरूर होगी। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं कि अनेक बुराइयों के बावजूद ऐसे समाज और देश कम ही होंगे, जहां परोपकार करने वालों की संख्या इतनी ज्यादा होगी। कराची से वजीरिस्तान तक चाहे अमीर हों या गरीब, खासकर रमजान के महीने में परोपकार करने वाले अनेक लोग दिखते हैं।
जैसे कि सीनेटर कीशा राम ने लाहौर में अपने परदादा को याद करते हुए कहा कि जब वह अपनी जिंदगी के आखिरी मुकाम पर थे, तब हेली कॉलेज को लड़कियों को शिक्षा देने के लिए जगह की जरूरत थी। सर गंगा राम स्त्री शिक्षा को बहुत जरूरी मानते थे। कीशा राम कह रही थीं, 'जब मेरे पड़दादा को हेली कॉलेज की परेशानी के बारे में पता चला, तब उन्होंने कहा कि मैंने अपना सब कुछ दान कर दिया है, और अब मेरे पास ज्यादा कुछ बचा नहीं है। ऐसे में, कॉलेज वाले मेरी हवेली ले सकते हैं। यह किस तरह की दयालुता थी!' जब मैंने इस बारे में पढ़ा, तब मेरे मुंह से एक ही शब्द निकला, माशाअल्लाह! लेकिन मेरा मानना है कि सर गंगा राम को सर्वाधिक सम्मान तब दिया गया, जब कीशा राम पंजाब के मुख्यमंत्री परवेज इलाही चौधरी से मिलने के लिए गईं। उस मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने यह एलान किया कि सर गंगा राम की हवेली को म्यूजियम में तब्दील किया जाएगा। इस पर भावुक कीशा राम का कहना था, 'यह सर गंगा राम की स्मृतियों को श्रद्धांजलि है, और उन्हें अगर इस तरह याद किया जा रहा है, तो इसका पूरा श्रेय लाहौर के लोगों को जाता है। आपने लाहौर की बेटी के तौर पर मेरा स्वागत किया, इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।'
यह बेहद दिलचस्प तथ्य है कि कई साल पहले बतौर मुख्यमंत्री परवेज इलाही चौधरी ने ही पंजाब स्थित विश्व प्रसिद्ध कटासराज मंदिर के जीर्णोद्धार का काम शुरू करवाया था। चूंकि पाकिस्तान के कारीगरों को मूर्तियों के संरक्षण की कला नहीं आती, ऐसे में, परवेज इलाही ने भारतीय पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री से कुछ कारीगर भेजने के लिए कहा था। कीशा राम के रहते हुए एक समाधि समारोह भी आयोजित हुआ, जो पाकिस्तान में दुर्लभ है, और जिसमें एक मुस्लिम इमाम और एक हिंदू पंडित ने अगल-बगल बैठकर प्रार्थनाएं की थीं। सर गंगा राम की स्मृतियों की तलाश में पाकिस्तान आईं कीशा राम के अनुभव बताते हैं कि धार्मिक असहिष्णुता के इस क्रूर दौर में उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

सोर्स: अमर उजाला

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