सम्पादकीय

मध्य प्रदेश में धरोहर संभाल रहे ट्रस्टों की भूमिका पर सवाल, पिछले दरवाजे से बेच भी रहे संपत्तियां

Gulabi
11 Oct 2020 9:34 AM GMT
मध्य प्रदेश में धरोहर संभाल रहे ट्रस्टों की भूमिका पर सवाल, पिछले दरवाजे से बेच भी रहे संपत्तियां
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मध्य प्रदेश में राजघरानों से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों को संभाल रहे ट्रस्टों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। मध्य प्रदेश में राजघरानों से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों को संभाल रहे ट्रस्टों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। कई राजघरानों की संपत्ति की देखरेख का जिम्मा लंबे समय से ट्रस्ट संभाल रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात है कि ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता पिछले दरवाजे से उन संपत्तियों को बेच भी रहे हैं।

भारतीय अस्मिता को गौरवपूर्ण पल देने वाली महारानी देवी अहिल्या बाई होल्कर एवं समूचे होल्कर राजघराने की धरोहरों के संरक्षण के लिए बनाए गए खासगी ट्रस्ट के खिलाफ आए उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के फैसले के बाद यह जरूरी हो गया है कि सरकार ट्रस्टों की निगरानी की नई पारदर्शी व्यवस्था बनाए, ताकि इतिहास से हो रही छेड़छाड़ रोकी जा सके।

ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने का सबसे कारगर तरीका यही होगा कि सरकार ट्रस्टों की कार्यप्रणाली को सुस्पष्ट कानून के दायरे में ले आए। हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि होल्कर ट्रस्ट के जिम्मे दी गई सारी संपत्ति सरकारी है। ऐसे में कोई भी संपत्ति बेचने का अधिकार ट्रस्ट को नहीं है। फिलहाल उच्च न्यायालय के फैसले से खासगी ट्रस्ट के सारे गड़बड़झाले की जांच का रास्ता साफ हो गया है।

खासगी ट्रस्ट के बारे में सरकार द्वारा कराई गई जांच में राजफाश हो चुका है कि उससे जुड़े व्यक्तियों ने प्रयागराज, हरिद्वार, पुष्कर सहित ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थानों पर होल्कर राज परिवार की कई संपत्तियों को औने-पौने दाम पर बेच दिया।

विक्रय के लिए वर्ष 1972 की उस डीड को आधार बनाया गया, जिसकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में है। बात सिर्फ संपत्ति को बेचने की नहीं है, बल्कि विरासत से छेड़छाड़ की भी है। जिन लोगों को संपत्तियों के रखरखाव का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने तो विश्वासघात किया ही, प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही ने भी उन्हें मौका दिया। बरसों से ट्रस्ट की संपत्ति को किनारे लगाने की शिकायतें हो रही थीं, पर प्रशासन आंख मूंदकर बैठा रहा।

वर्ष 2012 में मामला तब सामने आया जब शिकायत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संज्ञान में आई।

मुख्यमंत्री ने इसकी जांच का जिम्मा तत्कालीन प्रमुख सचिव और राजस्व के मामलों के जानकार मनोज कुमार श्रीवास्तव को सौंपा था। उन्होंने विस्तृत जांच करके रिपोर्ट दो नवंबर 2012 को मुख्य सचिव को सौंपी थी, लेकिन इस पर उस तेजी से काम नहीं हुआ, जिसकी मंशा मुख्यमंत्री ने जताई थी। मामला कोर्ट-कचहरी में उलझ गया। इसमें इंदौर के तत्कालीन कमिश्नर की लापरवाही भी सामने आ रही है, क्योंकि वह आंख मूंदे रहे।

जांच रिपोर्ट के मुताबिक ट्रस्ट की मनमानी उजागर होने के बाद करीब आठ साल पहले इंदौर के तत्कालीन कलेक्टर ने एक आदेश जारी कर ट्रस्ट की संपत्तियों का नामांतरण राज्य शासन के नाम करने का आदेश दिया था। खासगी ट्रस्ट ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने कलेक्टर के आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। शासन ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की।

इस बीच एक नागरिक विपिन धनोतकर ने भी जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दायर कर दी। लंबी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में खासगी ट्रस्ट के नियंत्रण वाली संपत्तियों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दी। ऐसे में ट्रस्ट द्वारा संपत्तियों की बिक्री अवैध है। हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह संपत्तियों को बेचने के मामले की जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ से कराए। दरअसल, खासगी ट्रस्ट में शामिल संपत्तियों को गुपचुप ढंग से बेचने का सिलसिला 37 साल पहले शुरू हो गया था। इसमें पुष्कर, रामेश्वरम, नासिक और हरिद्वार की संपत्तियां शामिल हैं। सबसे पहले राजस्थान के पुष्कर में ट्रस्ट का बाड़ा और दुकानें बेच दी गईं। यह बिक्री 1983-84 से 1998-99 के बीच हुई।

इसके बाद रामेश्वरम में वर्ष 2006 से 2008 के बीच ट्रस्ट की संपत्ति बेची गई। हरिद्वार में वर्ष 2009-10 में होल्कर बाड़ा, मंदिर और कुशावर्त घाट की संपत्तियों को बेचा गया। इस बीच हाईकोर्ट ने पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि यह सारी संपत्ति सरकारी है। होल्कर की संपत्तियों की देखभाल और उसके व्यय पर नियंत्रण के लिए 27 जून 1962 को खासगी ट्रस्ट बनाया गया था। संपत्तियों के राज्य शासन में विलय के बारे में 10 अगस्त 1971 तक किसी भी प्रकार का कोई भ्रम नहीं था। इस मामले में गड़बड़ी एक मार्च 1972 को पूरक (सप्लीमेंट्री) ट्रस्ट डीड से शुरू हुई।

इसके माध्यम से ट्रस्टियों ने खुद को राज्य शासन के नियंत्रण से मुक्त कर लिया। इसी सप्लीमेंट डीड के बाद संपत्तियों के खुर्द-बुर्द होने का खेल शुरू हुआ, जबकि ट्रस्ट को केवल संपत्तियों की देखभाल करने के अधिकार थे, न कि उन पर स्वामित्व के। ट्रस्ट अधिनियम के प्रविधानों के अनुसार ट्रस्टियों को संपत्ति के अंतरण का अधिकार ही नहीं था। हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद माना जा रहा है खासगी ट्रस्ट से जुड़े लोग आगे का कानूनी रास्ता तलाश रहे हैं। इस प्रकरण के सामने आने के बाद सरकार की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वह ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख करने वाले ट्रस्टों को स्पष्ट कानूनी दायरे में लाने का उपाय करे।

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