सम्पादकीय

केवल प्रचार

Subhi
4 Feb 2022 3:55 AM GMT
केवल प्रचार
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महिलाओं की सुरक्षा, सशक्तिकरण, समाज और शासन में भागीदारी बढ़ाने आदि को लेकर सरकारें प्राय: मुखर रहती हैं, अनेक योजनाओं की घोषणाएं भी की जाती हैं, उन पर बजटीय प्रावधान और निगरानी रखने वाले तंत्र की जवाबदेही आदि भी सुनिश्चित की जाती है,

Written by जनसत्ता: महिलाओं की सुरक्षा, सशक्तिकरण, समाज और शासन में भागीदारी बढ़ाने आदि को लेकर सरकारें प्राय: मुखर रहती हैं, अनेक योजनाओं की घोषणाएं भी की जाती हैं, उन पर बजटीय प्रावधान और निगरानी रखने वाले तंत्र की जवाबदेही आदि भी सुनिश्चित की जाती है, मगर उसके नतीजे क्या निकल कर आते हैं, इस पर बहुत गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। अगर ध्यान दिया जाता, तो शायद उन कमियों को दुरुस्त करने के भी प्रयास होते। फिर पिछले कुछ सालों से सरकारों में यह प्रवृत्ति बहुत तेजी से पनपती देखी जा रही है कि वे योजनाओं की घोषणा करने के बाद उनके प्रचार-प्रसार पर ही सारा ध्यान केंद्रित कर देती हैं। उनके लक्ष्य तक पहुंचने को लेकर समय-समय पर समीक्षा कराने की जरूरत तक नहीं समझी जाती।

इसका ताजा उदाहरण 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना के नतीजे हैं। देश में लड़के और लड़कियों के बीच बढ़ते अंतर से चिंतित होकर खुद प्रधानमंत्री ने करीब सात साल पहले इस योजना की शुरुआत की थी। तब माना गया था कि इस योजना से लड़कियों की घटती जन्मदर को सुधारने में मदद मिलेगी और इससे बच्चियों की शिक्षा, समाज में उनकी सुरक्षा और उनके लिए नए अवसरों की गुंजाइश बनेगी। समाज के रुख में भी लड़कियों के प्रति बदलाव आएगा। मगर हकीकत यह है कि पिछले सात सालों में इस योजना के तहत कुल व्यय का आधे से अधिक हिस्सा केवल प्रचार-प्रसार पर खर्च कर दिया गया।

संसद में खुद महिला एवं बाल विकास मंत्री ने एक सवाल के जवाब में बताया कि इस अवधि में कुल छह सौ तिरासी करोड़ रुपए खर्च किए गए, जिसमें से प्रचार-प्रसार यानी विज्ञापनों आदि पर चार सौ एक करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी कुल खर्च का अट्ठावन फीसद। इस योजना के तहत आबंटित धन का उपयोग बालिका भ्रूण हत्या पर रोक लगाने, बालिका शिक्षा और उनको अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के कार्यों में किया जाना था।

मगर महिला एवं बाल विकास मंत्री ने कहा कि इस योजना के शुरुआती दौर में चूंकि जागरूकता फैलाने पर जोर दिया गया, इसलिए प्रचार-प्रसार पर अधिक धन व्यय किया गया। इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि नई योजनाओं के प्रति जागरूकता फैलाने की जरूरत होती है, इसलिए शुरुआती दौर में इसे लेकर विज्ञापनों आदि पर अधिक जोर दिया जाता है। मगर सात सालों तक अगर किसी योजना को लेकर केवल जागरूकता ही फैलाई जाती रहे, तो सवाल उठने स्वाभाविक हैं।

नियमों के मुताबिक हर योजना के लिए आबंटित धन में कुछ हिस्सा उसके प्रचार-प्रसार पर व्यय के लिए निर्धारित रहता है। मगर अपेक्षा की जाती है कि वह कुल स्वीकृत राशि के एक चौथाई से अधिक न होने पाए, क्योंकि इससे व्यावहारिक पक्षों की गतिविधियां प्रभावित होती हैं। अगर किसी योजना की आधे से अधिक रकम केवल प्रचार पर खर्च की जाएगी, तो जाहिर है, जिन पक्षों पर व्यावहारिक रूप से काम होना चाहिए, वे बाधित होते हैं, वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते। योजनाएं धरातल पर किए जाने वाले काम से फलीभूत होती हैं, न कि हवाई बातों से। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की सफलता इसीलिए प्रश्नांकित हुई है। इस योजना के तहत बालिका भ्रूण हत्या पर कितनी रोक लग पाई, उनकी शिक्षा के लिए क्या उपाय किए जा सके, लड़की को अभिशाप मानने वाले समाज का मन बदलने के लिए क्या बुनियादी उपाय जुटाए जा सके, इसकी सफलता इस पर तय होगी।


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