सम्पादकीय

परहित सरिस धर्म नहिं भाई

Kunti
14 Oct 2021 6:39 PM GMT
परहित सरिस धर्म नहिं भाई
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बचपन के दशहरा और रामलीला की यादें अब भी हैं।

अशोक वाजपेयी, कवि-आलोचक एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी। बचपन के दशहरा और रामलीला की यादें अब भी हैं। मेरे सागर शहर में हमारे मोहल्ले गोपालगंज में बंगालियों की कालीबाड़ी स्थित थी, जहां लगभग दस दिन मां दुर्गा की अनुपम प्रतिमा के सामने कई प्रकार केसुंदर आयोजन होते थे। मनमोहक संगीत, नृत्य, नाटक, व्याख्यान और वार्ताएं बहुत श्रद्धा भाव से आयोजित होती थीं। इन आयोजनों में हम सब लोग बहुत उत्साह से शामिल होते थे। रामलीला की एक मंडली हर बरस हमारे मोहल्ले के तिगड्डे पर प्रस्तुति देती थी। उसमें यदि एक चक्कर लगा लिया चरित्रों ने तो किष्किंधा पहुंच गए और दूसरे चक्कर में लंका। रामलीला मंडली के अभिनेताओं को अनेक परिवार अपने यहां भोजन पर आमंत्रित करते थे। घर पहुंचने पर इन अभिनेताओं के बड़े प्रेम से पांव पखारे जाते थे। लोगों को सतत जोड़े रखने वाला और आनंदित कर देने वाला आयोजन होता था। मुझे आज भी याद है कि एक बार लीला में हनुमान की भूमिका निभा रहे एक अभिनेता को किसी दर्शक ने केला दे दिया, तो वह अभिनेता तब तक चक्कर लगाते रहे, जब तक उन्होंने केला पूरा खा नहीं लिया।

