सम्पादकीय

नीना गुप्‍ता की आत्‍मकथा के बहाने : जो मिल गया वो नहीं, जो मिल न सका, बस वही कहानी है

Gulabi
18 Jun 2021 1:29 PM GMT
नीना गुप्‍ता की आत्‍मकथा के बहाने : जो मिल गया वो नहीं, जो मिल न सका, बस वही कहानी है
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नीना गुप्‍ता की आत्‍मकथा ‘सच कहूं तो’ इन दिनों खासी चर्चा में है

नीना गुप्‍ता की आत्‍मकथा 'सच कहूं तो' इन दिनों खासी चर्चा में है. पेंगुइन से छपी 304 पन्‍नों की इस किताब में नीना जितना बताती हैं, उतना ही छिपाती भी हैं. आत्‍मकथा बड़ी जिम्‍मेदारी का काम है क्‍योंकि अपनी कहानी लिखते हुए कोई सिर्फ अपनी कहानी नहीं लिख रहा होता. उसमें वो तमाम किरदार भी आते हैं, जो हमारी जिंदगी से वाबस्‍ता रहे. उनकी कहानी को अपने नजरिए से लिखने में हमेशा एक खतरा होता है कि उनका नजरिया कहीं पीछे छूट जाता है. साथ ही उन किरदारों की भी एक प्राइवेसी है, उस प्राइवेसी की भी गरिमा है.

