सम्पादकीय

रमज़ान: मुस्लिम संस्कृति की कौनसी चीज़ों को हिंदुओं ने अपना बना लिया

Gulabi Jagat
24 April 2022 6:32 AM GMT
रमज़ान: मुस्लिम संस्कृति की कौनसी चीज़ों को हिंदुओं ने अपना बना लिया
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रमज़ान खत्म होने को है और जल्द ही ईंद आएगी
अनिमेष मुखर्जी |
रमज़ान (Ramzan) खत्म होने को है और जल्द ही ईंद आएगी. ईद से जुड़ी पहली यादों में प्रेमचंद की कहानी ईदगाह याद आती है, जहां हामिद अपनी दादी अमीना के लिए चिमटा लेकर आता है. हालांकि, आज के माहौल में हामिद हो या कोई और चिमटा शायद ही लाए. हां, ऐसा ज़रूर लगता है कि कुछ समय बाद बुल्डोज़र वाले खिलौने बाज़ार में खूब लोकप्रिय होंगे. सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों की बातों से लगता है कि भारत (Indian Culture ) में पिछले 1,000 साल से सिर्फ एक ही काम हो रहा था. इस्लामिक (Islamic Culture) आतातायी बाहर से आते थे और यहां के लोगों यहां की धार्मिक संस्कृति पर हमला करते थे और उसे बिगाड़ देते थे, और अब पिछले 8 सालों में यह सब बदल गया है. जबकि इतिहास इससे काफ़ी जुदा है. हमलावर भी आए और व्यापारी भी. कुछ ने डर से अपना धर्म बदला, तो कुछ प्रेम, दोस्ती और सत्ता के लालच में भी एक धर्म से दूसरे में चले गए. चलिए उन चीज़ों की बात करते हैं जो भारत में हिंदुओं और मुस्लिमों के मेल से बनीं.
इनमें दो तरह की उत्पत्तियां थीं, एक जो बाहर से इस देश में आईं और दूसरी जो यहां पहले से मौजूद थीं और तत्कालीन सत्ता के संरक्षण ने उन्हें एक नया रूप दिया. आज हम कबाब, बिरयानी और ताजमहल जैसी अति-लोकप्रिय चीज़ों से अलग बात करेंगे. हां, एक तर्क व्हॉट्सऐप प्रशिक्षित लोग अक्सर देते हैं कि मुगलों के पास इतनी ही वास्तुकला थी, तो सऊदी अरब में कुछ क्यों नहीं बनवाया. इसका जवाब यह है कि मुगल सऊदी अरब में कुछ इसलिए नहीं बनवा पाए, क्योंकि वे अरब से नहीं थे. आगे की बात आसानी से समझने के लिए अगर आप गूगल पर ईरान की ऐतिहासिक इमारतें सर्च करेंगे, तो आपको लगेगा कि आप दिल्ली या राजस्थान की पुरानी इमारतों की तस्वीरें ही देख रहे हैं.
कुरान के चार संस्कृत शब्द
केटी आचाया की किताब हिस्टॉरिकल कंपैनियन ऑफ़ इंडियन फूड के मुताबिक कुरान में चार संस्कृत मूल के शब्द हैं और इन चारों का संबंध भोजन से है. कफ़ूर (कर्पूर), ज़ैंजाबील (श्रंगवेरा यानि अदरक, जिससे अंग्रेज़ी का जिंजर भी बना), मश्क (मुष्क, कस्तूरी) और अंबर (पीले रंग की सूखी राल). ज़ाहिर सी बात है कि कुरान में यह शब्द भारत में इस्लामिक शासन के स्थापित होने से काफ़ी पहले शामिल हुए थे. इसका कारण है दक्षिण भारत से इन देशों के व्यापारिक संबंध. केरल वगैरह में आने वाले व्यापारी इन चीज़ों को यहां से लेकर भी गए और यहाँ रहकर ब्याह शादियां भी करने लगे. इन ब्याह शादियों की रस्मों में कई चीज़ें इधर से उधर हुईं.
सबसे बड़ा उदाहरण शादी से पहले हल्दी की रसम है, जो हिंदू रीति-रिवाजों से होते हुए मुस्लिमों में भी पहुंची. इस के साथ-साथ बच्चों को काला टीका लगाना, गोदभराई, बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद तक अशुद्ध मानना और पश्चिमी भारत के कुछ इलाकों में किसी की मृत्यु के बाद कुछ समय तक शाकाहार करना भी ऐसी रस्में भी हैं, जो हिंदुओं से मुस्लिमों में पहुंचीं. वहीं आज हिंदू शादियां शेरवानी और लहंगे के बिना नहीं होती हैं. शेरवानी और पैजामे का मुस्लिम कनेक्शन सबको पता है, जबकि लहंगे की कहानी में कई परते हैं. घाघरा और दूसरे कई रूपों में लहंगा भारत में मौजूद था, मुगलों ने तीन हिस्सों वाली इस पोशाक में रेशमी कपड़े और ज़री का काम शामिल किया और ये देखते ही देखते राजपूत और मुगल दोनों जगह लोकप्रिय हुआ. दोनों पक्षों के वैवाहिक संबंधों की बदौलत एक और काम हुआ, इन मुस्लिम चमक-दमक वाली पोशाकों का इस्तेमाल ठाकुर जी को सजाने में होने लगा. आज भी आप किसी धार्मिक सामान की दुकान पर जाइए तो वहाँ ठाकुर जी की पोशाक खरीदती महिलाएं दिख जाएंगी और उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होगा कि जिस शब्द और वेशभूषा का वे इस्तेमाल कर रही हैं वह किसी दूसरे धर्म और संस्कृति से आई है.
