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सम्पादकीय

न समान, न सम्मान

Triveni
17 Oct 2020 10:11 AM GMT
न समान, न सम्मान
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शारदीय नवरात्रि आज से शुरू हो रही है। नौ दिनों के इस पर्व को लेकर जिस तरह का उत्साह हर साल सार्वजनिक तौर पर दिखता रहा है,

जनता से रिश्ता वेबडेस्क| शारदीय नवरात्रि आज से शुरू हो रही है। नौ दिनों के इस पर्व को लेकर जिस तरह का उत्साह हर साल सार्वजनिक तौर पर दिखता रहा है, कोरोना काल में वैसा न दिखना स्वाभाविक है। लेकिन नवरात्रि जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक अवसर हमें सामाजिकता और सामूहिकता का जितना संस्कार देते हैं उतना ही मन के स्तर पर तरोताजा भी करते हैं। सो, यह नवरात्रि बाहर निकल कर अधिक से अधिक लोगों के साथ घुलने-मिलने, डांडिया खेलने और सामूहिक तौर पर देवी पूजन करने का मौका भले न दे रही हो, पर अपने अंदर विनम्रता भाव को मजबूत करके कुछ नए गुणों की पात्रता हासिल करने में तो कोई बाधा नहीं है।

यह बात पूरी दुनिया में रेखांकित की जाती रही है कि ईश्वरीयता के स्त्री रूप को प्रतिष्ठित करने वाला, सृष्टि की संचालक शक्ति के रूप में पूजने वाला अकेला बड़ा समाज अब भारत में ही बचा है। हर पुराने समाज की तरह हमारे समाज में भी ऐसी कुछ धाराएं मिलती हैं जिन्हें स्त्रियों के प्रति आदर भाव के लिए नहीं जाना जाता, लेकिन भारतीय समाज में स्त्री तत्व का उच्च आध्यात्मिक स्थान एक निर्विवाद तथ्य है। अफसोस की बात है कि जिन असुरों के भय से देवता मारे-मारे फिरते थे, उनका संहार करने के लिए देवियों के सृजन की गाथा हम नवरात्रों में गाते हैं, लेकिन अपने रोजमर्रा के जीवन में स्त्रियों को सामान्य मनुष्य समझने का लोकाचार भी भूल जाते हैं।

पिछले चार-पांच दशकों की बात करें तो जैसे-जैसे महिलाओं के घर से बाहर निकलकर स्कूल-कॉलेज और नौकरियों में जाने, संगठित होने और अपने अधिकार हासिल करने की संभावना बनती गई, उनके दमन-उत्पीड़न के प्रयास भी तेज होते गए। यौन उत्पीड़न इस बड़ी प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है, हालांकि शीशे में बाल और कच्चे घड़े में दरार वाली हमारी पोंगा सोच इसको किसी और ही पैमाने पर पहुंचा देती है

आलम यह है कि नैतिकता की पुरानी कसौटियां हमारे हाथ से निकल चुकी हैं और स्त्री-पुरुष बराबरी वाले आधुनिक मूल्यों तक हम पहुंच नहीं पा रहे हैं। महिलाओं-बच्चों को पुरुषों जैसा ही सामान्य मनुष्य समझना हमसे नहीं हो रहा है, लिहाजा उन्हें सम्मान देने का दावा भी महज पाखंड बन कर रह गया है। लड़कियों, महिलाओं के प्रति जिस तरह की हैवानियत की खबरें चारों ओर से आ रही हैं, वे घटनाएं ही नहीं, उन पर समाज के विभिन्न हिस्सों की, खासकर प्रशासनिक तंत्र की प्रतिक्रिया भी दुनिया के सामने हमारी हकीकत बयान करने के लिए काफी है।

यौन उत्पीड़न के मामलों में आम प्रवृत्ति यही देखी जा रही है कि आरोपी ही नहीं, स्वयं उत्पीड़ित स्त्री का परिवार और पास-पड़ोस भी पहली कोशिश घटना को दबाने या कम करके बताने की करते हैं। केवल चरम हिंसा के मामले दुनिया के सामने आ पाते हैं, वह भी तब जब उन्हें छिपाना असंभव हो जाए। इसके आगे दिखाई देती है स्थानीय पुलिस से लेकर सत्ता सोपान के शीर्ष तक एक ऐसी हिसाबी प्रवृत्ति, जिसका मकसद दोषी को दंडित करने से ज्यादा खुद को दाग-धब्बों से बचाने का होता है। अगर हो सके तो इन नौ दिनों में हम सोचकर देखें कि नारी सम्मान का सिरे से निषेध करने वाली इन प्रवृत्तियों के अपने बीच रहते क्या हम एक देवी पूजक समाज के रूप में अपना परिचय देने के अधिकारी हैं!

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