सम्पादकीय

कांग्रेस की असलियत

Subhi
21 March 2022 10:54 AM IST
कांग्रेस की असलियत
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विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस का असंतुष्ट खेमा जी-23 फिर सक्रिय हुआ है। हमेशा की तरह कुछ हलचल करके इसके नेता अपनी मांदों में लौट जाएंगे या इस बार नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनी जाएगी, यह वक्त ही बताएगा।

Written by जनसत्ता: विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस का असंतुष्ट खेमा जी-23 फिर सक्रिय हुआ है। हमेशा की तरह कुछ हलचल करके इसके नेता अपनी मांदों में लौट जाएंगे या इस बार नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनी जाएगी, यह वक्त ही बताएगा। वैसे आजादी के बाद से सत्ता सुख भोग रही कांग्रेस और कांग्रेसियों को विपक्षी राजनीति की आदत नहीं है। आज की कांग्रेस जमीनी सच्चाई, रचनात्मकता और मौलिकता से दूर प्रतिक्रियात्मक राजनीति कर रही है और अक्सर ये प्रतिक्रियाएं भी तथ्यों से परे होती हैं।

कांग्रेस खुद के लिए अवसर पैदा करने के बजाय अन्य दलों की गलतियों में अपने लिए मौके खोज रही है। इस समय कांग्रेस जहां है, वहां से उसका पुनर्जीवित होना आसान नहीं है, उसका सिर्फ जीर्णोद्धार या पुनर्निर्माण ही हो सकता है। गांधी परिवार के मोह में फंसे इच्छाशक्ति विहीन कांग्रेसियों का कपिल सिब्बल के 'घर की कांग्रेस नहीं सबकी कांग्रेस चाहिए' बयान पर बिफरना दर्शाता है कि फिलहाल कांग्रेस में बदलाव मुश्किल है। ऐसे में जिस किसी भी कांग्रेसी में राजनीतिक इच्छाशक्ति जागेगी, वह अपने हिस्से की ईटें लेकर नए ठिकाने की और चल देगा।

हमारे देश में तरह-तरह के अपराध होते रहते हैं। पुलिस मुकदमे भी दर्ज करती है और लंबे समय तक मामलों की जांच भी करती है और फिर अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर देती है। । कई बार ठोस सबूतों के अभाव में अदालत आरोपियों को बरी कर देती है। ऐसे भी मामले होते हैं जिसमें कि पुलिस जानबूझ कर निर्दोष लोगों को भी फंसा देती है और अदालत में उनको इस तरह से इंसाफ मिलता है। हाल में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा अध्यापक सोनी सोरी को 2011 में राज्य की पुलिस ने नक्सलियों की मदद करने के साथ गिरफ्तार किया था। उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया और यातनाएं दी गईं। आखिरकार अदालत ने उन्हें ठोस सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

सोनी सोरी के बरी होने की घटना ने एक बार फिर पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। कैसे पुलिस ने उन पर मुकदमा कर सालों जेल में रखा और पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी। क्या पुलिस अब सोनी सोरी के जीवन के उन पलों को लौटा पाएगी? झूठे मामले बना कर जेलों में ठूंस देना और सालों बंद रख कर जीवन तबाह कर देने के ढेरों उदाहरण हैं। अगर अदालतें चौकस न रहें तो लोग जेल में मरने को मजबूर हो जाएंगे। यह पूरी तरह से पुलिस की लापरवाही और द्वेषपूर्ण कार्रवाई का मामला है। ऐसे मामलों में आरोपी को लंबी न्यायिक प्रक्रिया से तो गुजरना ही पड़ता है, साथ ही उसकासामाजिक जीवन और प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाती है। सरकार को पुलिस प्रशासन प्रणाली में सुधार लाने के लिए अब तो सोचना चाहिए।

राजस्थान के पाली जिले में हाल में मूंछ रखने को लेकर दलित युवक की हत्या ने सरकार और समाज के समक्ष एक बार कई सवाल खड़ कर दिए हैं। यह बहुत ही पीड़ादायक है कि आज जब देश इक्कीसवीं सदी, विकास, दलितों का उत्थान जैसी बातें और दावे कर रहा है, तो दूसरी ओर ऐसी विकृत और सामंती मानसिकता के लोगों को गरीब दलितों का मूंछ रखना भी बर्दाश्त नहीं होता।

आज भी अगर दलित को घोड़ी से उतार दिया जाता है, बेइज्जत किया जाता है। सदियों से गरीबों पर जो रौब और दबदबा दिखाने की मानसिकता बनी हुई है, वह अभी गई नहीं है। 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का नारा लगातार बुलंद हो रहा है। सवाल तो इस बात का है कि जब मूंछ रखना ही बर्दाश्त नहीं हो रहा है तो फिर ऊंचे पदों पर आसीन होते कैसे बर्दाश्त होंगे? अगर लोग जाति या सवर्ण-दलित के खांचों में ऐसे ही बंटे रहेंगे तो समाज गर्त में चला जाएगा।

देश में समय-समय पर यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआइ) की आवाज किसानों और गरीबों के उत्थान के लिए वरदान बताते हुए उठती रही हैं। लेकिन भारत में आरक्षण और भ्रष्टाचार के कारण इस योजना का भी हर जातिवर्ग के जरूरतमंद बेरोजगारों को फायदा नहीं होने वाला। इस फैसले को हरी झंडी देने से पहले सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि कहीं इससे देश के विकास की रफ्तार पर विपरीत असर तो नहीं पड़ने लगेगा।

भारत जैसे देश में जहां लगभग लोग काम से ज्यादा आराम को तवज्जो देते हों, सरकार से मुफ्त सुविधाओं की उम्मीद रखते हों, वहां अगर सरकार की तरफ से बिना मेहनत की आमदनी मिलने लगेगी तो इससे नकारात्मक प्रभाव ही पड़ेगा। सरकार को चाहिए कि वह खैरात बांटने की बजाय देश के हर हाथ को रोजगार मुहैया करवाने, मेहनत करने वालों को आमदनी बढ़ाने और महंगाई कम करने जैसे उपायों पर जोर दे। निजी क्षेत्र में रोजगार पैदा करने पर ध्यान दे और उनका भविष्य सुरक्षित करे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया के देशों ने 1949 में जिनेवा संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत युद्ध के नियमों की स्थापना की गई थी। इसमें साफ-साफ लिखा है कि युद्ध जितना भी भीषण हो जाए, असैनिकों, मरीजों, स्वास्थ्य केंद्रों पनाह लेने वाले निहत्थे नागरिकों पर हमला नहीं किया जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक रूस ने यूक्रेन के तियालीस स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों पर हमले किए, जिसमें सात सौ के करीब स्वास्थ्यकर्मी और मरीज मारे गए। ऐसा करके रूस ने सीधे तौर पर विश्व समुदाय को ललकारा है कि तुम जितना भी भाषण बाजी कर लो, हम तो मानवता का खून करते रहेंगे।


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