आप कैसे कहें अपना सच कि किसी दूसरे के सच के साथ अन्‍याय न करें. ऐसा हमेशा मुमकिन नहीं हो पाता. जाहिर है, दुनिया की तमाम आत्‍मकथाएं ऐसी अनेक वजहों से चर्चा से ज्‍यादा विवादों के केंद्र में रही हैं.
लेकिन नीना गुप्‍ता ने अपनी कहानी सुनाते हुए उनकी जिंदगी के दूसरे किरदारों की गरिमा और उनकी प्राइवेसी को लेकर बहुत एहतियात बरता है. शायद ऐसा करने की कोशिश में बहुत कुछ कहना छूट भी गया होगा, लेकिन वो छूट जाना उस पा लेने से बहुत कम है, जो प्‍यार और ख्‍याल में हम करते हैं.
पॉपुलर कल्‍चर और लोगों की स्‍मृति में नीना गुप्‍ता का नाम तकरीबन मिट ही गया था, जब तीन साल पहले 2018 में आई फिल्‍म बधाई हो से नीना अचानक मेनस्‍ट्रीम में आ गईं. यूं तो वो छोटी-छोटी भूमिकाओं में लगातार ही सिनेमा और टेलीविजन के पर्दे पर दिखाई देती रहती थीं लेकिन वो मौजूदगी ऐसी नहीं थी कि जेहन में ठहर जाए. हम रुककर उसे देखें और उनके बारे में बात करें. नीना गुप्‍ता की आखिरी हिट और चर्चित फिल्‍म 1994 में आई शुभांकर घोष की फिल्‍म वो छोकरी थी, जिसे तीन नेशनल अवॉर्ड मिले थे.
उसके बाद 2018 में जब उनकी वापसी हुई तो उन्‍होंने एक नया इतिहास ही रच दिया था. हिंदी सिनेमा ने इसके पहले कोई 59 साल की फिल्‍म की हिरोइन नहीं देखी थी. यूं तो आयुष्‍मान खुराना और सानया मल्‍होत्रा जैसे किरदार भी थे, लेकिन हिरोइन तो नीना गुप्‍ता ही थीं, जो अकेले अपने कंधों पर फिल्‍म को उठाए उसे आखिरी मुकाम तक लेकर जाती हैं.
हिंदी सिनेमा में पहले शायद ही किसी अभिनेत्री की सेकेंड इनिंग इतनी दमदार रही है, जितनी कि नीना गुप्‍ता की. इस सफलता ने उन्‍हें और ज्‍यादा मुखर बना दिया. वो सोशल मीडिया पर ज्‍यादा खुलकर अपनी कहानी और अपने अनुभव साझा करने लगीं. कुछ दिनों पहले उन्‍होंने इंस्‍टाग्राम पर एक वीडियो पोस्‍ट किया, जिसमें वो युवा लड़कियों से अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि लड़कियों को किसी शादीशुदा मर्द के प्‍यार में नहीं पड़ना चाहिए. ये इतना खतरनाक समीकरण है कि जिसमें घुसने के बाद सिर्फ दुख और निराशा ही हाथ लगती है. ये कहते हुए वो अपनी कहानी भी बताती हैं कि कैसे वो खुद कई सालों तक एक विवाहित पुरुष से प्रेम करते हुए दुख सहती रहीं.
नीना गुप्‍ता ने छह दशक तक जो जीवन जिया, उसे लेकर भारतीय मध्‍यवर्ग उनके प्रति एक खास तरह की अवधारणा में जीता रहा है. लंबे समय तक स्‍त्री मुक्ति और बराबरी का कोई नरेटिव उनके जिक्र के बगैर पूरा नहीं होता था. हर 8 मार्च पर हिंदी और अंग्रेजी के अखबार बहादुर औरतों की सूची में नीना गुप्‍ता का नाम छापते. कॉल‍मिस्‍ट इस बात का जिक्र करने से नहीं चूकते कि कैसे 90 के दशक में बेहद रूढिवादी भारतीय समाज में नीना गुप्‍ता ने अनब्‍याही मां बनने का क्रांतिकारी फैसला किया.
जिस एक्टिविटी में हम खुद एक पक्ष न हों, दूर से उसके बारे में अपना पक्ष तय करना और राय बनाना सबसे आसान काम है. मध्‍यवर्गीय लड़कियों और महिलाओं के लिए नीना गुप्‍ता क्रांतिकारी, आजादख्‍याल महिला थीं, लेकिन कोई उस आजादख्‍याल स्‍त्री के जीवन को करीब से नहीं जानता था. सबको दूर से आजादी दिख रही थी, वो तकलीफ, संघर्ष और अकेलापन नहीं जो नीना गुप्‍ता के हिस्‍से में आया था. बावजूद इसके कि उनके लिए फैसले को उनके परिवार का पूरा समर्थन मिला. पिता हमेशा हाथ थामकर खड़े रहे. उनके दोस्‍तों और नजदीकी लोगों ने उन पर कोई फतवा नहीं जारी किया, लेकिन फिर भी 30 साल की स्‍त्री अनब्‍याही मां होकर अकेले एक बच्‍ची को पाल रही थी और ये कतई आसान काम नहीं था.
नीना ने जो जिंदगी जी, उसका नतीजा ये हुआ कि वो अपनी बेटी के लिए वो जिंदगी नहीं चाहती थीं. मसाबा गुप्‍ता जब बिना शादी किए फिल्‍म प्रोड्यूसर मधु मंटेना के साथ सिर्फ रहना चाहती थीं, नीना इसके लिए कतई तैयार नहीं थी. कुछ साल पहले आउटलुक को दिए गए इंटरव्‍यू में नीना गुप्‍ता ने कहा था कि वो अपनी बेटी को लिव इन रिश्‍तों में रहने की इजाजत कभी नहीं देंगी. अगर वो किसी से प्‍यार करती है और उसके साथ रहना चाहती थी तो पहले उसे शादी करनी होगी. वो ये भी नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी शादी न करने का फैसला ले और बिलकुल आजाद जीवन जिए. उस लंबी और गहरी बातचीत में लंबे समय तक अविवाहित और अकेले रहने का नीना गुप्‍ता का दुख कहीं न कहीं झलक रहा था. अपनी जिंदगी से उलट अपनी बेटी के लिए वो बेहद पारंपरिक जिंदगी चाहती थीं. लेकिन उनके उस चाहने का नतीजा क्‍या हुआ?
अपनी मां की जिद मानते हुए मसाबा गुप्‍ता और मधु मंटेना ने 2015 में शादी कर ली और ये शादी ढंग से दो साल भी नहीं चल पाई. 2017 से दोनों अलग रहने लगे, 2018 में अपने अलगाव की पब्लिकली घोषणा की और 2019 में दोनों का तलाक हो गया.
मां ने परंपरा को तोड़ा था और परिवार नहीं बसाया. बेटी ने उस परंपरा को निभाने की कोशिश की और परिवार बनाया. लेकिन उसका अंत भी टूटने में ही हुआ.
नीना अब खुद इस बात को महसूस भी करती हैं कि मसाबा पर शादी के लिए दबाव नहीं बनाया होता तो बेहतर था. शादी करने और तलाक लेने से बेहतर था कि मसाबा और मधु साथ रहकर ही देख लेते. निभी तो ठीक वरना अपने रस्‍ते. इसकी झलक नीना और मसाबा के नेटफ्लिक्‍स शो मसाबा-मसाबा में भी देखने को मिली थी, जिसका दूसरा सीजन जल्‍दी ही आने वाला है. वैसे भी आजाद रहते हुए बंधने का जितना आकर्षण होता है, बंधे हुए वो बंधन उतना आकर्षक नहीं रह जाता. आजादी से बंधन और बंधन से आजादी की राह निकलती है.
जीवन एक ऐसी शै है, जो न किताबों से समझ आती है, न सिनेमा से, न संसार भर के ज्ञान से. जीवन को जीकर ही समझा जा सकता है. वहां ठहरकर, संभलकर, गलतियां करके, उन्‍हें सुधारकर ही सीखा जा सकता है. और अंत में कसक सिर्फ उसी बात की रह जाती है, जो किए जाने से रह गई थी. प्‍यार जो पूरा न हो सका, फैसले जो लिए न जा सके, अरमान जो पूरे न हो सके, रिश्‍ते जो मंजिल तक न पहुंच सके, सुख जो महसूस न किए जा सके. वो सारी अधूरी कसक, अधूरे सपने.
जो पूरा हुआ, वो तो हो ही गया. जो न हो सका, बस वही कहानी है. नीना की भी, मसाबा की भी और हम सबकी भी.


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