हमारे नाना रामचरितमानस के बड़े प्रेमी थे। उनके सान्निध्य में प्रवचन करने एक पंडितजी मिर्जापुर से सागर (मध्य प्रदेश) आते थे। वह मानस की कई चौपाइयों की अद्भुत व्याख्या किया करते थे। मुझे याद है, एक बार छह बरस की आयु में मैंने अपने नाना के साथ बिना कुछ समझे मानस का अखंड पाठ किया था, जो लगभग नौ घंटे चला था। मेरी मां तो हर दिन रामचरितमानस के एक-दो पृष्ठ पढ़ती थीं और उसी की पूजा भी करती थीं। मानस की उनकी प्रति के हर पृष्ठ पर अक्षत, चंदन हिलते रहते थे।
उन दिनों राम की जो चर्चा होती थी, वह श्रद्धा भाव से परिपूर्ण होने के अलावा तर्कसंगत होती थी। उनके मर्यादा पुरुषोत्तम रूप, भक्त वत्सल रूप, निषाद राज और शबरी प्रसंगों आदि की खूब चर्चा होती थी। फिर भी मेरी समझ में हमारी संस्कृति केवल राम केंद्रित नहीं है, हालांकि, उसमें राम की बड़ी महिमा है। हमारी संस्कृति में महादेव शिव, शक्ति एवं विष्णु आदि की भी बड़ी महिमा और व्याप्ति है। यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि विशेषकर उत्तर भारत में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की केंद्रीयता बहुत कुछ रामचरितमानस से ही संभव हुई है। यह नहीं भूलना चाहिए कि गोस्वामी तुलसीदास के राम महाकवि वाल्मीकि के राम से भिन्न हैं। बांग्ला, तमिल, ओडिया आदि अनेक भाषाओं में रचे गए रामचरित्रों में भी राम का स्वरूप एक नहीं है। भारत से बाहर जिन रामायण की उपस्थिति है, उनमें भी राम एक समान नहीं हैं। राम की कोई एक व्याख्या न संभव है, न ही वह प्रामाणिक होगी।
सबसे पहले तो रामचरितमानस हिंदी का सबसे बड़ा महाकाव्य है, यानी एक महान साहित्यिक कृति है, उसमें हिंदी का वाग्वैभव, मानवीय स्थितियों और अनुभवों का बेहद समृद्ध-जटिल-सघन संसार प्रगट हुआ है। यह आकस्मिक नहीं है कि मानस की कई चौपाइयां साधारण जन भी खूब दोहराते हैं, क्योंकि उनमें लोक विवेक प्रगट हुआ है। उसका वितान मानवीय अस्तित्व के चरम प्रश्नों और आचरण आदि को समेटता है। पहले संस्कृत में उपलब्ध और इसलिए साधारण जन से दूर रामकथा को अवधी में लाने और बदलने का काम गोस्वामी तुलसीदास ने किया था, जो एक तरह से सांस्कृतिक क्रांति है।
राम हमें समाज के अनुरूप व्यावहारिक होना सिखाते हैं। लंका विजय के बाद और अयोध्या में सत्तारूढ़ होने पर राजा राम अयोध्यावासियों को संबोधित करते हुए यह कहते हैं कि मेरे भाइयो, अगर मैं कभी कुछ भी अनीति करूं, तो मुझे बिना भय के बरजना। रामचरितमानस में राम कहते हैं-
जौं अनीति कछु भाषौं भाई।
तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
तुलसीदास राम के मुख से बुलवाते हैं- परहित सरिस धर्म नहिं भाई। / परपीड़ा सम नहिं अधमाई।। / निर्नय सकल पुरान बेद कर। / कहेऊं तात जानहिं कोबिद नर।। अर्थात हे भाई, दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुख पहुंचाने समान कोई नीचता नहीं। हे भाई, समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय मैंने तुमसे कहा है, यह बात विद्वान जानते हैं।
स्वयं अपने को भी प्रश्नांकित करने की जिम्मेदारी साधारण नागरिकों को सौंपने वाले राजा राम ही लोकतांत्रिक राम हैं। युग कोई भी हो, राम के नाम पर की जा रही हिंसा, अन्याय, अत्याचार, भय और हत्याएं अपने मूल में राम विरोधी हरकतें हैं, जिन्हें राम का अपमान भी कहना चाहिए। आधुनिक काल में राम के निकट पहुंचने वाले एक ही व्यक्ति हुए हैं मोहनदास करमचंद गांधी। वह अचूक ढंग से लोकतांत्रिक थे, अपने विरोधियों का भी पूरा सम्मान करते थे। असहमति और प्रश्नवाचकता को पूरी जगह देते थे, दीनदयालु थे। साधारण लोगों की भलमनसाहत में अटल विश्वास रखते थे। सदैव मन, वचन और कर्म की शुद्धता का पालन करते थे। उन्होंने एक आततायी सत्ता के बरक्स समाज के साधारण जन को निर्भय प्रतिरोध के लिए एकजुट किया था। आज लोकतंत्र में इतना भयग्रस्त माहौल है। हम अपने इस बेहद हिंसक समय में अगर महात्मा गांधी का पुनराविष्कार कर सके, तो यह मर्यादा पुरुषोत्तम राम का ही लोकतांत्रिक पुनराविष्कार होगा। आज हम रामराज्य से लगातार दूर जा रहे हैं। बिना स्वतंत्रता, समता और न्यायप्रियता के किसी तरह का रामराज्य संभव नहीं है। ऐसा राज्य, जो नैतिक हो, मानवीय हो, लोकतांत्रिक हो, संवेदनशील और जागृत अंत:करण हो। हालांकि, इस सपने को साकार करना मात्र सत्ता के वश का नहीं है। यह देश के साधारण लोगों की संवेदना, सामुदायिक सद्भाव, सहचारिता और निर्भयता से ही संभव है। जब राजनीति में सिर्फ 'राज' बचा है और 'नीति' गायब होती लगती है, तब नीति को संगठित और विन्यस्त कर समाजनीति गढ़ने की जरूरत है और यह काम जनमानस ही कर सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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