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महामारी आई तो लगा मानव जाति का विनाश हो जाएगा
महामारी आई तो लगा मानव जाति का विनाश हो जाएगा. सम्भवतः चीन के कारण ऐसा हुआ. संक्रमण फैला तो लोगों को बचाने हेतु सारी दुनिया में कर्फ्यू लगा दिया गया. एक-एक मनुष्य की जान बचाने की कोशिश की गई. साथ ही ये सोचा जाने लगा कि अब मानव जाति संभल जाएगी, हर चीज के महत्व को समझेगी और एक दूसरे के विनाश का कारण नहीं बनेगी.
लेकिन नहीं, आज के कोरोना भय के काल में भी जहां महामारी अभी खत्म नहीं हुई है, रुस के द्वारा यूक्रेन पर हमला वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है. युद्ध का होना विनाश को जन्म देना है. युद्ध से अरमानों और उम्मीदों पर पानी फिर जाता है. भय से व्याकुल जीवन अपने सामने अपने विनाश को प्रत्यक्ष देखता है और छटपटाने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाता.
युद्ध तबाही का पर्याय होता है, जिसमें सब कुछ बर्बाद हो जाता है. आशाएं, भावनाएं, खुशियां सब खत्म हो जाती हैं. निरीहता, असमर्थता व्याकुलता ही सर्वत्र दिखलाई देती है. खुशहाल समाज में जब युद्ध जैसा संकट आता है, तो कोई रास्ता नजर नहीं आता. प्राणों का संकट, भूखमरी की चिंता, अन्न के एक-एक दाने को तरसते जीवन कितनी व्याकुलता भरी जिंदगी जीने को विवश हो जातें हैं.
अपने सामने अपने परिवार के सदस्यों की बेबसी और कुछ भी ना कर पाने की विफलता काफी कष्ट देने वाली होती है. युद्ध होने के पक्ष में और युद्ध का विरोध करने वाले दोनो ही तरह के लोग होते हैं. विधाता के द्वारा दिए गए इस जीवन की वास्तविकता कितनी कटु और कष्टकारी है, इससे सभी परिचित हैं. असंख्य पुण्य कर्मो और लंबे समय की प्रक्रिया के बाद मानव शरीर मिलता है.
असमय ही बारुद की चुटकी से उसी बहुमूल्य शरीर को अपनी विस्तारवादी लालसा के लिए समाप्त कर देना बहुत ही दुःखद है. जीवन का अन्त तो एक दिन होना ही है, फिर सांसो को झटके से तोड़कर एक परिवार की, समाज की खुशियों का अंत क्यों किया जाए. जीने दें एक प्यारा सा जीवन, युद्ध की विभीषिका में मौत के साए में जिंदगी जीना एक सजा की भांति है.
रुस ने यूक्रेन में जो तबाही का मंजर उत्पन्न कर दिया है, उससे सभी सहम हुए हैं. हर प्राणी का करुण क्रन्दन और मायूसियां झकझोर देने वाली हैं. रुला रही हैं. क्या रुस को इस बात का अहसास नहीं कि युद्ध मानव के लिए कितना घातक है. हर आंख का कतरा मानवता को पिघला देने के लिए काफी है. हर जिंदगी मौत से जूझ रही है. खुशहाल परिवार बेदम नजर आ रहे हैं. अन्न के लिए, धन के लिए परिवार के लिए, प्राणों के लिए जूझते लोगों के जीवन की वास्तविकता की तस्वीरें सभी को व्याकुल कर रहीं हैं.
हर दिल यही कह रहा है कि युद्ध कोई विकल्प नहीं. संयुक्त राष्ट संघ की स्थापना विश्व शांति के उद्देश्य से है, तो युद्ध की आक्रामकता क्यों? उसे अपने कर्तव्यों को पूर्ण करना चाहिए. सभी देशों को अपने नैतिक कर्तव्यों को समझकर शांति की पहल करनी चाहिए. यूक्रेन में तबाही को रोकने के लिए सभी को एकजुट हो जाना चाहिए, यथासम्भव प्रयास करने चाहिए.
एक दिन का विलंब भी मनुष्य की जिंदगी के लिए बहुत भारी है. जिंदगियां बहुत कीमती हैं, तमाशबीन बनकर देखने का समय नहीं है, अवसरवादी ना बने, यूक्रेन की मदद करें. अन्यथा ऐसी समस्या से आने वाले समय में हर छोटे देश को दूसरे बड़े विस्तारवादी देश की महत्वाकांक्षाओं का सामना करना पड़ सकता है.