फलों की डिप्लोमेसी और महंगाई कंट्रोल
हिंदी फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी को जैसे दिखाया गया हो, उसने भारत को एक ऐसी प्रणाली दी जिसकी वर्तमान समय में काफ़ी ज़रूरत है. खिलजी ने बाज़ार नियंत्रण के नियम बनाएं और तय किया कि व्यापारी बेईमानी न करें और महंगाई नियंत्रण में रहे. खिलजी ने तय किया कि 4-5 लोगों का महीने भर का राशन 5-6 टके में आ जाए, जबकि उस दौर में आम सिपाही की तनख्वाह, 20 टके के आसपास होती थी. इसी तरह बाबर और दूसरे बादशाहों ने फलों के साथ कुछ नए काम किए और उनके बारे में विस्तार से लिखा है.
सिकंदर लोदी ने बाकायदा ऐलान किया कि जोधपुर के अनार, ईरान के अनारों से स्वाद में बेहतर हैं. बाबरनामा में जिन फलों का ज़िक्र है, उनमें से एक अमृतफल है. अमृतफल कौनसा फल था हम ठीक तो नहीं कह सकते, लेकिन अंदाज़ा लगाया जाता है कि यह संतरे जैसा कुछ होगा. बाबर ने अपने संस्मरणों में कटहल की तुलना बकरे की कलेजी से की है. यह एक ऐसी तुलना है जिसे उत्तर भारत के तमाम लोग आज तक मानते चले आ रहे हैं. मुगलों ने तमाम फलों की बेहतरीन किस्में अपने लिए लगवाना शुरू किया और साथ-साथ उन्हें दूसरे राजाओं, नवाबों और विदेशी दूतों को भिजवाने की परंपरा बनाई. यह फ़्रूट डिप्लोमेसी आज भी चल रही है.
इससे जुड़ा एक रोचक वाकया है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पाकिस्तान के ज़िया उल हक़ ने रटौल आम की पेटी भेजी और कहा कि ऐसे आम हिंदुस्तान में नहीं मिलेंगे. इंदिरा गांधी ने भी पाकिस्तानी रटौल की काफ़ी तारीफ़ कर दी. बाद में किसी ने उन्हें बताया कि रटौल तो मेरठ का आम है जिसे विभाजन के समय कोई अनवर मियां पाकिस्तान ले गए थे और लगाया था. शायद ऐसे विवादों का ही डर था कि फल भिजवाने वाले नवाब और बादशाह अपनी खास किस्मों के बीजों में छेद करवा दिया करते थे, ताकि उसकी खासियत बनी रहे.
तीन मिठाइयां पूरे इतिहास को बताने में सक्षम
फलों से इतर मिठाइयों की बात करें, तो तीन मिठाइयां पूरे इतिहास को बताने में सक्षम हैं. सबसे पहली है जलेबी, जलेबी ईरान से आई और ज़ुलेबिया से जलेबी बनी. हालाँकि, यह मुगलों के पहले ही भारत आ चुकी थी सन् 1450 के एक जैन ग्रंथ में जलेबी का ज़िक्र मिलता है और जलेबी का भोग भगवान कृष्ण समेत कई देवताओं को लगता है. दही जलेबी नवरात्र में कन्याओं को खिलाने का ही चलन है. दूसरी चीज़ है कुल्फ़ी. यह मुगलों के समय में भारत में विकसित हुई.
आइन-ए-अकबरी में कुल्फ़ी बनाने की रेसिपी दी हुई. गाढ़े मीठे दूध को केसर और पिस्ता मिलाकर धातु के नुकीले बर्तन में भरकर, नमक और बर्फ़ भरे मटके में सीलबंद किया जाता था. इस नुकीली चीज़ के फ़ारसी नाम से ही इसका नाम कुल्फ़ी पड़ा और कुल्फ़ी सदियों से ऐसे ही बनती आ रही है. तीसरी चीज़ है दूध. अब आपको तमाम मुस्लिम मिठाइयों में शीर खुरमा और शीर माल जैसे नाम मिलेंगे. यहां शीर, संस्कृत के क्षीर से आया है, जिसका अर्थ दूध होता है. इन सबके अलावा खिचड़ी एक ऐसी चीज़ है जिसे अकबर ने अपने ब्राह्मण अधिकारियों के ज़रिए चखा और इसका मुरीद हुआ. बाद में तमाम बादशाहों ने खिचड़ी के साथ कई प्रयोग भी करवाए और उसे शाही मिजाज़ के हिसाब से बनाने की कोशिश की. वहीं मध्य एशिया से आया समोसे में कीमे की जगह पुर्तगाली आलू भरे गए और इन दो विदेशी चीज़ों से मिलकर आलू वाला भारतीय समोसा बन गया. वहीं संस्कृत के कपित्थ, जंबूफल वाला पर्ण (पान) ने तो ऐसा रंग बदला कि आजतक इसका इस्तेमाल पारंपरिक मुस्लिम परिवेश को चित्रित करने में होता है.
कुल-मिलाकर, राजनीति चाहे जो कहे करीब एक हज़ार साल के समय में तमाम संस्कृतियों और रीतिरिवाजों का आदान प्रदान हुआ है. इन्हें अगर अलग करने बैठेंगे, तो बहुत समस्या होगी. वैसे भी सच और न्याय के नाम पर बारूद के ढेर में माचिस दिखाने का दौर है, तो कोई भरोसा नहीं कल को कोई कहे कि अलाउद्दीन खिलजी ने महंगाई नियंत्रण किया था, इसलिए हम महंगाई को बढ़ावा देंगे.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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