सम्पादकीय

ज़िंदगी में कोई जुनून ना सिर्फ जीवनशैली परिभाषित नहीं करता, बल्कि एक समय बाद बन जाता है पहचान

Gulabi
22 Jan 2022 8:40 AM GMT
ज़िंदगी में कोई जुनून ना सिर्फ जीवनशैली परिभाषित नहीं करता, बल्कि एक समय बाद बन जाता है पहचान
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क उम्र के बाद कुछ लोगों को स्पोर्ट्स कारें लुभा सकती हैं
एन. रघुरामन का कॉलम:
एक उम्र के बाद कुछ लोगों को स्पोर्ट्स कारें लुभा सकती हैं, पर मेरा आकर्षण तो बीते 50 सालों से रसोई उपकरणों की तरफ रहा है। रसोई बर्तन (किचनवेयर) की किसी दुकान से गुजरते हुए मैं खुद को उसके अंदर जाने से नहीं रोक पाता। मैं दावे से कहता हूं कि एक महिला जितना समय साड़ी की दुकान में बिताती है, उससे ज्यादा मैं किचनवेयर की दुकान में बिता सकता हूं। रसोई के प्रति मेरा जुनून पांच दशक पुराना और किचन-गैजेट्स से लगाव को तीन दशक से ज्यादा हो चुके।
1960 के दशक में नागपुर के एक चॉलनुमा घर में मेरी परवरिश हुई थी। मैंने मां को रसोई में जूझते देखा है। मैं उनके बहुत करीब था, इसलिए हमेशा उनका हाथ बंटाने की कोशिश करता था। इस तजुर्बे से मुंबई में पूरे बैचरल दिनों में अपना किचन संभालने में मदद मिली। इससे मेरे घर रात बिताने के लिए आने वाले मित्र भी चकित रह जाते थे। किचन के प्रति लगाव के चलते ही मुझे शेफ संजीव कपूर, हरपाल सिंह सोखी और मिलिंद सोवानी जैसे कई बेहतरीन दोस्त मिले।
जब मैं उन्हें किचन में काम करते देखता तो मैं पाता कि महिलाएं उनसे अपनी नजरें नहीं हटा पाती थीं। मैंने यह भी पाया कि आधुनिक गैजेट्स की मदद से उनकी कुकिंग के हुनर में निखार आ गया था। ये गैजेट्स मैंने कभी किसी स्टील बर्तनों की दुकान में नहीं देखे थे। तब मुझे यह भी नहीं पता था कि पाइनएपल को काटने-छांटने के लिए 'पाइनएपल-कोरर' नाम का कुछ होता भी है। इस तरह किचन-गैजेट्स मेरे खिलौने बन गए और मैं उन्हें खरीदकर जब-तब अपनी मां को सरप्राइज़ देने लगा।
मुझे हमेशा यही लगता कि मैं एक अच्छा बेटा साबित हुआ हूं, क्योंकि मैं मां की मदद कर पाता था। जब वो मुस्करातीं और सराहना करतीं तो मेरे दिल में किचन-गैजेट्स के लिए प्यार और बढ़ जाता। मैं संजीव कपूर के साथ जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड या यूरोप में कहीं भी गया, हर बार हमने दो दिन का समय किचनवेयर के लिए सुरक्षित रखा। तब मैंने 'बनाना-गार्ड' नाम की चीज देखी, इसने यूरोप के अनेक हिस्सों में यूरो रेल से हमारी यात्रा के दौरान केलों को सही-सलामत रखने में मदद की।
जब हम किसी अपार्टमेंट में ठहरते थे तो संजीव मेरे लिए नाश्ता बनाते थे। इसके लिए वे ब्रेड पर प्लास्टिक की किसी चीज़ को दबाते और टोस्टिंग के बाद कुरकुरी स्लाइस पर सुपरमैन का एक लोगो उभर आता। मैं सोचने लगा कि इस युक्ति से कितनी ही मांएं अपने बच्चों को नाश्ता करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। मेरा मत है कि किचन-गैजेट्स को या तो हमारा काम आसान करना चाहिए या अगर उनकी जरूरत कभी-कभार हो, तो भी उन्हें पहले के उपकरणों से बेहतर साबित होना चाहिए।
1980-90 के दशक में मुझे रिश्तेदारों को कुछ देना होता तो उसमें व्हिस्क या स्लॉटेड या स्कूप चम्मचें जैसी चीजें होतीं। पहले दो उपकरण तो मां के काम आते, लेकिन स्कूप-स्पून का इस्तेमाल मैं दिखावा करते हुए आम या वनीला आइस्क्रीम खाने के लिए करता और इस तरह मेहमानों की सराहना पाता।
जब परिवार में किसी ने पिज़्ज़ा का नाम भी नहीं सुना था, तब मैं 'पिज़्ज़ा व्हील' ले आया था और मां उसकी मदद से 'शकरपारे' बनाती थीं! जब भी मैं और हरपाल सिंह जॉर्जिया के त्बीलिसी या इस्तांबुल के देहाती इलाकों में गए, तो हम वहां से 19वीं सदी के परंपरागत बर्तन खरीद लाते। हरपाल उन्हें कुकिंग-शो में दिखाने के लिए खरीदते और मैं अपने गेस्ट को प्रभावित करने के लिए। आज भी स्टील के चमचमाते, पाइनवुड के हत्थों वाले चाकुओं के प्रति मेरा प्यार कम नहीं हुआ है।
फंडा यह है कि आपकी ज़िंदगी में कोई जुनून ना सिर्फ जीवनशैली परिभाषित करता है, बल्कि एक समय बाद पहचान भी बन जाता है।
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