- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- सम्पादकीय
- /
- सत्यं वद: आध्यात्मिक...

x
आध्यात्मिक विकास के लिए
'सत्यं वद' का सीधा सा अर्थ है - सत्य बोलना। जब कोई साधक सत्य की खोज के मार्ग पर चलता है और उस सत्य के मूल स्रोत तक पहुँचना चाहता है, तो यह यात्रा लंबी लग सकती है। ऐसे में, शुरुआत कहाँ से करें और आगे कैसे बढ़ें - ये कुछ बुनियादी सवाल हो सकते हैं। जब साधक पतंजलि द्वारा बताए गए 'अष्टांग मार्ग' का अनुसरण करता है, तो उसके लिए रास्ता स्पष्ट हो जाता है। इस मार्ग के आठ चरणों में से कुछ चरण सामाजिक आचरण से जुड़े हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है। इनमें से पाँच को 'यम' कहा गया है। इन पाँच महत्वपूर्ण नियमों में से एक है - 'सत्य'।
सत्य क्यों अनिवार्य है?
सत्य के मार्ग पर चलना अनिवार्य क्यों है? चूँकि पूरी आध्यात्मिक यात्रा 'सत्य' की स्थिति पर ही आधारित है, इसलिए शुरुआत से ही सत्य बोलने की अपेक्षा रखना एक बुनियादी सिद्धांत है। कोई पूछ सकता है कि क्या यह सच में इतना महत्वपूर्ण है? इसे ऐसे समझें - यदि किसी इमारत की नींव ही मजबूत न हो, तो वह इमारत ठीक से खड़ी नहीं रह सकती।
सत्य की शक्ति
झूठ बोलने पर उसे छिपाने या बचाने के लिए बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है। इसके विपरीत, सत्य अपने आप में अडिग और स्पष्ट होता है। सत्य ही परम है। जो व्यक्ति अपने जीवन में सत्य का पालन करता है, उसे किसी बात का डर नहीं होता। उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि कहीं उसका झूठ सबके सामने न आ जाए। इस तरह के अनावश्यक बोझ से मुक्त होकर, साधक की यात्रा आसान हो जाती है और वह अपने लक्ष्य पर पूरी तरह केंद्रित रह पाता है।
सत्य को शुरुआती बिंदु बनाना
कोई पूछ सकता है कि क्या हमेशा सत्य बोलना संभव है? इसका उत्तर यह है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति में न पड़ें, जिसकी नींव ही झूठ पर टिकी हो। सत्य ही शुरुआत करने का सबसे उत्तम बिंदु है। 'सत्यं वद' (सत्य बोलने) के अभ्यास से आपकी यात्रा में सब कुछ अपने आप सही जगह पर आ जाएगा। अंततः, सत्य ही स्थापित होगा।
Next Story





