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सुरक्षित कफ सिरप के लिए उपाय
'मेड इन इंडिया' दूषित कफ सिरप पीने से कई जगहों पर बच्चों की बेबस मौत की दुखद घटनाओं ने समय-समय पर फार्मा सुरक्षा की शर्मनाक स्थिति को उजागर किया है। उज़्बेकिस्तान से लेकर मध्य प्रदेश तक, कम उम्र के बच्चे अपनी जान गंवा बैठे क्योंकि सिरप में मौजूद 'डाइथिलीन ग्लाइकोल' नाम के दूषित तत्व के कारण उनके किडनी और लिवर फेल हो गए थे।
रेगुलेशन और क्वालिटी कंट्रोल की लापरवाह व्यवस्था ने दशकों तक इस समस्या को ठीक नहीं किया। इस संकट के कारण हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा सेक्टर को फटकार लगाई और पूछा कि क्या उन्हें आसान मुनाफ़े की चाहत में देश की प्रतिष्ठा को हुए नुकसान का अंदाज़ा है।
अब, इसके जवाब में केंद्र सरकार ने डॉक्टर की पर्ची के बिना कफ सिरप की बिक्री पर रोक लगा दी है, ताकि दवा की बिक्री रेगुलेटेड और लाइसेंस-प्राप्त दवा विक्रेताओं के ज़रिए ही हो। इससे दवा की आवाजाही पर बेहतर नियंत्रण हो सकता है और अनावश्यक दवा के इस्तेमाल से बचा जा सकता है, साथ ही गड़बड़ी होने पर एक वेरिफ़िएबल रिकॉर्ड भी बन सकता है। फिर भी, देश में फार्मास्युटिकल रिटेल की हकीकत और पर्ची से जुड़े ढीले नियमों को देखते हुए, इस समस्या के समाधान की संभावना कम ही है। सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (CDSCO) ने दवा की क्वालिटी से जुड़े अपने अधिकारों को लागू करने में बहुत सुस्ती दिखाई है; क्वालिटी से जुड़े घोटाले के बाद उसने लगभग 1,300 सिरप निर्माताओं में से 90% के ऑडिट से ही संतोष कर लिया। उसने उन दोषी दवा निर्माताओं की जानकारी सार्वजनिक नहीं करके अनुचित गोपनीयता बरती है, जिन्हें गंभीर कमियों के लिए नोटिस जारी किए गए थे। रेगुलेशन से जुड़ी ऐसी गंभीर कमी को केवल कफ सिरप के वितरण में रुकावट पैदा करके दूर नहीं किया जा सकता।
देश में दवा की क्वालिटी से जुड़ी एक मुख्य समस्या कानूनों की अपर्याप्तता है। हालांकि CDSCO के पास दवा बनाने के तरीकों और क्वालिटी का आकलन करने का अधिकार है, लेकिन कोई ऐसी व्यापक व्यवस्था नहीं है जो सभी राज्यों में रोक लगाने में सक्षम हो, जब कोई एक राज्य किसी खास निर्माता के उत्पादों में गड़बड़ी पाता है। अगर महाराष्ट्र के ड्रग कंट्रोल अधिकारियों को हिमाचल प्रदेश की किसी दवा में समस्या मिलती है, तो वे उस राज्य के अधिकारियों को केवल कार्रवाई करने के लिए सूचित कर सकते हैं। यहां तक कि दोषी निर्माताओं की जानकारी भी राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध नहीं होती ताकि सभी राज्यों को नकारात्मक नतीजों के बारे में चेतावनी दी जा सके। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की पुरानी व्यवस्था के कारण रेगुलेशन में जो बाधाएं आती हैं, उन्हें आबादी में बढ़ोतरी और कई नई दवाओं व फ़ॉर्मूलेशन के आने के हिसाब से आधुनिकीकरण के ज़रिए दूर करने की ज़रूरत है। सरकार को दवाओं की सुरक्षा के मामले में ढिलाई बरतना बंद करना चाहिए और 'जन विश्वास एक्ट, 2023' में बदलाव करना चाहिए। इस कानून ने नियमों को ढीला कर दिया है और गलत काम करने वालों को कोर्ट से मिलने वाली सज़ा से बचाता है। केंद्र सरकार के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वह CDSCO और राज्यों के ड्रग रेगुलेटर्स को निर्देश दे कि वे दवा टेस्टिंग से जुड़ी पूरी जानकारी RTI एक्ट के तहत 'प्रोएक्टिव डिस्क्लोज़र' (खुद से जानकारी सार्वजनिक करने) के नियम के तहत सबके सामने लाएं। घटिया या ज़हरीली भारतीय दवाओं, जैसे कि कफ सिरप, रिंगर लैक्टेट सॉल्यूशन और आई ड्रॉप्स, के कारण कई लोगों की जान गई है। इस शर्मनाक सिलसिले को खत्म किया जाना चाहिए।
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