रुस की ताकतवादी सोच ने आज जो युद्ध की स्थिति उत्पन्न की है, उस पर सब देशों का मौन धारण कर लेना दुनिया के लिए सही नहीं है. अपनी चुप्पी तोड़कर शांति स्थापित कर भयानक विनाश को रोकना चाहिए. जिंदगियों के उजड़ने के बावजूद ऐसे भय के माहौल मे भी नन्हीं-नन्हीं किलकारियां गूंज रही हैं. कठिन, विकट, विपरीत परिस्थितियों में भी बम के धमाकों के बीच नवीन जिंदगियां जन्म ले रही हैं.
प्रसव पीड़ा सहकर मां शिशुओं को जन्म दे रही हैं. कहीं कोई फौजी अपनी आंखों की नमी छिपाकर अपने परिवार को अलविदा कह रहा है. अपने बच्चों से बिछड़ने के लिए गले मिल रहा है. मीलों चलकर बच्चे अपने घर पहुंचाना चाह रहे हैं. हाथ में हथियार उठा रहे हैं. मां बाप के आंचल से बिछड़ते बच्चे, टूटते घर परिवारों की विपत्तियां जब हमसे ही सहन नहीं हो रहीं हैं तो जिन पर ये मंजर बीत रहा है उनकी क्या दशा होगी.
ये सोचकर भी रुह कांप जाती है. धमाकों की आवाज की गूंज से जो घबराहट और टूटती सांसो की डोर से जो कसक उठ रही है, वह बहुत तकलीफदेय है. उसकी पीड़ा असहनीय है. रिहाइशी इलाकों में मिसाइले दागना, हंसती खेलती जिंदगियों को मौत के आगोश में पहुंचा देना, इंसानियत को खत्म कर देने के लिए काफी है.
युद्ध का आगाज करने वाले देशों को ये भी सोचना चाहिए कि लाशों को बिछाकर मिली खुशियों से कुछ हासिल नहीं होता. असमय, असंख्य जिंदगियों को मौत के आगोश में सुला देने से प्रगति नहीं होती. सिकन्दर बनकर जमीन नापने की लालसा का अंत करो, मानवता को शर्मसार मत करो, शक्तिशाली होने का ये मतलब नहीं कि कमजोर के अस्तित्व को ना आंका जाए.
यूक्रेन अपनी खुशियों में जीता देश किसी का मार्ग तो अवरुद्ध नहीं कर रहा था, हथियार तो जमा नहीं कर रहा था, सुकून से आगे बढ़ रहा था, उसे युद्ध जैसी विभीषिका का सामना क्यूं करना पड़ा. मै संसार में सर्वश्रेष्ठ हूं, मेरे आदेश से सब कुछ हो, इस भाव में जिंदगी व्यतीत करने वालों का मिथक टूटना चाहिए. युद्ध जैसी क्रूरतम परिस्थिति नहीं आने देना है.
जब इंसान ही नही रहेंगे तो देश की सीमाएं बढ़ाकर क्या हासिल होना है. चीखों, आहों पर बसी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति क्या मन को शांति दे पाएंगी. क्या करुण आहों की पुकार विचलित नहीं कर देगी. अहिंसा की बात हो, बौद्ध-धर्म की राह हो, युद्ध जैसा विकल्प ही ना हो, इस हेतु शांति की वार्ता हो.
इतिहास के पन्नों को देखें तो भारी नरसंहार के बाद सम्राट अशोक ने भी बौद्ध धर्म को ग्रहण किया था और बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार भी किया था. हमारा देश विश्व शांति पद पर आरुढ़ है और हमारे देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शांति और अहिंसा की बात कही है. युद्ध के पक्ष में हम नहीं हैं. सभी दिल से यही चाहते हैं कि शांति का दीप जले, अमन की बात हो, द्वेष खत्म हो, बुद्ध की राह हो,मानव जाति का व सभी जीवों का कल्याण हो.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
रेखा गर्ग लेखक
समसामयिक विषयों पर लेखन. शिक्षा, साहित्य और सामाजिक मामलों में खास दिलचस्पी. कविता-कहानियां भी लिखती हैं.
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