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- परीक्षाओं का सम्मान

कोरोना ने अपना प्रहार बढ़ा दिया है और उसके नतीजे आए दिन सामने आने लगे हैं। अंतत: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को स्थगित और 10वीं की परीक्षाओं को रद्द करने पर मजबूर हो गया। संक्रमण के बढ़ने के बाद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जो बैठक प्रस्तावित थी, उसके पहले ही यह अंदाजा लगने लगा था कि सरकार बड़ा फैसला करने वाली है। जब देश में प्रतिदिन संक्रमण के मामले दो लाख के करीब पहुंच गए हैं, तब सामूहिक रूप से एक साथ बैठाकर बच्चों की परीक्षा लेना कतई सही नहीं होता। दसवीं की परीक्षा को पहले ही बहुत टाल दिया गया था, लेकिन अब उसे टालना नामुमकिन था, इसलिए उसे रद्द करने में ही सरकार ने सबकी भलाई समझी। 12वीं की परीक्षा चूंकि आगे की पेशेवर पढ़ाई के लिए जरूरी होती है, इसलिए उसके लिए सरकार उचित ही इंतजार करना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व केंद्रीय शिक्षा सचिव और अन्य शीर्ष अधिकारियों की बैठक में लिए गए फैसलों का स्वागत करना चाहिए। सुरक्षा के तमाम इंतजामों के बावूजद 4 मई से 14 जून के बीच परीक्षा लेना खतरे से खाली नहीं होता। अब राज्यों को भी अपने यहां बोर्ड परीक्षाओं के बारे में फैसला लेने में आसानी होगी। महत्वपूर्ण फैसले के अनुसार, आंतरिक मूल्यांकन से ही छात्रों को दसवीं में पास कर दिया जाएगा। जाहिर है, उन बच्चों के साथ यह नाइंसाइफी है, जो वर्षों से इस परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे थे। निकट इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब दसवीं की परीक्षा रद्द कर दी गई है, वरना दसवीं की परीक्षा का पारिवारिक-शैक्षणिक तनाव पांचवीं-छठी कक्षा से ही शुरू हो जाता है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि अभी दसवीं की परीक्षा से वंचित बच्चों को दोबारा मौका नहीं मिलेगा। जब कोरोना का असर कम होगा, तब सरकार दसवीं की परीक्षा कराएगी और उसमें वे तमाम बच्चे शामिल हो सकेंगे, जो आंतरिक मूल्यांकन से संतुष्ट नहीं होंगे। जहां तक 12वीं की परीक्षा का सवाल है, तो सरकार 1 जून को देश में कोरोना का हाल देखने के बाद फैसला लेगी।





