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
भारत को भविष्य में कौनसी दिशा ग्रहण करनी चाहिए, प्रगति के लिए कौनसा रास्ता चुनना चाहिए, सबसे बढ़कर भारत की पहचान क्या है, उससे क्या अभिप्रेत है, यह सब जानने-बूझने के लिए सोनिया कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता राहुल गांधी लंदन गए थे। इस प्रकार के प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान तलाशने के लिए लंदन को क्यों चुना गया, इसको लेकर भारत में कुछ लोग हलकान हो रहे हैं। कांग्रेस हैरान है कि इसमें इतने अचंभे वाली बात कौनसी है? अपने-अपने हिसाब से दोनों पक्ष ही ठीक हैं। कांग्रेस की स्थापना ही लंदन का आइडिया था। उसका भारत के आइडिया से कुछ लेना-देना नहीं था। भारत का आइडिया तो 1857 का स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया महासंग्राम था। चाहे उसमें भारत की पराजय हुई थी, लेकिन उस महासंग्राम ने भारत को ऊर्जावान कर दिया था। वह क्रोधोन्मत हो गया था। लंदन समझ गया था कि अब गोरों को भारत से भगाए जाने का यह भारत का आइडिया समाप्त होने वाला नहीं है। इसलिए लंदन ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए सेफ़्टी वाल्व के तौर पर कांग्रेस की स्थापना की थी। लंदन यह तो समझ ही गया था कि कांग्रेस भी ब्रिटिश साम्राज्य को अनंत काल तक सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती थी। लंदन ने दूसरी रणनीति के तहत, भारत की पहचान, सामाजिक सामंजस्य और भारत के स्वरूप को बदलने के लिए कुछ सूत्र कांग्रेस को दिए। कांग्रेस की जि़म्मेदारी यह थी कि वह भारत को इन्हीं सूत्रों के सहारे स्वयं भी समझे और दूसरों को भी समझाए। कांग्रेस ने इन सूत्रों को पूरी स्वामिभक्ति से स्वीकार किया और भारत में उनको प्रचारित भी किया। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र था, भारत पर आर्यों के आक्रमण का कपोल कल्पित सिद्धांत। कांग्रेस ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताबों में इसका प्रचार भी किया। बाबा साहिब अंबेडकर ने इस सिद्धांत का विरोध ही नहीं किया, बल्कि इसे शरारतपूर्ण भी कहा। ताज्जुब ही कहा जाएगा कि इस पर कांग्रेस ने अंबेडकर को ब्रिटिश एजेंट कहा। यानी कोयला दूसरे पर काला होने का आरोप लगाए। अंग्रेज़ों ने कहा कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, कांग्रेस ने इसका प्रचार किया। कि़स्सा कोताह यह कि कांग्रेस ने आज़ादी के बाद भी सरकार 'लंदन के आइडिया' से ही संचालित की। ज़ाहिर है इससे भारत में ग़ुस्सा पनपता। यदि देश को 'आइडिया फ्राम लंदन' से ही चलना था तो अंग्रेज़ों को भगाने की क्या जरूरत थी? इसका उत्तर भी अपने समय में बाबा साहिब अंबेडकर ने ही दिया था। उन्होंने कहा था कि लोगों को भ्रम है कि कांग्रेस किसी आइडिया के आधार पर लड़ रही है। वह केवल सत्ता या कुर्सी के लिए ही लड़ रही है। आरोप स्पष्ट था कि कांग्रेस भारत की सत्ता 'लंदन के आइडिया' से चलाने के लिए तैयार है, शर्त केवल इतनी है कि गोरे शासक सत्ता उनको सौंप दें। दोनों पक्षों ने ईमानदारी से किया। इतनी ईमानदारी से कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत में से ब्रिटिश सत्ता समाप्त हो जाने के बाद भी स्वतंत्र भारत की कमान लार्ड माऊंटबेटन को सौंप दी। माऊंटबेटन भारत के पहले गवर्नर जनरल थे। यह माऊंटबेटन का ही आइडिया था कि गिलगित पाकिस्तान के हवाले कर दिया जाए। इस आइडिया को क्रियान्वित करने में पंडित नेहरू की कितनी भूमिका रही है, इसकी स्वतंत्र रूप से जांच हो सकती है। पुरानी फाइलें जांची-परखी जाएं तो कितना कुछ उगल सकती हैं।
सोर्स- divyahimachal
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