सम्पादकीय

पुलिस अफसरों के तर्क

Subhi
8 Jan 2022 3:48 AM GMT
पुलिस अफसरों के तर्क
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प्रधानमंत्री सुरक्षा चूक का मामला राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पीएम मोदी से पूरी जानकारी ली।

प्रधानमंत्री सुरक्षा चूक का मामला राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पीएम मोदी से पूरी जानकारी ली। दोनों संवैधानिक शीर्षों के बीच क्या संवाद हुआ, उसका सारांश भी सार्वजनिक नहीं किया गया है। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी पीएम से बात कर सुरक्षा चूक पर गंभीर चिंता जताई है। उनका आग्रह है कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने भी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है। इनके अलावा, देश के 27 पूर्व आईपीएस अधिकारियों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर इसे 'खतरनाक', 'भयानक' और 'व्यापक' लापरवाही करार दिया है। अधिकतर आईपीएस अफसर एसपीजी, गुप्तचर ब्यूरो, रॉ और आंतरिक सुरक्षा आदि में सेवाएं दे चुके हैं, लिहाजा सुरक्षा चूक का मर्म समझते हैं। प्रधानमंत्री की सुरक्षा का अनुभव उनका अपना है, जो राजनीतिक बयानबाजी और कुतर्कों से भिन्न है। उन्होंने राष्ट्रपति से मांग की है कि गंभीर जांच कराई जाए और जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कड़ी, दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। पूर्व आईपीएस अधिकारियों का मत है कि पंजाब के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को तलब कर उनके तबादले तुरंत प्रभाव से होने चाहिए। उनसे सवाल किए जाएं कि प्रधानमंत्री प्रवास और रूट के दौरान वे कहां थे? पीएम काफिले के साथ क्यों नहीं थे?

पूर्व आईपीएस अफसरों का मानना है कि जिस फ्लाईओवर पर पीएम के काफिले को करीब 20 मिनट तक फंसे रहना पड़ा, उस अंतराल में बहुत कुछ किया जा सकता था। फ्लाईओवर के नीचे कोई सुरक्षा दस्ता नहीं था, ऊपर भी पुलिस अधिकारी मौजूद नहीं थे, लिहाजा पुल के नीचे कोई आईईडी विस्फोटक प्लांट किया जा सकता था! आजकल कई अत्याधुनिक अस्त्र और ड्रोन आदि चलन में हैं, लिहाजा उनके जरिए पीएम के काफिले पर आक्रमण किया जा सकता था। पूर्व आईपीएस अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री को किसी भी स्थिति में इंतज़ार नहीं कराया जा सकता। बेशक एसपीजी पर प्रधानमंत्री की प्राथमिक सुरक्षा का दायित्व है, लेकिन सुरक्षा की पूरी व्यवस्था राज्य सरकार करती है। पीएम प्रवास से कुछ दिन पहले एसपीजी के साथ संबंधित राज्य पुलिस, राज्य खुफिया एजेंसी का प्रभारी डीआईजी, संबंधित जिले के डीएम और एसएसपी आदि की गहन बैठक की जाती है। उसमें तमाम संभावित खतरों, चुनौतियों, आशंकाओं, अवरोधों, स्थानीय आंदोलनों और व्यक्तिगत जोखि़मों पर विमर्श किया जाता है। यदि पीएम को किसी सीमाई इलाके या उपद्रवी क्षेत्र में जाना है, तो वहां के आतंकी या उग्रवादी संगठनों पर निगाह रखी जाती है। बैठक के मिनट्स दर्ज किए जाते हैं। उनमें प्रत्येक अधिकारी का मत नोट किया जाता है। मिनट्स की कॉपी प्रत्येक एजेंसी को दी जाती है।
आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत के अनुसार, 'हमें तो पहले से पता ही नहीं था', ऐसे बहानों की गुंज़ाइश पीएम यात्रा की योजना में बिल्कुल नहीं होती। प्रधानमंत्री हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, रेल, नाव, सड़क मार्ग आदि से जा सकते हैं। चाक-चौबंद सुरक्षा के मायने ही ये होते हैं कि पीएम किसी भी रास्ते से जा सकते हैं। सभी रूट्स की बाकायदा रिहर्सल की जाती है। पूर्व आईपीएस अधिकारियों का मानना है कि पीएम दौरे के वक़्त सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका स्थानीय एसएचओ की होती है, क्योंकि उन्हें स्थानीय गतिविधियों की पूरी जानकारी होती है। वह संभावित खतरों और अराजक तत्त्वों को सम्यक रूप से जानते हैं। यदि पंजाब में फिरोज़पुर-मोगा मार्ग पर पीएम का काफिला और प्रदर्शनकारी आमने-सामने की स्थिति में आ गए, तो यह खतरनाक पल थे। इस संबंध में मुख्यमंत्री चन्नी का बयान बचकाना है कि पीएम पर किसी ने कंकड़-पत्थर नहीं उछाला, गोली नहीं मारी और धमकी तक नहीं दी, तो पीएम की जान को कौन-सा खतरा था! आईपीएस अधिकारी रहे चेहरों का मानना है कि राजनीति बिल्कुल अलग है। पंजाब खालिस्तानी आतंक की सरज़मीं रह चुका है और आज भी कई संदिग्ध गतिविधियां सामने आती रही हैं। देश ने एक पूर्व प्रधानमंत्री भी खोया है, लिहाजा पीएम की सुरक्षा से लेशमात्र भी समझौता नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति इसे न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाएं, यही देशहित में होगा।

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