सम्पादकीय

नेपाल में फिर राजनीतिक अस्थिरता

Gulabi
24 May 2021 5:24 AM GMT
नेपाल में फिर राजनीतिक अस्थिरता
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राजनीतिक अस्थिरता

आदित्य चौपड़ा। नेपाल यद्यपि छोटा का मुल्क है परंतु वहां की 80 फीसदी आबादी हिंदू धर्म को मानती है। शैव मत और गोरखनाथ की बड़ी मान्यता है। सभ्यता और संस्कृति के मापदंडों पर भी नेपाल की नजदीकी भारत के साथ बैठती है। भारतीय उपमहाद्वीप में नेपाल हिंदू राष्ट्र के तौर पर अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावे और अध्यात्म की अलग पहचान रखता था। नेपाल के राजा को हिंदू देवी- देवताओं की तरह पूजा जाता था लेकिन धीरे-धीरे नेपाल के उदारवादी नेता हाशिए में जाते गए और माओवादी बंदूक की नोक पर अपने हिसाब से लोकतंत्र की परिभाषा तय करने लग गए। माओवादियों ने नेेपाल की राजशाही के अंत का फरमान लिख दिया। हिंदू राजवंश का इतिहास किस्से कहानियों का हिस्सा बन गया। 28 मई 2008 को नेपाल के इतिहास के राजवंश युुग का अंत हो गया। राजशाही के खिलाफ नेपाली इसलिए एकजुट हुए थे क्योंकि उन्हें यही समझाया गया था कि नेपाल को राजशाही से भी अच्छा शासन और स्वतंत्रता मिलेगी लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। नेपाल के हाथ में इन दोनों में से कुछ नहीं आया। नेपाल राजशाही से तो मुक्त हो गया लेकिन उसके लोकतंत्र की सांसें राजनीतिक दलों की भयंकर गुटबाजी में अटक गईं। जिस समय नेपाल में लोकतंत्र की हवा चलने लगी ​थी और माओवादियों का उदय हुआ था तभी से चीन की नजरें नेपाल पर लगी हुई थीं। नेपाल में राजवंश की समा​िप्त के बाद हिंदू राष्ट्र का दर्जा खत्म कर दिया गया और नेपाल प्रजातांत्रिक देश बन गया लेकिन नेपाल लगातार राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो गया। सरकारें बनती रहीं टूूटती रहीं। अब फिर नेपाल की संसद आम चुनावों के तीन वर्ष बाद भंग कर दी गई है। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की संसद भंग करने के फैसले पर मुहर लगा दी है। ओली ने यह कदम सत्तारूढ़ सीपीएन (माओवादी) में चल रहे आंतरिक विवादों के बाद उठाया। पार्टी के सह अध्यक्ष आैर नेपाल की माओवादी क्रांति के जनक पुष्प कमल दहल प्रचंड, माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ खनाल जैसे वरिष्ठ नेता ओली पर पार्टी आैर सरकार को एकतरफा ढंग से चलाने का आरोप लगाते रहे हैं। तीन वर्ष पहले केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन माओवादी ने चुनावी गठबंधन किया था। इस गठबंधन को चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला था। सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही दोनों दलों का विलय हो गया था लेकिन पार्टी में कई मुद्दों पर मतभेद तीव्र होतेे गए और लंगड़ी लोकतांत्रिक सरकार का हश्र भी संसद भंग करने के तौर पर सामने आया। इस बार पैदा हुए मतभेद उस अध्यादेश को लेकर बढ़े जिसमें प्रधानमंत्री को प्रति​निधि सभा के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता की सहमति के बिना विभिन्न सैविधानिक संस्थाओं के सदस्यों और अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति का अ​िधकार दिया गया था। प्रचंड तो काफी समय से ओली की कार्यशैली से नाराज चल रहे थे और वह लगातार प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग कर रहे थे। सत्तारूढ़ पार्टी विभाजित होने से सरकारों का बनना, टूटना शुरू होगा और नेपाल अस्थिरता और असंमजस की स्थि​ति में प्रवेश करेगा। ओली का झुकाव चीन की ओर था और उनकी सरकार बचाने के लिए चीन का हस्तक्षेप भी काफी बढ़ गया। नेपाल स्थित चीन की महिला राजदूत का सरकार आैर पार्टी में दखल बढ़ गया था। कहा तो यह भी जाता है कि चीन की राजदूत ने ओली के पक्ष में लाबिंग करनी शुरू कर दी थी।


जबर्दस्त आंतरिक कलह के बीच प्रचंड ने प्रधानमंत्री ओली की राष्ट्रपति से संसद भंग करने की सिफारिश को असंवैधानिक बताया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री का फैसला सीधे संविधान की भावना के खिलाफ है और यह लोकतंत्र का मजाक है। यह निरंकुशता का स्पष्ट संकेत है। संविधान विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि प्रधानमंत्री ओली को ऐसी सिफारिश करने का अ​िधकार ही नहीं है। 2015 का नेपाल का संविधान प्रधानमंत्री को प्रतिनिधि सभा को भंग करने का कोई विशेषाधिकार नहीं देता। विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस भी ओली कैबिनेट के फैसले को कोर्ट में चुनौती देने जा रही है।

नेपाल में प्रधानमंत्री ओली के विरोधी खेमे के लोग सड़कों पर उतर आए हैं। आने वाले समय में नेपाल की राजनीति में जिन शक्तियों को पिछले काफी समय से नजरंदाज किया गया वे अब उभर कर सामने आएंगी। ओली ने अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए भारत विरोधी रवैया अपनाया और नेपाल में राष्ट्रवाद का ज्वार पैदा करने की कोशिश की थी। उन्होंने अयोध्या के नेेपाल में होने और वहां श्रीराम का जन्म होने जैसी अनर्गल बयानबाजी भी की। लोगों ने उनका जमकर मजाक उड़ाया था। भारत और नेपाल के बीच उन्होंने सीमा विवाद खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा भारतीय क्षेत्रों को नेपाली नक्शे में शामिल किया। बाद में नेपाल सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली। ओली के इस कदम से भी प्रचंड नाराज हुए थे। अब देखना यह है कि नेपाल में नए चुनाव होंगे या वहां की सर्वोच्च अदालत संसद भंग करने की सिफारिश को वैध या अवैध ठहराएगी। क्या नेपाल फिर प्रचंड पथ पर चलेगा या फिर उदारवादी शक्तियां उभरेंगी। भारत की चिंता तो यह है कि नेपाल का लोकतंत्र मजबूत हो और वहां स्थिर सरकार बने। भारत चाहता है कि नेपाल में एक स्वस्थ, मजबूत और लोकप्रिय प्रजातंत्र की स्थापना हो। आधे-अधूरे और लंगड़े लोकतंत्र से नेपाल की जनता त्रस्त हो चुकी है और अभी तक कोई भी सरकार जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है। चीन की दखलंदाजी से वहां के एक वर्ग में चीन विरोधी भावनाएं भी पनपने लगी हैं। चीन और भारत की नजर नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम पर है।


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