सम्पादकीय

तेल की नकेल

Gulabi
25 Nov 2021 11:14 AM GMT
तेल की नकेल
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ऐसे वक्त में जब कोविड संकट से उबरती अर्थव्यवस्थाएं पटरी पर लौट रही हैं
ऐसे वक्त में जब कोविड संकट से उबरती अर्थव्यवस्थाएं पटरी पर लौट रही हैं, तेल उत्पादक देशों की मनमानी दुनिया के तमाम देशों के लिये मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। दरअसल, वे जानबूझकर तेल का उत्पादन कम कर रहे हैं ताकि तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ऊंचे रहें। निस्संदेह दुनिया की लोकतांत्रिक सरकारों की अर्थव्यवस्थाएं इस महंगे कच्चे तेल से चरमरा ही रही हैं, जनता में बढ़ता आक्रोश भी सरकारों के लिये सिरदर्द साबित हो रहा है। ऐसे में तेल उत्पादक देशों की मनमानी पर नकेल डालने के मकसद से दुनिया के बड़े तेल उपभोक्ता देशों ने अपने आपातकालीन भंडार से कच्चा तेल निकालने का सामूहिक फैसला लिया है। मकसद यही है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में कमी लायी जा सके। निस्संदेह, कच्चे तेल निर्यातक देशों को नाथने के लिये ऐसी कवायद दुनिया में पहली बार की गई है। दरअसल, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज प्लस से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने को कहा था। लेकिन इस संगठन ने दुनिया की इस मांग को कान नहीं धरा, जिसके बाद ही बाइडेन प्रशासन ने अन्य बड़े तेल उपभोक्ता देशों के साथ स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व से तेल निर्गत करने की योजना को मूर्त रूप दिया। भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं और अपने आपातकालीन भंडारण से पचास लाख बैरल तेल निकालने का फैसला लिया है। कुछ लोग इस फैसले को आसन्न विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देख रहे हैं। कयास लगाये जा रहे हैं कि इस तेल के बाजार में आने से तेल के दामों में गिरावट आ सकती है। लेकिन चिंता इस बात की भी है कि यदि रुपये के मूल्य का अवमूल्यन हुआ तो तेल के आपातकालीन भंडारण के उपयोग का लाभ शायद ही मिल पाये। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, जापान व चीन में भी इस तरह के फैसले लेने की बात कही जा रही है।
दुनिया में मांग उठ रही है कि कच्चे तेल के दामों का निर्धारण बाजार की शक्तियों द्वारा हो न कि तेल उत्पादक देशों की मनमानी से। ये देश बाजार की मांग के मुकाबले कम तेल की आपूर्ति से अपना एकाधिकार रखते हैं, जिसके चलते पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आया है, वह भी ऐसे समय में जब कोरोना संकट से लोगों की क्रय शक्ति में कमी आई है। कच्चा तेल का महंगा होना उन्हें चुभ रहा है। लोग सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। पेट्रोलियम पदार्थ महंगे होने से दुनिया में अप्रत्याशित महंगाई होने से जनता में आक्रोश बढ़ा है। इसके मद्देनजर अमेरिका व भारत समेत कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने संकट काल के लिये रखे तेल के एक भाग के उपयोग का फैसला किया है। कयास लगाये जा रहे हैं कि यदि पेट्रोलियम कंपनियां घटती कीमतों का लाभ उपभोक्ताओं को दें तो इसकी कीमत में दो से तीन रुपये की गिरावट आ सकती है। साथ ही एलपीजी के दामों में भी कमी आ सकती है। बाजार के पंडित कयास लगा रहे हैं कि अमेरिका, चीन व भारत आदि बड़े देशों के आपातकालीन भंडारण के उपयोग से कच्चे तेल के दाम वर्तमान 80 डॉलर बैरल से घटकर सत्तर डॉलर प्रति बैरल तक आ सकते हैं। भारत के ईस्ट व वेस्ट कोस्ट में तीन स्थानों पर अनुमानित 3.8 करोड़ बैरल कच्चे तेल का भंडारण है, जिसमें से पचास लाख बैरल यानी करीब अस्सी करोड़ लीटर तेल रिलीज किया जायेगा। इसमें जरूरत के हिसाब से वृद्धि भी की जा सकती है जिसे मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प लिमिटेड को बेचा जायेगा, जो रिफाइनरी पाइपलाइन के जरिये स्ट्रैटेजिक रिजर्व से जुड़ी हैं। दरअसल, दुनिया के बड़े देश ऊर्जा संकट व तेल आपूर्ति में बाधा की आशंका के चलते नब्बे दिनों के लिये आपातकालीन भंडारण रखते हैं। इस संकट को दूर करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना की गई थी। इसके तीस सदस्यों में भारत भी शामिल है।
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